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‘‘तुम से खाना तक तो ठीक से बनता नहीं और क्या करोगी?’’ कहते हुए विभोर ने खाने की थाली उठा कर फेंक दी.

सकपका कर सहमती वसु सिर्फ मूक सी थाली को देखती रह गई. थाली के साथ उस का सम्मान भी जाने कितने बल खाता जमीन पर दम तोड़ रहा था.

वसु ने अपने घर में कभी ऐसा अपमान खाने का नहीं देखा था न ही कभी पिता को मां से इस तरह व्यवहार करते देखा था. आश्चर्य और दुख से पलकें भीग गईं. उस ने भीगी पलकें

छिपा मुंह घुमा लिया. मन चीत्कार कर उठा अगर नमक कम तो सवाल, उस से ज्यादा तो सवाल. कौन सा पैरामीटर है जो नाप ले… उस का बस चलता तो किसी को शिकायत का मौका ही नहीं देती. घर और औफिस में तालमेल बैठाती अब वसु ख़ुद को थका हुआ महसूस करने लगी थी. थके होने पर भी बहुत लगन से विभोर का मनपसंद खाना बनाती.

उस का प्रयास रहता कि कभी तो विभोर के मन को छू सके. पर हर बार उस की आशाओं पर तुषारापात हो जाता.

वसु को लगने लगा था कि विभोर पूर्वाग्रह से ग्रस्त उस का प्रयास विफल कर देता है. जब भी सम?ाने का प्रयास करती टीवी पर बाबाओं के द्वारा दिखाए जाने वाले उपदेश विभोर के मानसपटल पर आच्छादित रहते और वह उन की परिधि से 1 इंच भी टस से मस न होता. जब कोई धारणा मनोविकार का रूप ले ले तब उसे छोड़ना आसान नहीं होता है. विभोर के साथ भी यही हो रहा था. सामाजिक व्यवस्था जिस में स्त्री सिर्फ भोग्या व पुरुष की दासी मानी जाती है. यह बात विभोर के मानसपटल पर कहीं गहरे बैठ गई थी. इस से आगे जाने या कुछ समझने को वह तैयार ही नहीं होता.

पति की फेंकी इडलीसांभर की प्लेट उठाती वसु बहुत कुछ सोच रही थी. अंतर्द्वंद्व ने उस के तनमन को व्यथित कर दिया था. किसी बात को कहने के लिए झल्लाना आवश्यक तो नहीं. प्रेमपूर्ण वचनों से सुलझाए मसले उचित फलदाई होते हैं.

मन के किसी कोने में रत्तीभर भी जगह हो तो इंसान कुछ भी कहता है तो प्यार से या सम?ाने के लिए न कि अपमान के लिए. वसु को लगता जैसे विभोर जलील करने का बहाना ढूंढ़ता है

और वसु मुंह बाए बात की तह तक जाने की कोशिश करती रह जाती है. क्यों हर बात को चिल्ला कर कहना? आज उस ने निश्चय किया कि विभोर से बात करेगी. जीवन इस तरह से तो नहीं जीया जा सकता.

‘‘विभोर आपसे एक बात कहनी है,’’ वसु

ने पूछा.

‘‘बोलो.’’

विभोर के स्वर में अनावश्यक आक्रोश था, फिर भी वसु ने अपने को सामान्य बनाते हुए कहा, ‘‘आप जैसा कहते हो मैं वैसा ही करने की कोशिश करती हूं. औफिस के जाने के पहले पूरा काम कर के जाती हूं, आ कर पूरा करती हूं, लेकिन आप की शिकायतें कम ही नही होती हैं.’’

‘‘मैं तो दुखी हो गया तुम्हारे कामों से, कोई काम ढंग से करती नहीं हो और जो ये घर के काम कर रही हो कोई एहसान नहीं है, तुम्हें ही करने हैं. सुना नहीं पूज्य नीमा बाबा कह रहे थे कि स्त्रियों का धर्म है पति की सेवा करना, घर को सुचारु रूप से चलाना यही तुम्हारे कर्तव्य हैं. परिवार में किसी को शिकायत का मौका न मिले… न ही घर से बाहर नौकरी करना.’’

‘‘और पुरुषों के लिए क्या कर्तव्य हैं? यह भी बताओ विभोर.’’

‘‘तुम तो बस हर बात में कुतर्क करती हो. जो कहता हूं वह तो मानती नहीं, फिर चाहती हो प्यार से बात करूं,’’ उपेक्षाभरे वचनों का उपदेश सा दे कर विभोर निकल गया.

वसु के आगे के शब्द उस के गले में घुट गए. कितने विश्वास से आज उस ने सम?ाने की कोशिश की थी.

वसु सोचने लगी कि क्या दुख की सिर्फ इतनी परिभाषा है कि सब्जी में नमक कम या ज्यादा हो और दुखी हो इंसान तड़प उठे. यह तो ऐसा लगता है कि दुख का उत्सव सा मना रहे हैं. बहुत अजीब व्यवहार है और ये जो प्रवचन देते रहते हैं, नित्य नए बाबा बनाम ढोंगी, कभी पंडालों में, कभी वीडियो बना जिन का सिर्फ एक ही मत है कि स्त्रियों को कैद कर दो.

एक भी सांस अपनी मरजी से न ले पाएं. क्या अन्य विषय ही खत्म हो गए हैं? बातें भी

सिर्फ स्त्री विरोधी. वैसे देवी की संज्ञा से विभूति करते नहीं थकते.

वसु का मन करता इसे काश पति को समझ पाती. हार कर वह खुद को ही समेट लेती. आखिर चुनाव भी तो उस का ही था.

पापा ने कहा था, ‘‘बेटा, देख ले विभोर के पिता नही हैं, जीवन में कठिनाइयां अधिक होंगी, उन लोगों को तेरा औफिस में काम करना पसंद नहीं, फिर भी मैं ने उन्हें मना लिया है. आगे तुझे ही संभालना है.’’

‘‘पापा मुझे पैसे की लालसा नहीं है  आप भी जानते हैं, समझदार, सुलझा जीवनसाथी हो तो जीवन खुशियों से भर हो जाता है.’’

तब आदर्श विचारों से भरी बिन देखे ही विभोर के प्रति अनुरक्त हो उठी थी और मन में सोचा था, पिता नहीं हैं तो जीवन की समझ अवश्य आ गई होगी, समझदार इंसान होगा, परेशानियां इंसान को अनुभवी जो बना देती हैं.

पापा ने एक बार फिर दोहराया था कि एक बार फिर सोच ले बेटा और भी रिश्ते हैं. लेकिन भावुक वसु ने अपना मन विभोर को सौंप दिया था और फिर दोनों की शादी हो गई. तब कहां जानती थी 21वीं सदी में भी कोई स्त्री स्वतंत्रता के इतने खिलाफ हो सकता है. सुबहशाम टीवी पर आने वाले बाबाओं को सुन मानसिक विकृति पाल सकता है, अपना समय जो व्यायाम आदि में लगाना चाहिए उसे इस तरह नष्ट कर सकता है. कोई बुजुर्ग हो तो समझ भी ले लेकिन इस तरह काम छोड़ नकारा बन अर्थरहित बातों के लिए समय नष्ट करना वसु को मूर्खता लगती.

पढ़ेलिखे विभोर का बाबाओं के प्रवचन सुनना वसु को आश्चर्यजनक भी लगता था. आज के समय में जब स्त्री के आर्थिक सहयोग के बिना घर की व्यवस्था सुचारु रूप से चलाना संभव नहीं वहां ये बातें महज कुत्सित मानसिकता या पुरुष के बीमार अहम का हिस्सा भर हैं.

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