नलिनी शीशे के सामने खड़ी हो स्वयं को निहारने लगी. खुले गले का ब्लाउज, ढीला जुड़ा, खुला पल्लू, माथे पर अपनी साड़ी के रंग से मिलता हुआ बड़ी सा बिंदी, पिंक कलर की लिपिस्टिक और गले में लंबा सा मंगलसूत्र… इन सब में नलिनी बेहद ही आकर्षक लग रही थी. कल रात ही उस ने तय कर लिया था कि उसे क्या पहनना है और कीर्तन में जाने के लिए किस तरह से तैयार होना है.
सुबह होते ही उस ने अपनी बहू नैंसी से कहा, “नैंसी, जरा बेसन, हलदी और गुलाबजल मिला कर कर लेप तैयार कर लेना, बहुत दिनों से मैं ने लगाया नहीं है. पूजापाठ, भजनकीर्तन और प्रभु चरणों में मैं कुछ इस तरह से लीन हो जाती हूं कि मुझे अपनी ओर ध्यान देने का वक्त ही नहीं मिल पाता.”
नलिनी की बातें सुन नैंसी मंदमंद यह सोच कर मुसकराने लगी कि हर सोमवार मम्मीजी यही सारी बातें दोहराती हैं जबकि वह सप्ताह में 2-3 बार अपने चेहरे पर निखार के लिए लेप लगाती ही हैं और भजनकीर्तन से ज्यादा वह खुद के लुक पर ध्यान देती हैं.
नैंसी होंठों पर मुसकान लिए हुए बोली,”मम्मीजी, इस बार आप यह इंस्टैंट ग्लो वाला पील औफ ट्राई कर के देखिए.”
नैंसी के ऐसा कहते ही नलिनी आश्चर्य से बोली,”क्या सचमुच इंस्टैंट ग्लो आता है?”
“आप ट्राई कर के तो देखिए मम्मीजी…” नैंसी ने प्यार से कहा. वैसे दोनों सासबहू के बीच कोई तालमेल नहीं था. एक पूरब की ओर जाती, तो दूसरी पश्चिम की ओर. नलिनी को खाने में जहां चटपटा, मसालेदार पसंद था, वहीं नैंसी डाइट फूड पर जोर देती. नलिनी चाहती थी कि कालोनी की बाकी बहुओं की तरह नैंसी भी घर पर साड़ी ही पहने लेकिन वह ऐसा नहीं करती क्योंकि उसे काम करते वक्त साड़ी में असुविधा महसूस होती इसलिए वह घर पर सलवार सूट पहन लेती ताकि घर पर शांति बनी रहे और बात ज्यादा न बढ़े लेकिन यह भी नलिनी को नागवार ही गुजरता.
नैंसी की एक और बात नलिनी की आंखों में चुभती और वह थी नैंसी का भजनकीर्तन से दूर भागना. इस बात को ले कर कालोनी की सभी औरतें नलिनी को तानें भी दिया करती थीं कि कैसी बहू ब्याह कर लाई हो, जो पूजापाठ और भजनकीर्तन में भाग लेने के बजाय वहां से भाग लेती है. नलिनी की घनिष्ठ सहेली सुषमा तो उस से कई बार यह कहने से भी नहीं चूकती कि तेरी बहू तो बिलकुल भी संस्कारी नहीं है. यह सुन कर नलिनी का पारा चढ़ जाता और वह नैंसी पर दबाव डालती कि वह भी बाकी बहुओं की तरह सजधज कर पूजाअर्चना में अपनी सक्रिय भूमिका निभाए लेकिन नैंसी साफ मना कर देती क्योंकि वह किसी के भी दबाव में आ कर ऐसा कोई काम नहीं करना चाहती थी जिसे करने का उस का अपना मन न हो. इसी वजह से कई बार दोनों के मध्य कहासुनी भी हो जाती.
नैंसी का मानना था कि कर्म ही पूजा है और हर इंसान को अपना काम पूरी ईमानदारी से करना चाहिए. नैंसी की इसी सोच की वजह से वह अपना समय औरों की तरह पूजापाठ में नहीं गंवाती, जो कालोनी की महिलाओं को बुरा लगने का एक बहुत ही बड़ा कारण था.
नलिनी और नैंसी के बीच लाख अनबन हो लेकिन जहां फैशन की बात आती दोनों एक हो जातीं और नलिनी, नैंसी के फैशन टिप्स जरूर फौलो करती क्योंकि नैंसी का फैशन सैंस कमाल का था. उस के ड्रैससैंस, मेकअप और हेयरस्टाइल के आगे सब फीका लगता.
नलिनी फेस पैक का डब्बा नैंसी से लेते हुई बोली,”आज कालोनी की सभी औरतें कीर्तन में आएंगी न, इसलिए मुझे भी थोड़ा ठीकठाक तैयार हो कर तो जाना ही पड़ेगा. वैसे तो मैं बाहरी सुंदरता पर विश्वास नहीं रखती, मन की सुंदरता ही मनुष्य की असली सुंदरता होती है लेकिन तुम तो जानती ही हो कि यहां की औरतों को खासकर वह शालिनी न जाने अपनेआप को क्या समझती है. उसे तो ऐसे लगता है जैसे उस से ज्यादा सुंदर इस कालोनी में कोई है ही नहीं और जब से दादी बनी है इतराती फिरती है. हर किसी से कहते नहीं थकती है कि मेरी त्वचा से किसी को मेरी उम्र का पता ही नहीं चलता. जब तक मैं किसी को न बताऊं कि दादी बन गई हूं, कोई जान ही नहीं पाता. भला कोई जान भी कैसे पाएगा… चेहरे पर इतना मेकअप जो पोत कर आती है. भजन में आती है या फैशन शो में कौन जाने…
नैंसी बिना कुछ कहे नलिनी की बातें सुन कर केवल मुसकरा कर वहां से चली गई क्योंकि नैंसी भलीभांति जानती है कि स्वयं नलिनी भी कालोनी की उन्हीं औरतों में से एक है जो लोगों के सामने खुद को खूबसूरत दिखाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ती. भजनकीर्तन, पूजापाठ, व्रतअनुष्ठान यह सब इस सोसाइटी की ज्यादातर महिलाओं के लिए एक मनोरंजन और टाइमपास का साधन मात्र ही है जिस में दिखावा और ढोंग से ज्यादा कुछ नहीं है. असल में यहां की ज्यादातर महिलाएं केवल सजसंवर कर मंदिर प्रांगण में खुद को सुसंस्कृत साबित करने में लगी रहती हैं. अपनी भव्यता महंगी साड़ियों और गहनों का प्रर्दशन करना ही उन का मुख्य उद्देश्य होता है. आस्था, श्रद्धा जैसे बड़ेबड़े शब्द तो सिर्फ दिखावा व स्वांग मात्र ही है. इस बात से नैंसी पूर्ण रूप से अवगत थी.
हर सोमवार की तरह आज भी दुर्ग शहर के पौश कालोनी साईं परिसर में शाम को सोसाइटी कंपाउंड के मंदिर प्रांगण में भजनकीर्तन का आयोजन रखा गया था. इसलिए नलिनी सुबह होते ही अपने चेहरे पर निखार लाने में जुट गई थी और सारा दिन शाम की तैयारी में ही लगी रही. निर्धारित समय पर पूरी तरह से सजसंवर कर इतराती हुई बुदबुदाई,’आज कीर्तन में सब की नजरें सिर्फ मुझ पर और मुझ पर ही होंगी,’ तभी नलिनी का फोन बजा,”हैलो… नलिनी, भजन संध्या के लिए तैयार हुई या नहीं? मैं और मेरी बहू निकल रहे हैं,” नलिनी की खास सहेली सुषमा बोली जो उसी सोसाइटी की रहने वाली थी.
“हां, बस निकल ही रही हूं. तुम दोनों सासबहू निकलो मैं तुम्हें गेट पर ही मिलती हूं,” नलिनी अपने मेकअप का टचअप करती हुई बोली.
“अरे…क्या तुम अकेले ही कीर्तन में आ रही हो, नैंसी क्यों नहीं आ रही है?”