“अब क्या बताऊं सुषमा, तुम तो जानती ही हो नैंसी को, उस का मन कहां लगता है इन सब में, उस से तो बस फैशन करवा लो, बिना मिर्चमसाला के खाना बनवा लो या फिर इधरउधर घूमने को कह दो, एक पैर में खड़ी रहती है,” नलिनी दुखी और शिकायती अंदाज में बोली “अच्छा छोड़ इन सब बातों को, ठीक ही है जो वह नहीं आ रही है. वैसे भी मुझे तुम्हें बहुत जरूरी बात बतानी है, जो मैं उस के सामने तुम्हें बता नहीं पाऊंगी. अब तुम जल्दी बाहर मिलो मैं फोन रखती हूं,” अपनी सारी बातें रहस्यमय तरीके से कहने के बाद सुषमा ने फोन रख दिया.
सोसाइटी के मंदिर प्रांगण में मेला सा लगा हुआ था. खूब धूम मची हुई थी, यह एक प्रकार का साप्ताहिक मेला का आयोजन जैसा ही था. हफ्ते में 1 दिन भजनकीर्तन सभी महिलाओं के मनोरंजन के साथ ही साथ सुसंस्कारी होने का परिचायक भी था.
आसपास के सोसाइटी की औरतें भी पूरे मेकअप में इतना सजधज कर आई थीं जैसे शादीब्याह में आई हों या फिर कोई फैशन शो चल रहा हो. छोटेछोटे समूह बना कर सभी औरतें एकदूसरे से गुफ्तगू करने में लगी हुई थीं. उन में से कोई अपने कान का नया झुमका दिखा रही थी, तो कोई अपनी साड़ी पर इतरा रही थी, कोई अपनी सास की दुष्टता के कर्मकांड बयां कर रही थी. कोई अपनी बहू के आतंक पर रो रही थी, तो कोई अपने ही घर की कहानी सुना रही थी. सभी अपनीअपनी गाथाएं सुनाने में लगी हुई थीं.
नलिनी भी अपनी संगी सुषमा और उस की बहू के संग प्रांगण में पहुंची. वहां पहुंचते ही सुषमा की बहू रमा अपनी सास को छोड़ कर कर अपनी हमउम्र और अपनी सहेलियों के पास खिसक ली. खूब ढोल, ताशे और मंजीरे बजे, भक्ति गीतों से पूरा परिसर गुंजायमान हो उठा. कुछ बुजुर्ग महिलाएं वहां पर उपस्थित महिलाओं को भजनकीर्तन, पूजाअर्चना का जीवन में महत्त्व समझा कर अपनेअपने घरों का पोथापुराण ले कर बैठ गईं और फिर बाकी महिलाएं भी इधरउधर की बेकार की बातें ले कर शुरू हो गईं. यह सब हर सप्ताह का दृश्य था.
नलिनी और सुषमा दोनों भजन के बाद अलगथलग एक कोने में जा बैठीं तब नलिनी ने कहा,”तुम फोन पर कह रही न कि तुम मुझे कुछ बताना चाहती हो तो अब बताओ तुम क्या बताना चाहती हो.”
सुषमा ठंडी सांसें भरती हुई बोली,”देखो नलिनी, मैं तुम से जो कहने जा रही हूं उसे धैर्य और ध्यान से सुनना. तुम्हारी बहू नैंसी संस्कारी नहीं है यह बात तो तुम जानती ही हो लेकिन यह नहीं जानतीं कि अब वह इस बात को पूरी तरह से सिद्ध करने जा रही है. जिस बहू के पास भजनकीर्तन के लिए समय नहीं है, उस के पास अपने सासससुर और परिवार के लिए समय कहां से होगा,” यह सुन नलिनी आश्चर्य से सुषमा का हाथ थामती हुई बोली,”तुम क्या कह रही हो मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, तुम साफसाफ कहो न तुम्हें जो भी कहना है.”
तभी सुषमा धीरे से बोली,”नैंसी, तुम्हें और तुम्हारे पति को वृद्धाश्रम भेजने की तैयारी कर रही है, मेरी बहू रमा ने उसे वृद्धाश्रम से बाहर निकलते हुए देखा था और उस के हाथों में कुछ कागज भी थे, शायद वृद्धाश्रम के फौर्म होंगे…”
सुषमा का इतना कहना था कि नलिनी की आंखें भर आईं, उस के और नैंसी के बीच विचारों का मदभेद अवश्य था लेकिन इतना भी नहीं था कि नैंसी उन्हें ओल्डऐज होम भेजने की सोचे. नलिनी की आंखों में पानी देख सुषमा बोली,”मैं ने तो तुझे पहले ही कहा था कि नैंसी को सत्संग और भजनकीर्तन में अपने साथ जबरदस्ती ले कर आया कर तभी तो वह संस्कारी बन पाएगी लेकिन तुम ऐसा कर नहीं पाई, यह उसी का नतीजा है. मेरी बहू को देख सुबहशाम ईश्वर आराधना करती है, मन लगा कर भजनकीर्तन करती है तभी तो संस्कारी है, धर्मकर्म, पापपुण्य सब जानती है इसलिए परिवार को साथ ले कर चलती है.”
सुषमा और नलिनी की बातें अभी समाप्त नही हुई थीं लेकिन धीरेधीरे अब मंदिर परिसर खाली होने लगा था. सब अपनेअपने घर की ओर जाने लगे थे. तभी सिर पर पल्लू ओढ़े रमा भी वहां आ गई और सुषमा से बोली,”मम्मीजी, चलिए अब हम भी चलते हैं.”
सुषमा उठ खड़ी हुई और नलिनी से बोली,”चलो नलिनी.”
नलिनी शांत रही फिर बोली,”तुम दोनों चलो मैं थोड़ी देर रुक कर जाऊंगी.”
नलिनी के ऐसा कहने पर सुषमा और उस की बहू चले गए. नलिनी काफी देर तक अकेली बैठी रही फिर मन में कुछ निश्चय कर घर लौट आई. नलिनी देर से लौटी है यह देख नैंसी दौड़ कर उस के करीब आ कर बोली,”मम्मीजी, आज आप को आने में बहुत देर हो गई, मैं कब से आप की राह देख रही थी.”
नलिनी ने कोई जवाब नहीं दिया और अपने कमरे की ओर मुड़ गई. तभी उस की नजर टेबल पर रखे कागज पर पड़ी जिस में बड़ीबड़ी अक्षरों में वृद्धाश्रम लिखा था, जिसे पढ़ने के लिए नलनी को चश्मे की जरूरत नहीं थी. नलिनी समझ गई कि सुषमा जो कह रही थी वह सही है.
नलिनी की आंखों से लुढ़कते हुए आंसू उस के गालों पर आ गए और वह फौरन अपने कमरे में चली गई और दरवाजा अंदर से बंद कर लिया. नैंसी ने बहुत आवाज लगाई लेकिन नलिनी ने दरवाजा नहीं खोला, बस इतना कहा कि कुछ देर के लिए मैं अकेले रहना चाहती हूं. नैंसी चुपचाप दरवाजे से लौट गई, उसे कुछ समझ नहीं आया.
उस रात नलिनी ने किसी से कोई बात नहीं की. नैंसी के लाख मनुहार के बाद भी नलिनी ने खाना भी नहीं खाया. नलिनी के पति सौरभ ने पूरी कोशिश की कि नलिनी कुछ बोले लेकिन वह कुछ नहीं बोली जैसे उस ने न बोलने का प्रण कर लिया हो इस प्रकार मौन रही. इसी प्रकार 4 दिन बीत गए 5वें दिन नलिनी अपना और अपने पति का सामान पैक करने लगी. यह देख सौरभ बोले,”यह सब तुम क्या कर रही हो?”
नलिनी बिना जवाब दिए पैकिंग में लगी रही तभी वहां नैंसी और उस के पति अमन भी आ गए. नलिनी को इस प्रकार सामान पैक करता देख नैंसी से रहा नहीं गया और वह जोर से बोली,”मम्मीजी, यह सब क्या है, न आप ठीक से खाना खा रही हैं, न किसी से कुछ बोल रही हैं और अब यह पैकिंग… जब तक आप हमें बताएंगी नहीं कि प्रौब्लम क्या है हमें पता कैसे चलेगा… आप बताइए तो सही कि आखिर बात क्या है?”