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बात 5 साल पहले की है. मेरी शादी को 1 साल हो चुका था. पर अमन और मेरे विचारों में इतना अंतर था कि अकसर हमारे बीच छोटीछोटी बातों को ले कर बहस होती रहती थी. हद तो एक दिन तब हो गई जब अमन शाम को गुस्से में घर आए और आते ही मुझे जोरजोर से पुकाराना शुरू का दिया.

मैं ऊपर के कमरे से जल्दी से नीचे आ गई, ‘‘क्या हुआ अमन सब ठीक तो है न?’’

‘‘नहीं, तुम्हारे रहते कुछ भी ठीक नहीं हो सकता. आज तुम्हारी वजह से औफिस में मेरी बहुत बेइज्जती हुई,’’ अमन की आंखें लाल हो चुकी थीं.

‘‘पर मैं ने क्या किया?’’ मैं ने भी गुस्से में पूछा.

मुझे गुस्से में देख कर अमन और गुस्से में आ गए, ‘‘तुम जैसी अनपढ़ और गंवार के साथ मेरी जिंदगी नर्क बन गई है. तुम ने आज खाने में नमक इतना मिला दिया था कि लंच टाइम में सब ने मेरी हंसी उड़ाई.’’

‘‘देखो अमन, पहली बात तो यह कि मैं अनपढ़ नहीं हूं और दूसरी बात यह कि अगर एक दिन नमक थोड़ा ज्यादा हो गया तो कौन सा तूफान आ गया? आप वह खाना फेंक कर बाजार से कुछ और मंगवा लेते,’’ मैं ने चिल्ला कह कहा.

मुझ से मेरे इस तरह का जवाब सुन कर अमन गुस्से से कांपने लगे और मेज पर पड़ा फूलदान उठा कर मेरी तरफ फेंक दिया. अगर वक्त रहते मैं वहां से हटी न होती तो मेरा सिर फट जाता. अब तो मामला बरदाश्त से बाहर हो चुका था. सब्जी में नमक थोड़ा ज्यादा होने पर अमन हाथ उठा सकते हैं, ऐसा मैं ने सोचा भी नहीं था. वह रात जैसेतैसे कट गई पर सुबह होते ही मैं ने अमन से कह दिया कि जो कुछ रात को हुआ अगर वह दोबारा हुआ तो मैं गांव से आप के मांबाप को बुला लूंगी. अमन अपने मांबाप की बहुत इज्जत करते थे, इसलिए मेरी बात का असर उन पर तुरंत हुआ. कुछ दिन शांति से निकल गए पर उन का गुस्सा उन्हें कैसे छोड़ता.

एक दिन हम दोनों उन के एक दोस्त के घर गए. वहां उन के दोस्त की पत्नी, जो फैशन डिजाइनर हैं, अपने कपड़ों की खुद तारीफ कर रही थीं. अमन का मूड खराब हो गया. घर आ कर वे मु?ा पर फिर ?ाल्ला उठे, ‘‘तुम्हें कपड़े पहनने की तमीज भी नहीं.’’

इतना कह कर वे सोने चले गए और मैं ने वहीं सोफे पर सारी रात अपने से बातें करने में निकाल दी.

सुबह मैं ने एक फैसला लिया. मैं चाय बना कर अमन के पास गई. उन्हें बहुत प्यार से जगाया और चाय का कप पकड़ा कर प्यार से कहा, ‘‘अमन, आप को शायद ठीक ही लगता है, मैं आप के लायक नहीं हूं. क्या आप मुझे एक मौका देंगे?’’

अमन ने चाय का एक घूंट ही भरा था. उन का हाथ रुक गया और वे हैरानी से पूछने, ‘‘मौका, कैसा मौका?’’

‘‘मैं नौकरी करना चाहती हूं, ताकि दिल्ली में रहने के तौरतरीके सम?ा सकूं और आप के लायक बन सकूं. मैं ने ग्रैजुएशन कर रखा है. मुझे छोटीमोटी नौकरी तो मिल ही जाएगी. वैसे भी घर पर तो मैं सारा दिन बोर ही होती रहती हूं. बाहर जाऊंगी तो कुछ सीखने को मिलेगा,’’ मैं ने एक ही सांस में सब कुछ बोल दिया.

‘‘नौकरी, पर…,’’ अमन ने थोड़ा गंभीर हो कर कहा.

मैं ने उन को बीच में ही टोक दिया, ‘‘पर कुछ नहीं, नौकरी करूंगी तो यहां का अंदाज भी समझ आ जाएगा. फिर आप को मुझे कहीं ले जाने में शर्म नहीं आएगी.’’

‘‘देखो शिवानी, तुम्हारे नौकरी करने में मुझे कोई एतराज नहीं है पर तुम नहीं कर पाओगी. यह दिल्ली है, यहां अंगरेजी आनी जरूरी है. तुम से नहीं हो पाएगा, तुम रहने दो,’’ उन्होंने चाय का कप एक तरफ रखते हुए कहा.

‘‘पर मुझे एक मौका तो दीजिए,’’ मैं ने उन का हाथ पकड़ लिया.

‘‘ठीक है, तुम करना चाहो तो कोशिश कर लो, पर मुझे पता है कि तुम्हारा यह जोश जल्दी ही ठंडा पड़ जाएगा,’’ वे एक अजीब सी हंसी हंस कर बाथरूम में फ्रैश होने चले गए.

उन की उस हंसी ने मेरे नौकरी करने के इरादे को और पक्का कर दिया. अखबारों में विज्ञापन देखदेख कर मैं ने 1 हफ्ते में 10 इंटरव्यू दे डाले पर कुछ हाथ न लगा.

मेरी इतनी भागदौड़ का फल मुझे एक दिन मिल गया. एक कंपनी में मुझे सेल्सगर्ल की नौकरी मिल गई. इस पर भी अमन ने एक कांटा यह कह कर चुभा दिया कि जो नौकरी तुम को मिली है उसे तो दिल्ली की कालेज की लड़कियां अपनी छुट्टियों में टाइम पास करने के लिए करती हैं. उन की इस बात से नौकरी मिलने का जोश थोड़ा थम गया पर ठंडा नहीं हुआ.

औफिस के काम में सारे दिन का पता ही नहीं चलता था. मुझे अपने काम के सिलसिले में बहुत लोगों से मिलनाजुलना होता था, जिन में से कुछ अमन जैसे घमंडी और गुस्सैल होते थे तो कुछ साहिल जैसे शांत. साहिल मेरे साथ काम करता था. मैं सेल्स में थी तो वह अकाउंट में. काम के सिलसिले में हम अकसर बात करते थे.

वह बहुत शांत और समझदार इंसान था. सारा औफिस उस की तारीफ करता था. हर किसी की मदद करने में वह सब से आगे रहता था. मेरी पहली नौकरी थी, इसलिए सब से ज्यादा मुझे ही उस की मदद की जरूरत पड़ती थी.

साहिल के प्रमोशन की पार्टी थी. उस ने औफिस के सभी लोगों को अपने घर पर बुलाया था. उस की मां से मिल कर पता चला कि साहिल के पिताजी बचपन में ही गुजर गए थे और उन्होंने किस तरह मेहनत कर के साहिल को काबिल बनाया था. साहिल की मां मेरठ की थीं और शादी के बाद दिल्ली आई थीं. उन से मिल कर मुझे अपनी मां की याद आ गई थी.

उस दिन घर वापस आने में थोड़ी देर हो गई. मुझे डर था कि कहीं अमन गुस्सा न हो जाए, पर मेरी सोच से उलट अमन ने घर का दरवाजा खोलते ही नाराज होने के बजाय मेरे सूट की तारीफ की. उस रात अमन का मूड बहुत अच्छा था. अगली सुबह अमन ने बताया कि उन को 4 दिन के लिए औफिस के काम से पुणे जाना है. मैं ने उन को कहा कि मैं अकेली कैसे रहूंगी तो उन्होंने कहा कि अब तुम भी नौकरी करती हो, अपनेआप में थोड़ा आत्मविश्वास जगाओ.

अमन चले गए तो सिर्फ अपने लिए लंच बनाने का दिल नहीं हुआ. औफिस में लंच टाइम में कैंटीन गई तो वहां साहिल को देख कर मुझे हैरानी हुई, क्योंकि साहिल की मां ने बताया था कि साहिल बाहर का खाना नहीं खाते.

मैं ने साहिल के सामने वाली कुरसी पर बैठते हुए पूछा, ‘‘साहिल, आप तो बाहर का खाना नहीं खाते, फिर आज कैंटीन में कैसे?’’

‘‘बस यों ही, मांजी की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं थी इसलिए,’’ उस के चेहरे पर थोड़ी परेशानी आ गई.

‘‘क्या हुआ मांजी को?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कल रात से बुखार है. अगर मुझे मैनेजर को इस महीने की रिपोर्ट नहीं देनी होती तो आज घर पर ही रुक जाता,’’ उस के चेहरे पर परेशानी दिख रही थी.

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