देवांशी परेशान अदिति के कंधे पर हाथ रखती हुई बोली, ‘‘क्या वाकई, तुम्हारा प्यार छलावा था?’’
‘‘कैसी बात कर रही है? मेरी जान है धु्रव… प्यार करती हूं तभी तो उस के लिए ये सब कर रही हूं. हाय एक टैडीबियर हमारे प्यार को साबित करेगा… ये सब कितनी बेवकूफी है.’’
अदिति के मुंह से ये सब सुन कर देवांशी को पहले तो हंसी आई पर फिर गंभीर हो कर बोली, ‘‘सब जानती है तो क्यों ये सब धु्रव से छिपा रही है? वहां अर्णव परेशान है और यहां तुम.’’
‘‘फिर क्या करूं बता?’’ अदिति मायूसी
से बोली.
देवांशी कुछ सोचते हुए कहने लगी, ‘‘चलो, अब इतने झूठ बोले हैं तो एक और बोल दो. कह दो कि टैडी कोई बच्चा उठा ले गया या फिर तुम्हारी मम्मी ने किसी को दे दिया अथवा गुम हो गया.’’
अदिति चहकी, ‘‘हां देवांशी, यह गुम होने वाला आइडिया सब से अच्छा है, क्योंकि लेनेदेने वाले आइडिया में पाने की कोई न कोई गुंजाइश होती है पर गुम हुआ यानी मिलने की न के बराबर उम्मीद है,’’ यह कहते ही उत्साहित अदिति के चेहरे पर सुकून छा गया. जैसे कोई बहुत बड़ा निबटारा हो गया हो.
दूसरे दिन देवांशी को अदिति ने फोन पर सूचित किया कि उन की तरकीब काम
कर गई है. अर्णव ने अपने जीजू से माफी मांगते हुए टैडी के गुम होने की बात कह दी. धु्रव एक बार फिर बहकावे में आ गया… उस से झूठ बोलना अच्छा नहीं लगा. फिर भी अदिति खुश थी कि इस टैडी वाले प्रसंग से हमेशा के लिए पीछा छूटा…
इस बात को हफ्ता बीत गया. उन की शादी की सालगिरह आ गई. शादी की सालगिरह पर घरबाहर के बहुत सारे मेहमान आए. बड़ों के आशीर्वाद और संगीसाथियों की ढेर सारी बधाइयों के बीच दोनों यानी धु्रवअदिति सब के आकर्षण के केंद्र बने थे.
इस फंक्शन में अर्णव भी आया था. फंक्शन के बाद मौका पा कर अदिति ने अपने भाई को आड़े हाथों लिया.
तब उस ने भी इस बेवजह के अवांछित प्रसंग को ले कर और अपनी गर्लफ्रैंड के साथ
उस अपरिपक्व हरकत पर अफसोस जाहिर करते हुए इतने दिनों बाद उठी बात पर खुलासा किया, ‘‘दीदी, मेरी और अंजना की लड़ाई के बीच आप फंस गईं. हुआ यों कि ब्रेकअप के बाद… कुछ महीने सब ठीक रहा पर अचानक एक दिन उस ने मुझे से टैडी मांग लिया. मुझे भी बहुत अजीब लगा.
‘‘शुरू में मैं ने टाला आप की वजह से. पर वह जिद करने लगी कि उसे अपना टैडी चाहिए ही चाहिए. ऐसे में मैं ने सोचा कि कहीं उसे यह न लगने लगे कि मैं अब भी उस में रुचि रखता हूं… फिर एक दिन मेरा और आप का झगड़ा हो गया. बस उसी का फायदा उठा कर मैं ने तुम से जबरदस्ती टैडी मांग कर उस के हवाले कर के मुसीबत से पीछा छुड़ा लिया.’’
‘‘और मेरी मुसीबत बढ़ा दी पागल…’’
‘‘पर दीदी मैं ने भी उसे दिए सारे गिफ्ट मांग लिए थे.’’
‘‘पर उस से क्या अर्णव… ऐसा भी क्या टैडी से मोह जो उस के बगैर नहीं रह पाई… उस टैडी में कहीं तू तो नहीं दिखता था उसे?’’
‘‘अरे नहीं दीदी,’’ वह खिसिया कर बोला.
अदिति तुरंत उसे चिढ़ाती हुई कहने लगी, ‘‘फिर पक्का उस ने अपने दूसरे बौयफ्रैंड को टिका कर अपने पैसे बचाए होंगे… पर सच, तुम दोनों की बेवकूफी में मैं अच्छा फंसी.’’
‘‘अरे अब माफ भी कर दे न,’’ अर्णव प्यार से बोला.
‘‘किस बात की माफी मांगी जा रही है साले साहब?’’ अचानक ध्रुव की आवाज कानों में पड़ी. धु्रव को अचानक कमरे में आता देख दोनों संभल कर बैठ गए. अर्णव उठते हुए बोला, ‘‘कुछ नहीं जीजू, आज शाम को मैं देर से क्यों आया इस बात को ले कर आप की बीवी मुझे डांट रही है… अच्छा दीदीजीजू अब बाकी बातें कल करेंगे. थक गया हूं.’’ कह वह सोने चला गया.
दूसरे दिन सुबह सब सो रहे थे. लगातार बजती कौलबैल से अदिति की नींद खुली तो देखा दरवाजे पर अटैची के साथ खड़ी एक लड़की भाभी कहते हुए उस के गले लग गई. अदिति को हैरानी से ताकते देख कर वह मुसकराई और फिर भीतर आते हुए बोली, ‘‘अरे भाभी, मैं नीलांजना… धु्रव भैया कहां हैं…?’’
अदिति को याद आई धु्रव की कजिन, जो शादी के एन मौके पर एमबीए करने के लिए आस्ट्रेलिया चली गई थी. अदिति से बात करते वह इधरउधर देखते हुए बड़े इत्मिनान और हक से भीतर आते बोली, ‘‘देखो भाभी, मुझ पर कबाब में हड्डी होने का आरोप न लगे, इसलिए मैं कल नहीं आई…’’
नीलांजना की बात पर अदिति कुछ कहती उस से पहले ही धु्रव की आवाज आ गई, ‘‘कबाब में हड्डी तो कल आ ही गई थी हमारे बीच तुम भी आ जाती तो कोई फर्क नहीं पड़ता.’’
धु्रव का इशारा अर्णव की तरफ है, यह समझ कर अदिति ने उसे घूरा तो गुस्ताखी माफ कहते हुए उस ने धीरे से कान पकड़ लिए.
‘‘क्या हुआ कोई और भी आया
है क्या?’’
नीला के पूछने पर अदिति ने कहा, ‘‘मेरा छोटा भाई आया है.’’
‘‘ओह, ग्रेट…’’ कहते हुए उस की नजर मेज पर बिखरे ढेर सारे गिफ्टों पर चली गई, ‘‘वाऊ, कितने सारे गिफ्ट हैं. अभी तक खोले नहीं… मेरा इंतजार कर रहे थे क्या? जानती हैं भाभी कि गिफ्ट खोलना मुझे बहुत अच्छा लगता है…’’ कहते हुए वह उत्साह से मेज की ओर बढ़ी तो अदिति ने उसे हैरानी से देखा. लगा ही नहीं कि वह नीलांजना से पहली बार मिल रही है.
धु्रव ने भी एक बार को उसे टोका, ‘‘अरे रुक जा…पहले कुछ खापी ले…’’
‘‘हांहां बस, चायबिस्कुट लूंगी. भाभी अगर आप बुरा न मानें तो क्या मैं गिफ्ट खोलू?’’ वह मेज के ऊपर रखे गिफ्ट उत्साह से देखती हुई बोली.
‘‘हांहां क्यों नहीं,’’ कहते हुए अदिति कुछ अजीब नजरों से उसे देख कर किचन में आ गई. चाय बना कर लाई तो देखा धु्रव के साथ बैठी नीला गिफ्ट देख कर उत्साहित हो रही थी. लगभग सभी गिफ्ट खुल चुके थे. सिर्फ एक बाकी था.
उसे अदिति की ओर बढ़ाते हुए नीला कहने लगी, ‘‘भाभी, इसे आप खोलो.’’
चाय की ट्रे रख कर अदिति ने उस गिफ्ट को चारों ओर से घुमा कर
देखा. उस पर किसी का नाम नहीं था. ‘‘किस का है, यह… कुछ पता ही नहीं चल रहा है,’’ कहते हुए अदिति ने उसे खोला तो हैरान रह गई. हूबहू वैसा ही टैडीबियर, जिसे वह इतने दिनों से ढूंढ़ती फिर रही थी…
धु्रव मुसकराते हुए बोल रहा था, ‘‘अच्छा तो यह अर्णव का सरप्राइज है,’’ धु्रव अदिति की तरफ देखते हुए बोला.
‘‘मुझे नहीं पता कहां से आया है यह… हाय, यह तो बिलकुल वैसा है,’’ अटपटाते हुए वह बोली. तभी अर्णव की आवाज आई, ‘‘वैसा ही नहीं, वही है दीदी,’’ कमरे में आते हुए अर्णव बोला. फिर वह हैरानी से कभी नीलांजना को तो कभी टैडी को देख रहा था.