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अफसोस, मैं चाह कर भी रातों में उन के दर्द के साथ जागने के और कुछ न कर सकी. बस पैरों को हलकेहलके दबाती रहती. जब हाथों का स्पर्श ढीला पड़ जाता तो वरुण समझ जाते कि मैं थक गई हूं, तब मेरा मन रखने को कह देते कि अब आराम है. सो जाओ. इंदौर तक डाक्टरों से इलाज कराया, मगर रोग था कि पकड़ में ही नहीं आ रहा था.

फिर मित्रों के कहने पर कि बाहर किसी स्पैशलिस्ट को दिखाया जाए. अत: मुंबई दिखाने का तय हुआ. प्रियांश अभी 6-7 माह का ही था. मुझे छोटे बच्चे के साथ परेशानी होगी, इसलिए वरुण के एक मित्र अखिलेशजी और मांजी दोनों ही साथ मुंबई आए. मेरे लिए आदेश था कि तुम चिंता न करो. फोन से सूचना देते रहेंगे. उन्हें गए 2-3 दिन हो गए, मगर कोई खबर नहीं.

मैं रोज पूछती कि क्या कहा डाक्टर ने तो मांजी का यही जवाब होता कि अभी डाक्टर टैस्ट कर रहे हैं, रिपोर्ट नहीं आई है. आने पर पता चलेगा.

5वें दिन मांजी, अखिलेशजी और वरुण तीनों ही बिना किसी सूचना के घर आ गए. मैं तो अचंभित ही रह गई.

‘‘यह क्या मांजी? न कोई फोन न खबर… आप तो इलाज के लिए गए थे न? क्या कहा डाक्टर ने? सब तो ठीक है?’’

मगर सभी एकदम खामोश थे.

‘‘कोई कुछ बताता क्यों नहीं?’’

कोई क्या कहता. सभी सदमे में जो थे.

वरुण का चेहरा भी उतरा था. मांजी को तो मानो किसी ने निचोड़ दिया हो. सब भी था. वह मां भला क्या जवाब देती जिस ने पति के न रहने पर जाने कितनी जिल्लतों को सह कर अपने बेटे को इस उम्मीद पर बड़ा किया कि उस का हंसताखेलता परिवार देख सके. जीवन के अंतिम क्षणों में उस की अर्थी को कंधा देने वाला कोई है तो मौत से भी बेपरवाही थी. मगर आज उसी मां के इकलौते बेटे को डाक्टर ने चंद सांसों की मोहलत दे कर भेजा है.

जी हां, डाक्टर ने बताया कि वरुण को लंग्स कैंसर है जो अब लाइलाज हो चुका है. दुनिया का कोई डाक्टर अब कुछ नहीं कर सकता. उन के अनुसार 4-5 महीने जितने भी निकल जाए बहुत हैं.

जो घर कभी प्रियांश की किलकारियों से गूंजता था वहां अब वरुण के दर्द की कराहें और एक बेबस मां की आंहें ही बस सुनाई देती थीं. मैं उन दोनों के बीच ऐसी पिस कर रह गई थी कि खुल कर रो भी नहीं पाती थी. घर का जब मजबूत खंभा भरभरा कर गिरने लगे तो कोई तो हो जो अंतिम पलों तक उसे इस उम्मीद पर टिकाए रखे कि शायद कोई चमत्कार हो जाए.

घर में अब हर समय मायूसी छाई रहती. किसी काम में मन न लगता, जिंदगी के दीपक की लौ डूबती सी लगती. डाक्टरों ने अपने हाथ खड़े कर दिए थे. फिर भी ममता की डोर और

7 फेरों के अटूट बंधन में अब भी आशा का एक नन्हा दीपक टिमटिमा रहा था.

मगर धर्म और आस्था नाम की तो कोई चीज है नहीं दुनिया में, फिर भी जब व्यक्ति संसार से हताश हो जाता है तो इसी आखिरी छलावे के पीछे भागता है. यों तो कैंसर नाम ही इतना घातक है कि मरीज उस के सदमे से ही अपनी जीजिविषा खो बैठता है.

डाक्टर भी अपनी जगह गलत नहीं थे, मगर बावरा मन भला कैसे मानता? अत: जो जहां भी रोशनी की किरण दिखाता हम वरुण को ले कर दौड़ पड़ते. प्रेम और ममता के आगे विज्ञान का ज्ञान भी धरा रह जाता है.

हम सभी जानते थे कि वरुण एक लाइलाज बीमारी से जूझ रहे हैं. मगर फिर भी कीमो थेरैपी कराई कि कहीं कोई चमत्कार हो जाए, पैसा पानी की तरह बह रहा था. व्यापार तो लगभग ठप्प ही समझो. इधर वरुण की भागमभाग में प्रियांश की अनदेखी होने से वह भी बीमार हो गया. सच जिंदगी हर तरफ से इम्तिहान ले रही थी. हम वरुण को 6 माह से ज्यादा न जिला पाए.

मांजी तो एक जिंदा लाश बन कर रह गईं. अगर प्रियांश न होता हमारे पास, तो शायद हम दोनों भी उस दिन ही मर गई होतीं. मगर जिंदा थे, इसलिए आगे की चिंता सताने लगी. व्यापार खत्म हो चुका था, घर बैंक के लोन से बना था. अभी तो मात्र एकचौथाई किश्तें ही भर पाए थे और अब यह क्रम जारी रहे, उस की कोई संभावना नहीं थी. अत: मकान भी हाथ से जाता रहा.

किसी ने सच कहा है बुरे वक्त पर ही अपनेपराए इनसानों की परख होती है. इस मुश्किल घड़ी में दोनों बहनों ने अपने अनुसार बहुत मदद की, मगर अमृत भैया कुछ मुंह चुराने लगे हैं, यह खयाल एक पल को मन में आया अवश्य था, मगर अचानक परेशानियों के हमले से इतनी विचलित थी कि इस बारे में गंभीरता से सोच सकूं, इतना समय ही नहीं मिला. जबकि मां अभी जिंदा थीं. किंतु शायद मां की हुकूमत नहीं रह गई थी अब घर में, भुक्तभोगी थीं.

अत: समझ पा रही थी कि हमारे समाज में आज भी वैधव्य के आते औरत का रुतबा कम हो जाता है. बचपन वाली वे मां कहीं खो गई थीं, जो मेरे जरा से रोने पर दोनों बहनों कृष्णा व मृदुला और अमृत भैया से उन की चीजें भी मुझे दिला दिया करती थीं.

मन में कहीं कुछ कसकता था तो वह यह कि वरुण के अभाव में प्रियांश को वह खुशी, वह सुख नहीं दे पाई जिस का कि वह हकदार था. हालांकि बहनें उस के खिलौनों और कपड़ों का पूरापूरा ध्यान रखतीं, मगर यह तो स्नेहा था उन का. हक तो फिर भी नहीं. हालात कुछ ऐसे बने कि गृहस्थी, किराए के एक छोटे से मकान में सिमट कर रह गई. हालात इजाजत न देते कि घर से बाहर जा कर कोई नौकरी करती, क्योंकि मांजी और प्रियांश की देखभाल ज्यादा जरूरी थी.

सामने एक तरफ दिशाहीन जीवन था, तो दूसरी ओर प्रियांश का अंधकारमय भविष्य. क्या होगा? चिंता में सीढि़यों पर बैठी थी कि अचानक कृष्णा दीदी को करीब पा कर चौंक गई, ‘‘अरे दीदी आप? कब आईं? पता ही नहीं चला.’’

‘‘अभी आई हूं. तुम शायद किसी सोच में खोई थीं.’’

‘‘हां दीदी, यह बेल देख रही थी, कितने जतन से इसे लगाया था. रोज सींचती थी. देखो कैसे अब फूलों से लद गई है. मन को बहुत सुकून देती यह. मैं ने इसे उस पेड़ के सहारे ऊपर चढ़ा दिया था… देखो न कल रात तेज आंधी से वह पेड़ धराशायी हो गया. अपना आश्रय छिनते ही देखो कैसे जमीन पर आ गिरी है, एकदम निर्जीव… असहाय बिलकुल हमारी तरह… एक आलंबन के बिना हमारी जिंदगी भी तो ऐसी ही हो कर रह गई है… बिलकुल असहाय… है न दीदी?’’

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