वह मुझ से प्रेम करती थी, अगाध प्रेम. जैसा एक स्त्री एक पुरुष से करती है. और हम दोनों ही जानेअनजाने पगलाए रहते हैं. प्रेम में डूबे रहते हैं. सुधबुध सब खो बैठते हैं. दुनियाजहान से अलग कर लेते हैं. बिलकुल वैसा ही प्रेम वह मुझ से करती थी. उस के प्रेम में लेशमात्र भी बनावटीपन न था. न दिखावा, न आग्रह, न संकोच. बस, कभीकभार रूठ जाया करती उतनी देर, जब तक मैं जीभर लाड़मनुहार कर उसे मना न लूं. उस के बाद तो उस का प्रेम और परवान चढ़ जाया करता. जैसे कोई लता वृक्ष की आगोश में समा जाती है, बिलकुल वैसे ही उस की भावनाएं मुझ में समा जातीं.
वह खुद को मुझ में तलाशती और जब पा लेती तो चहक उठती. न पाने पर उदास हो जाती, यह सोचती कि मुझे उस की परवा नहीं.
मैं सब समझती रही और आनंद से अंतस को भिगोती रही. धीरेधीरे उस का मुझ में इस कदर आसक्त होना मुझे अच्छा लगने लगा था. उस की कमी खलने लगी थी. उस से मिलने को, बातें करने को मन करता और फिर फोन पर आवाज सुनते ही चंद मिनटों मे ही मन खिल जाता, ऐसा सब से पहले उस ने ही मुझे बताया था. उस के बाद मुझे भी वही लगने लगा.
धीरेधीरे ही सही, प्रगाढ़ता बढ़ती गई. इस प्रगाढ़ता का समय के साथ सुद्रढ़ हो जाना उसी तरह था जैसा दो लताओं का परस्पर आपस में एक हो जाना और जीवनपर्यंत उसी तरह से समाहित रहना. जलजला, विशालकाय वृक्षों को जड़ से उखाड़ फेंकता है, मगर लिपटी हुई लताओं को छू भी नहीं पाता.
भले ही आधुनिक युग में युवावर्ग कुछ तंग शब्द ले कर आया हो जिस में से लैसबियन जैसे शब्द हैं, जो प्रेम को अलग ही तरह से मापते हैं, जबकि उस समय इन शब्दों की, इन के मानों की कोई जगह न थी. दो व्यक्तियों का आत्मसात होना शुद्ध प्रेम का सूचक होता था.
वह हमेशा मुझे मरमिटने वाली शेरोशायरी से भरे खत लिखती. उन में उस की दिनचर्या का ब्योरा होता, जो उस की भीतरी विकलताओं की हलचल समेटे होता. कुछ सवाल होते जो रोज ही पूछे जाते थे और फिर जवाब का इंतजार भी उसी शिद्दत से करती जैसे व्याकुलता की पोटली बगल में दबाए बैठी हो. मैं ने भी उस के सौम्य प्रेम को बड़े आदर से लिया और यह जताया भी कि मैं भी उस की परवा करती हूं, उसे याद करती हूं. नितांत शांत दिखने वाला मेरा व्यक्तित्व उस की उपेक्षा करने में असमर्थ था. मगर हां, मैं खत लिखने में थोड़ी ढीली जरूर थी. इस की शिकायत करने से वह कभी नहीं चूकती थी. तब मेरे मन के स्वर्णपुष्प कुम्हलाने लगते. मुझे एहसास होता कि अगर रोपे गए पौधे को खादपानी न दिया जाए तो वे मुरझा कर पीले पड़ जाते हैं और एक दिन टहनी से अलग हो कर झड़ जाते हैं.
फोन पर बात करना और खतों को पढ़ने का मिठैला एहसास, इन दोनों ही चीजों का फर्क हम दोनों ही बखूबी समझते थे.
न जाने क्यों अपनी तारीफ सुन कर चहकने, इतराने के बजाय वह खामोशी अख्तियार कर लेती. बावजूद इस के, उस के खतों में ज्यादातर मेरी तारीफों के कसीदे गढ़े होते और यह भी ‘अगर ऐसा हो जाए तो कैसा रहे? वैसा हो जाए तो कैसा रहे?’ हम साथसाथ रहें?’ फिर वह संजीदा हो कर कह उठती- ‘बस, तुम दूर जाने की बात न किया करो, दी.’
दी, शब्द में एक अलग सा ठहराव होता है. एक ऐसा एहसास जो मुझ जैसी अंतर्मुखी, स्वभाव में सिमटी, तथाकथित दुर्लभ वस्तु की तरह मैं के लिए बड़ा ही खास था.
उस रोज़ लिखतेलिखते उस की याद काले, घटाघोर मेघों की तरह उमड़ पड़ी. तब मैं इतनी भावविभोर हो उठी कि मुझ से रहा न गया. आओ चलें प्रेमांजलिभर बगीचे की सैर कर लो, ह्रदय का आदेश था और मैं ने तुरंत लैंडलाइन से फोन मिला लिया.
तब काले और बड़े वाले फोन हुआ करते थे जो अपनी जगह पर स्थाई रहा करते थे और एक जगह रखे रहते थे. उन्हें लगवाने के लिए लंबीलंबी तारें खिंचवाई जाती थीं. उस वक्त मोबाइल, इंटरनैट जैसी सुविधाएं थीं ही नहीं. फोन भी सीधे मिलाना संभव न था. पहले दूरसंचार विभाग को फोन मिलाओ, उसे बताओ कौन सा नंबर चाहिए? फिर वह नंबर मिला कर देता था. तब जा कर बात हो पाती थी. उस पर भी एक भय, विभाग कर्मचारी उन की बातचीत को सुन न ले. शायद वह भी लाइन पर बन रहता था. ऐसा अनुमान था. फिर यह भी, वे लोग रोज हजारों फोन मिलाते होंगे, मुठठीभर कर्मचारी सब की बातें कहां तक और कब तक सुनेंगे?
जैसे ही मैं ने ‘हैलो’ कहा, उधर से मधुर आवाज कानों से टकराई. वह एक गीत गा रही थी जिस ने मेरे दिल को गहरे तक छू लिया. फिल्म ‘कभी-कभी’ का वह गीत आज भी मेरे जेहन में बिलकुल वैसा ही गूंजता है जैसा उस वक्त गूंजा था. गीत तो मुझे केंद्रित कर के गाया ही गया था, इस से ज्यादा महत्त्वपूर्ण था उस का डूब कर उस में विलीन हो जाना. वह गीत था- ‘दिल आने की बात है जब कोई लग जाए प्यारा, दिल पर किस का जोर है यारो, दिल के आगे हर कोई हारा…’ वह खो गई थी. वह चाहती थी मैं इसे सुनूं और जो वह कहना चाहती है, वह समझ सकूं. यह मजाक नहीं था. वह पहले हंसी, फिर अचानक भावुक हो कर रो पड़ी थी, अगले ही पल संभल गई और खूबसूरती से बात को भी संभाल लिया.
धीरेधीरे वह मुझ में शक्कर की तरह घुलती जा रही थी, जिस का पता मुझे बाद में लगा था.
मुझे नहीं पता था, यह गीत इतना सुंदर है. उस दिन के बाद से आज तक यह गीत मेरी प्रिय सूची में रहा है.
वह उम्र में मुझ से छोटी थी, इसलिए हमेशा कहती तो ‘दी’ थी मगर जान प्रेमियों जैसे दिया करती थी. शायद, वह मेरे लिए पहाड़ से भी कूद जाती. सवाल जो आज तक कौँधते हैं वे ये हैं कि क्यों करती थी वह इतना प्रेम एक स्त्री से? पुरुष से क्यों नहीं? उस ने मुझ में ऐसा क्या देखा होगा? क्या पाती है वह मुझ में? लेकिन फिर भी, मैं ने कभी उस से पूछा नहीं.
उस का नाम था आलिया. बेहद खूबसूरत और संजीदा किस्म की लड़की थी वह. यह बात मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि वह भावुक तो थी ही, ईमानदार भी थी, क्योंकि हमारी पहली मुलाकात का किस्सा इस बात का प्रमाण है. वह मुलाकात बेहद रोचक थी. मुझे लेखन का शौक था, इस के लिए मैं हमेशा एकांत और शांत जगह तलाशती थी जहां दूरदूर तक कोई न हो. भीड़भाड़ से कोसों दूर जहां, बस, पंक्षियों का कलरव हो, हवाओं का संगीत हो, जहां भावों को प्रकृति से जोड़ा जा सके, हरियाली से रस चुराया जा सके और अनुभूति स्पंदन कर सकें.
ऐसे में मैदानी इलाकों को छोड़, मैं अकसर छुट्टियां पहाड़ों पर बिताती. कईकई दिन अकेले रह कर जब वापस लौटती तब दिल में सुकून होता और कागज भरे हुए. उस वक्त आज की तरह लैपटौप या कंप्यूटर नहीं होते थे. इन भरे हुए कागजों में मेरी जान होती, मेरी अमानत होती जिन्हें बड़ा ही संभाल कर रखा जाता. कई उपन्यास, कहानी यों ही रची जाती रहीं.
बेशक शुरुआती दौर में वह मेरे लिए एक कहानी का मसाला भर थी, मगर वह विचार चंद दिन ही ठहर सका. उस के बाद तो हमारा रिश्ता एक फुलवारी की तरह महकने लगा था जिस में पूरा गुलशन समाया हुआ था. उस की बेपरवाह महक हमारे चाहने न चाहने की परवा किए बगैर हर समय हमारे इर्दगिर्द बनी रहती.
बात उन दिनों की है जब मैं शिमला के एक होटल में ठहरी हुई थी. उस रोज मौसम बड़ा खराब हो गया था. आमतौर पर उसे खराब ही माना जाएगा, तेज बारिश जो रुकने का नाम ही न ले रही थी. मेघों की गरज ऐसी कि कलेजा निकाल कर रख दे. दिन में रात जैसा अंधकार और रहरह कर आसमानी बिजली का कड़कना, निश्चिततौर पर भयभीत कर देने वाला था. मगर मेरे लिए वह ऊर्जा का स्रोत था. कुछ रचने का सुअवसर था. तमाम नई कोंपलें फूटने को उद्धत हो रही थीं. जब कोई अंकुर पल्लवित होता है तो बड़ा ही बेपरवाह होता है. सीमाओं से उनमुक्त होता है. धरती का सीना चीर कर रास्तें बना लेता है और फिर नवसृजना की महक से, मन हिलोरे मारता है. संतुष्टि पांव पसार लेती है. मन ही कहां, अंतस भी तो भीगता है. भीगने से मतलब उल्लास से है, जो हर्ष की अनुभूति देता है. ऐसी ही तृप्त ऋतु में मैं डूबी हुई थी.
कल्पनाओं ने अपना तिलिस्म फैला लिया था एक खूबसूरत से ख्वाब की तरह जो मेरे इर्दगिर्द फैला हुआ था और उस में से तमाम शब्दों ने झांकना शुरू किया था और मैं कागजों में उलझी थी. यह उपन्यास नहीं, बल्कि प्रेमग्रंथ था मेरे लिए जिसे बड़ी तन्मयता से रचा जा रहा था. प्रेम चूंकि प्रेम है, उस पर जितना लिखा जाए कम है. कितने ही शायर, कवि और गीतकार हुए हैं जिन्होंने प्रेम को अपनेअपने तरीके से बयान किया है और अपने दिल को फाड़ती हुई मारक व तपती हुई नगमों से पत्थरों को भी पिघला दिया. मुर्दों मे भी जान फूंक दी और प्रेमियों की तो चांदी ही चांदीं. अकसर जब इजहार के लिए शब्द न हों तो गजलें और रोमांस से भरे गीत ही तो काम आते हैं.