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मैं एक विराम लेने के लिए उठी. कमर को सीधा किया और कागजों पर कलम को रख दिया. वाशरुम से वापस लौटी तो देखा टेबल खाली थी. भाव, व्यथाओं को संभालने में निपुण कलम नीचे जमीन पर बेसुध पड़ा था और सारे कागज नदारद थे. मेरा दिल धड़क उठा. अपने कमरे की बालकनी से नीचे झांका. दूरदूर तक सन्नाटा पसरा था. कहां गए मेरे सब कागज, अभी तो छोड़ा था सही सलामत, फिर? दरवाजे की चटखनी को जांचा, वह बंद था. कोई आया, न गया और इस वक्त… टेबल के नीचे फिर से झांका, बालकनी में भी देखा, पर एक भी कागज़ का नामोनिशान न था. क्या करूं? कहां ढूंढूं? उस एक पल में मैं ने एक सदी के दुख झेल लिए. यह दुख झेलने के बाद जैसे टूटता है व्यक्ति, ठीक  वैसे ही टूटने लगी. मैं ठगी गई थी मगर ठग का न पता न ठिकाना. मैं थोड़ी सी देर में थक चुकी थी. अकसर ऐसे मौकों पर सहने की क्षमता कम हो जाती है. फिर गलती तो मेरी ही थी, कौन भला यों कागजों में लिखा करता है? क्यों नहीं किसी फाइल में कायदे से रखा गया?

अब आंखों में पानी भी आ गया था एकदम गरम, जिस ने गालों से ले कर गरदन तक का हिस्सा जला दिया. निढाल सी बिस्तर पर बैठ गई. बिखर जाती इस से पहले ही मेरे कमरे के दरवाजे को किसी ने खटकाया. गले में पड़े स्टौल से आंसुओं को पोंछ कर दरवाजा खोला, यों जैसे कोई मेरे ही कागजों को ले कर आ गया होगा और कहेगा- ‘ये लीजिए हवा से उड़ कर मेरे पास आ गए थे, संभालिए अपनी अमानत.’

तेजी से दरवाजा खोला गया. सामने एक लड़की खड़ी थी. मैं ने जैसा सोचा था वही हुआ था. उस के हाथ में मेरे सभी कागज थे. मैं तो खुशी और आश्चर्य से हतप्रभ थी. संयम टूट गया. औपचारिक अभिवादन के बगैर ही उस के हाथ से लपक कर  सारे कागज़ लगभग छीन लिए और आश्वस्त हो जाने पर कि मेरे ही हैं, अपनी पीठ से सटा कर छिपा लिए. जैसे, वे मुझ से दोबारा छिन जाएंगे. वह मुझे लगातार देख रही थी. उस ने मुझे अधीर या पागल ही समझा जैसा मेरा अनुमान भी था और बिलकुल वही किया था मैं ने.

वह बगैर कुछ बोले, सुने वापस लौट गई. उस के जाने के बाद मेरा जमीर जागा. तब तक तो आभार का सेतु स्वार्थ के आवेगयुक्त बांध में बह चुका था. न तो वह लड़की थी और न ही शुक्रिया कहने के लिए वहां कोई.  मुझे शर्मिंदगी का एहसास हुआ और अपनी बेसब्र बेअदबी का भी. न जाने क्या समझा होगा उस ने मुझे? एक स्वार्थी और निष्ठुर ही न? पर वह थी कौन? इस पहाड़ी क्षेत्र की तो नहीं लगती. शायद, मेरी तरह ही कोई आगंतुक होगी और इसी होटल में ठहरी होगी? उस वक्त मनगढ़ंत कयास समय की मांग थे.

अब जो भी हो, खुद को ढांढस बंधाया और निश्चित किया, सुबह उस की खोजबीन की जाएगी, अभी तो सोया जाए. चरते हुए पशु की पीठ पर कौवे की भांति बैठ कर  मैं ने अपने कागजों को एक बार चूम कर टेबल पर रखने के बजाय तकिए के नीचे दबा लिया. बालकनी का स्लाइडिंग डोर बंद किया और नाइट बल्ब जला दिया, उस का अभिप्राय मेरा डर था जो मैं ने अभीअभी झेला था. बालकनी से हवा का झोंका पेपरवेट से भरोसा उठा सकता था. उस रात फिर मैं ने नहीं लिखा और जल्दी सो गई.

सुबह आदतन मैं देर से उठी. सूरज की लालिमा सुनहरी हो चुकी थी. आज मौसम साफ था. मन ही मन रात वाली घटना पर विचार करने लगी. वही प्रश्न एक बार फिर हलचल मचाने लगे-‘इतनी बारिश में कौन किस की मदद करता है? या यों कहें कि कौन बारिश में ठिठुरते हुए आएगा वह भी सिर्फ आप के चंद कागजों के लिए? होंगे आप के लिए कीमती, मगर सामने वाले के लिए तो रद्दी से बढ़ कर और क्या हो सकते हैं? जो भी हो, इस गुत्थी को आज सुलझाना ही है. यह सोच कर मैं झट से उठ खड़ी हुई.

वाशरूम से आने के बाद मैं ने इंटरकौम पर एक कौफी और्डर की और साथ में कुछ स्नैक्स भी. हैवी ब्रेकफास्ट लेने की आदत नहीं, उस के बाद सीधे लंच. मगर लंच से पहले रात वाली उस लड़की को खोजना बेहद जरूरी था.

कौफी आ गई थी और साथ में नानफायर सैंडविच भी जिसे मैं ने बालकनी में बैठ कर खाना पसंद किया. चूंकि बालकनी ही वह जगह थी जहां से पहाड़ों को, दूर तक फैली हरितमा को और नैसर्गिक सौंदर्य को आसानी से देखा जा सकता था.

दूर तक फैले देवदार, चनार और बांस के पेड़ों का घना जंगल जिन के पत्तों पर बारिश की मोती सी बूंदें और भीग कर गहरे काले से दिखने वाले तने, जिन पर बुलबुल, तोते, गौरैया और बहुत सारे पहाड़ी पंक्षियों का कोलाहल मन को इस दुनिया से खींच कर अनोखा सुख देने के लिए काफी था.

10 से 15 मिनट लगे थे मुझे काफी को खत्म करने में. इस के बाद मैं ने शावर लिया. लाइट ब्लू कलर का टौप और ब्लैक जींस को मैं ने चुना और पहन कर तैयार हो गई. मेकअप का कोई खास शौक नहीं था. होंठों पर एवरग्रीन पिंक लिपस्टिक और मैचिंग का नेलपेंट, इस के अलावा और कुछ ऐसा नहीं था जो मैं ने कभी किया हो, बस खास मौको को छोड़ कर.

झटपट तैयार हुई और सीधे रिसैप्शन पर पहुंच गई. अपने कमरे की चाबी काउंटर पर रखी ही थी कि अपने ठीक सामने उसे देख कर मैं ठिठक गई. वही रात वाली लड़की जिसे मैं ढूँढने के लिए निकली थी, सामने खड़ी थी. वह जैसी कल रात लग रही थी उस से बिलकुल अलग थी. इस वक्त वह हलके मेकअप में थी. उस ने फौरमल कपड़े पहने थे. फोम कलर का ट्राऊजर और ब्लैक टौप, मोटे सोल के स्पोर्टस शूज, शायद पहाड़ी क्षेत्रों के घुमावदार ऊबड़खाबड़ रास्तों के सहयोगी. कंधे पर बड़ा सा काले रंग का बैग था. ऐसा लग रहा था जैसे वह औफिस के लिए तैयार हुई हो. मैं ने मन ही मन अंदाजा लगाया ‘जरूर यह किसी जौब में है और तबादला हो कर यहां आई है. जब तक रहने की कोई उचित व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक होटल में ठहरी होगी.’ मन है कि सवालों के सिरे थामता है और जवाबों के सिरे छोड़ता जाता है.

बेशक उस ने मुझे देख लिया था. शायद रात वाली घटना से बात करने में सकुचा रही थी. इसलिए बोलने की पहल मुझे ही करनी थी. मैं ने उस के करीब जा कर मुसकरा कर उस का अभिवादन किया. उस ने जवाबी मुसकान बिखेर दी. भले ही वह बहुत खूबसूरत नहीं थी मगर उस का सांवला रूप उस के आत्मविश्वास का प्रेरक था, जिस ने उसे बेहद आकर्षक बना दिया था. वैसे भी व्यक्ति का चुनाव करते वक्त उस का रंग मेरे लिए कभी माने नहीं रखता था. उस की मुसकान का रस मेरे भीतर तक घुल गया था. मेरे पूछने से पहले ही उस ने कहा, ‘माईसैल्फ आलिया फ्रौम लखनऊ.’

‘मैं आराधना जबलपुर से.’

‘नाइस मीट.’

‘कौन सी, रात वाली?’ मैं ने मजाकिया लहजे में कहा. पहले वह हंसी, फिर हम दोनों ही इस बात पर ठहाका लगा कर हंस दिए. सहजता दोनों तरफ से बराबर थी. इस बार फिर मैं ने कहा- ‘रात आप का शुक्रिया अदा करना भूल ही गई. दरअसल…’

‘जाने दीजिए.’

‘जाने दिया,’ मैं ने अपनी पूरी मुसकान बिखेर दी.

‘कहीं बाहर जा रही हैं शायद?’

‘पहाड़ से कूदने के लिए चोटी तलाश रही हूं,’ मैं उपहास कर खुद ही हंस दी.

‘बहुत खूब.’

‘मरने की प्लानिंग खूबसूरत लगी आप को?’

‘मरने वाले कह कर मरा करते तो आज तक एक भी खुदकुशी न हुई होती.’

‘वाह, आप तो फिलौसफ़र निकलीं.’

हम दोनों की हंसी छूट पड़ी. हमारी बातों और ठहाकों से रिसैप्शन हाल गूंज उठा.

वह हैंडसम युवक, जो काउंटर पर जबरदस्ती की फाइलों में उलझा था, मुसकरा रहा था. शामिल होने के साहस की कोई वजह न थी. उस बात से इतर फिर उस लड़की आलिया ने थोड़ा ठहर कर कहा, ‘अगर आप फ्री हैं, तो चलिए कहीं बाहर चलते हैं. आराम से बैठ कर बात करेंगे.’ निसंकोच, मिश्री की ठली सा यों एकाएक आग्रह, मैं दंग थी. जवाब में मैं ने सवालिया प्रश्नचिन्ह लगाया, ‘आप शायद औफिस जा रही थीं?’

‘नहीं, मैं यहां  रिसर्च करने के लिए आई हूं. वुमैन साइकोलौजी में पीएचडी कर रही हूं. पहाड़ी महिलाओं का जीवनचक्र बड़ा ही कठिन होता है. वही जानने की जिज्ञासा यहां खींच लाई.’

‘वाह, बहुत सुंदर,’ मेरे शब्द औपचारिक थे. जबकि, मैं जानती थी कि सरलता यहां के रोमरोम में बसी है.

‘आप से ज्यादा नहीं.’ वह मुझे देख कर हंस दी और मैं उस की बात का आशय समझ कर झेंप सी गई.

‘आप मुझे जानती ही कितना हो क्या चेहरे की खूबसूरती को सुंदरता कह रही हो?’ मैं ने तह में जा कर सवाल दागा था.

‘हां, अभी तो चेहरे की ही तारीफ की है. वह भी सुंदर है.’

‘भी से मतलब?’

‘रात आप की इजाजत के बगैर आप के लिखे पन्नों को बखूबी पढ़ लिया था और इतना तो जान ही लिया कि शब्दों की खूबसूरती में आप का जवाब नहीं. कितनी मार्मिकता उड़ेली है आप ने उस स्त्री की कामयाबी के संघर्ष में. अपना स्वतंत्र जीवन जीना कितना चुनौतीपूर्ण होता है तब जब समाज का प्रधान वर्ग आप को मर्यादित गठरी में बांधने के लिए पूरा जोर लगा देता है और फिर आगे… बस, इतना ही पढ़ा था उन पन्नों के जरिए. आगे भी पढ़ना चाहूंगी. मेरे मन में जिज्ञासा की कोंपलें फूट पड़ी हैं. मैं आप को और पढ़ना चाहूंगी. आप लिखती हैं और बहुत अच्छा लिखती हैं, यह बात मैं कल रात ही जान गई थी, दीदी.’

‘दीदी…???’  मैं ने एक अपरिचित के मुंह से यह संबोधन सुना तो ह्रदय के तार झनझना उठे.

‘जी, दीदी, आप को रात पढ़ा था आप के लेखन के जरिए, आप के भीतर प्रवेश कर लिया और आज देख भी लिया, न जाने क्यों यह आवाज दिल से निकली है.’

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