मैं, बस, अनायास ही उस की बात से मुसकरा उठी थी. उस का इस तरह मुझे खुद से जोड़ लेना मेरे लिए अदभुत था. फिर भी मैं बहुत ज्यादा गंभीर नहीं थी. मैं उस के बारे में पूरा जानना चाह रही थी. इस के लिए उस के साथ समय बिताना जरूरी था. मुझे भी कोई खास काम नहीं था. इसी मंशा से मैं ने सहमति दी और हम कहीं समय बिताने के लिए निकल पड़े.
दूसरी मुलाकात में एकदूसरे से इतना सहज हो जाना और साथ समय बिताने का आग्रह स्वीकार कर लेना बेशक अविश्वसनीय था, मगर चाशनी में डूबा हुआ था जो मुझे अच्छा लग रहा था और शायद उसे भी.
हम होटल से निकल पड़े और साथसाथ चल रहे थे, बातों का सिलसिला जारी था. इस बीच कई बार उस ने मेरे विचारों को बगैर समझे ही समर्थन दिया था. शायद यह उस की जल्दीबाजी थी या मुझ पर भरोसा जताने का तरीका, यह तो मैं नहीं समझ पाई मगर इतना जरूर समझ गई थी किह मुझ से प्रभावित है, इसलिए ऐसा कर रही है. और उस का ऐसा करना कहीं न कहीं मुझे उस से जोड़ रहा था.
चलतेचलते हम किसी रैस्टोरैंट जाने के बजाय एक छोटे से चाय के खोखे में बैठ गए जो पहाड़ी पंखडंडीनुमा रास्तों के बीच बांस की खपच्चियों से बनाया गया था. आम के तख्तों से बनी बैंच पर हम दोनों बैठ गए. बेतरतीब बनाई गई बैंच हमारे बैठते ही हिलने लगी, जिस से डरने के बजाय अनायास ही हमारी हंसी छूट पड़ी और मन बचपन की तरह शरारती हो उठा. फिर हम बिलकुल सधे हुए बैठे रहे.
सर्प सी लहराती हवाओं की अपनी ही संगीतमय ठसक थी. रात की बारिश से दलदली मिटटी और हवा की शीतलता से मचलते हुए मन के कहने पर मैं ने अपनी सैंडिल उतार कर एड़ियों को मिटटी में धंसा लिया.
2 प्याले मसाला चाय और आलू का पकौड़ा उस की तरफ से और्डर किया गया था. उस ने और्डर करने से पहले मुझ से मेरी पसंद के बारे में नहीं पूछा था. शायद इसलिए क्योंकि इस के अलावा वहां कुछ ऐसा था भी नहें जिसे मंगवाया जाता.
चाय आने तक समय जरा भी नहीं खला था.
देवदार के बड़े वृक्ष और जड़ीबूटियों के छोटेछोटे पौधे, दूरदूर तक फैली हरियाली, कहींकहीं ऊंची घास की हवा से अठखेलियां और चारों ओर फैला सन्नाटा, सूखे हुए पत्तों का ढेर जिस पर हमारे पैर पड़ने से खड़खड़ाने की आवाज सुनाई दे रही थी.
ठंडी हवाएं और प्रकृति का अवर्णनीय सौंदर्य देख कर हम दोनों ही अभिभूत थे. ऐसा मुझे इसलिए लगा क्योंकि उस ने अपनी दोनों हथेलियों को जोड़ कर घुटनों के बीच में छिपा लिया था और पलकों को बंद कर वह सुकून की मुद्रा में बैठी थी. मैं उसे देख कर मुसकरा उठी थी. उस की सौम्यता मुझे छू रही थी. न जाने क्यों उस का साथ मुझे नया सा नहीं लगा, शायद हमारी जड़ें बहुत गहरी जुड़ी थीं.
मुझे मेरी कहानी मिल रही थी और उसे मेरा साथ भा रहा था. क्या वह ऐसी ही है या मुझे देख कर ऐसा जता रही है? इन सवालों के कई जवाब मेरे दिमाग में इधर से उधर दौड़ लगा रहे थे.
अभी वह बात करने की मुद्रा में नहीं थी. खोई हुई थी. यह मैं ने उस के मौन से जान लिया था. एकसाथ 2 दुनियाओं में रहना आसान नहीं होता, ऐसा कुछ खास लोगों के हिस्से में ही होता है. मैं समझ चुकी थी, वह खास है और वह मुझे खास समझती रही, यह अलग बात है.
पकौड़े एकदम गरम थे, इतने कि उस की भाप और हमारी सांसों की भाप मिल कर एक हो गए थे. स्नेह का रस सूख न जाए, इसलिए चाय की चुस्की के साथ मैं ने ही चुप्पी को तोड़ा- ‘वाह, मजा आ गया. गरमागरम चायपकौड़ा आज वैसा ही मजा दे रहा है जैसा बचपन में दिया करता था.’
वह मुसकराई, फिर खिलखिला कर जाड़े की धूप सी गुनगुनी हंसी बिखेर दी. मेरा जिस्म उस गुनगुनी धूप की गरमाहट से भर उठा. हम दोनों ने ही उस गुनगुनाहट को खूब महसूस किया था.
उस ने एक घंटा वहां बैठ कर इतने सवाल कर डाले जो हमारी गहरी दोस्ती के लिए काफी थे. जिस में मुख्यतया हमारी पसंदनापसंद, शौक और विचार शामिल थे. परिवार को ले कर भी दोचार बुनियादी सवाल किए गए थे, मगर वे सिर्फ औपचारिक तौर पर, ज्यादा रुझान तो व्यक्तित्व पर केंद्रित था.
मैं ने उस के शोध को ले कर कुछ जिज्ञासा जरूर दिखाई थी वह भी लेखनिए मांग को ले कर वरना तो लखनऊ की आलिया और जबलपुर की आराधना की मित्रता तो किसी पुराने पेड़ की जड़ों जैसी गहरी जम रही थी.
इस बीच, हम एकएक चाय पूरी शिद्दत से और डकार चुके थे, फिर से कुछ पकौड़े भी. इस दौरान वह नाटा, छोटी आंखों वाला व खूबसूरत सा नौजवान हमारी बातों का आनंद उठा रहा था. उस का सिर झुका कर बेवजह का मुसकराना इस बात की गवाही थी. वही हमारी टेबल पर चाय और पकौड़े सर्व करने आया था. जिस टेबल पर लकड़ी की गांठों के कई बड़े होल थे. बातचीत के दौरान कई बार आलिया ने उन खाली छेदों में यों ही अपनी उंगली को घुमाया था बिलकुल किसी उतावले और चुलबुले बच्चे की तरह.
इस एक घंटे की मुलाकात के बाद जब हम उठे तो उस ने मेरा हाथ अपने दोनों हाथों से कस कर पकड़ रखा था. मैं ने हौले से ढील देने की कोशिश की तो उस के हाथ का दबाव और बढ़ गया. मैं समझ गई, वह मेरा हाथ पकड़े रहना चाहती है. इसलिए मैं ने उसे वैसे ही रहने दिया. हम यों ही साथसाथ बहुत दूर तक चलते रहे. पहाड़ी रास्तों से सटे सागौन के पेड़ और ढलानों पर फिसलती सी ऊंची घास से होते हुए हम काफी दूर निकल आए थे जहां से हमें अपना होटल किसी कैनवास पर बने चित्र की तरह दिखाई दे रहा था. उस ने इशारे से मुझे होटल दिखाया और बच्चों की तरह चहक कर बोली- ‘काश, मुझे पेंटिंग आती तो यह खूबसूरत नज़ारा कैद कर लिया होता.’
मैं मुसकरा उठी और मन ही मन कहने लगी, तुम वास्तव में चित्रकार हो जिस मन में प्रेम के, भावनाओं के और जिज्ञासा के चित्र खिंचते हुए देखे हैं मैं ने. उस ने जैसे मेरे मन की गति को पढ़ लिया हो, चिरपरिचित मुसकान बिखेर दी. एक बार को मुझे लगा कि कहीं शब्द मेरे मुंह से बाहर तो नहीं निकल गए थे, निकले तो नहीं, अगर निकलते तो अच्छा होता. कई बार शाब्दिक प्रभाव चुंबक की तरह होता है, जो परस्पर खिंचाव के लिए जरूरी भी होता है.
शाम ढल चुकी थी. पूरे दिन का हिसाबकिताब न मेरे पास था और न ही उस ने रखा होगा. बस, उस एक दिन में एक जन्म की बातों का आदानप्रदान हुआ, जो आज तक किसी से नहीं हुआ.
हमारे कदम वापस होटल की तरफ बढ़ने लगे.
‘दिल आने की बात है जब कोई लग जाए प्यारा, दिल पर किस का जोर है यारो, दिल के आगे हर कोई हारा…’ चलतेचलते मुझे देख कर उस का यह गीत गुनगुनाना, फिर हौले से मुसकरा देना बड़ा ही सुखद था.
उस रात मैं देर तक जागी. जब तक नींद नहीं आई, दिमाग में वही किसी खूबसूरत एहसास की तरह छाई रही. उस से मिल कर इतना तो जान ही लिया कि उस के पास उल्लास तो है पर रास्ता नहीं. वह अपनी सात्विकता, पवित्रता का प्रमाण देना चाहती है पर क्यों? भ्रम की स्थिति बढ़ने से पहले ही संकोच की परिधि को तोड़ना होगा. आंखें बंद कर मैं दूर पहाड़ी पर बज रहे गीत को सुनने लगी थी…’अजनबी कौन हो तुम, जब से तुम्हें देखा है, सारी दुनिया मेरी आंखों में सिमट आई है…’ मीठे एहसास और मधुर संगीत मिल कर एक हो गए थे और फिर पता नहीं कब मेरी आंख लग गई थी.
अगली सुबह अंगड़ाई ले कर जब मैं उठी तो 9 बज चुका था, ‘उफफफफफ, इतना लेट’ अभी सोच ही रही थी कि घड़ी की सुईयां मुंह चिढ़ा कर कहने लगीं- और देर तक जागो…हा-हा-हा…धूप चढ़ आई है…उठिए मैडम…या चाय मंगवा दूं पहले? हा-हा-हा…’ मैं ने उसे थप्पड़ दिखाया- चुप कर, अब आगे बोली न, तो पिटेगी.
मैं उस से झगड़ कर उठ तो बैठी मगर, आलिया के व्यक्तित्व से बाहर नहीं आ पाई थी. मैं ने मन ही मन निश्चय किया कि हम चाय साथ ही पिएंगे, इंटरकौम से रूमसर्विस पर फोन किया कि ‘रूम नंबर ट्रिपल वन से मिस आलिया को मेरे रूम में भेज दें.’ उधर से जवाब सुन कर मैं सन्न रह गई. दिल को गहरा आघात लगा. रिसैप्शन से पता लगा, आज सुबह 7 बजे ही उस ने होटल से चैकआउट कर लिया है.
‘नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. आलिया, यों अचानक… नहीं, वह मुझे बताए बगैर नहीं जा सकती…’ मैं दौड़ कर रिसैप्शन पर पहुंची शायद कोई मैसेज या खत छोड़ा हो उस ने. कुछ भी नहीं. न कोई संदेश न खत. मैं टूट सी रही थी. एक अनजान लड़की मेरे सारे शरीर की ताकत को खींच कर ले गई थी. भारी कदमों से अपने रूम की तरफ लौटने लगी. उस के बाद न तो चाय का और्डर किया गया और न ही कोई दूसरा काम. सारा दिन यों ही बिस्तर पर औंधी पड़ी रही. ‘वह कौन थी? क्यों आई थी एक दिन के लिए मेरे पास? ये ऐसे तमाम सवाल थे जो भीतर ही भीतर उबल रहे थे. अव्यवस्थित मनोस्थिति, अंतर्वेदना से कराह रही थी.