हम दोनों पतिपत्नी सुबह बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजने के बाद सैर करने की नीयत से जैसे ही कोठी के बाहर निकले कि पति की निगाहें गली में खड़ी धोबी की लड़की पर जा कर ठहर गईं. वह लड़की अकसर इस्तरी के लिए आसपास की कोठियों से कपड़े लेने आती थी. उसे देख कर नितिन का अंदाज बड़ा ही रोमांटिक हो आया. वे गाना ‘तुम को देखा तो ये खयाल आया, जिंदगी धूप तुम घना साया…’ गाते हुए उस की बगल से गुजरने लगे तो वह भी अपने एक खास अंदाज में मुसकरा दी. उन दोनों की नजरें मिलीं तो धोबी की लड़की ने धीरे से कहा, ‘‘नमस्ते जी.’’
नितिन की बाछें खिल उठीं. मानो कोई अप्सरा स्वर्ग से उतर कर उस के सामने खड़ी, उस का अभिनंदन कर रही हो. नितिन के कदम कुछ क्षणों के लिए ठहर से गए. बदले में उस ने भी मुसकराहट के साथ उस का अभिवादन स्वीकार करते हुए पूछा, ‘‘कैसी हो?’’
वह शोख अंदाज में फिर मुसकराई और धीरे से बोली, ‘‘ठीक हूं.’’
मुझे यह सब ठीक नहीं लगा तो थोड़ा आगे चलने के बाद मैं ने नितिन को टोक दिया.
‘‘तुम एक फैक्टरी के मालिक और एक हैसियतदार आदमी हो. तुम्हारा बस नमस्ते कहना ही काफी था. मगर गाना गाना, हंसना और ज्यादा मुंह लगाना ठीक नहीं. खासकर इस तरह की लड़कियों को. देखो, धोबी की लड़की है. इस्तरी के लिए घरघर कपड़े मांग रही है और हाथ में 8-10 हजार का मोबाइल लिए है…उसे देख कर कौन कहेगा कि यह धोबी की लड़की है.’’
‘‘तुम तो बस किसी के भी पीछे पड़ जाती हो. अरे, तुम्हारे जैसी किसी ‘मेम’ ने पुराना सूट दे दिया होगा और फिर फैशन करना कौन सी बुरी बात है? यह मोबाइल तो अब आम हो गया है.’’
नितिन ने उस के पक्ष में यह सब कहा तो मुझे 3-4 दिन पहले का वह वाकया याद हो आया जब नितिन ने मुझे बालकनी में बुला कर कहा था.
‘देख निक्की, इस धोबी की लड़की को. यह जब हंसती है तो इस के दोनों गालों पर पड़ते हुए डिंपल कितने प्यारे लगते हैं? कितनी अच्छी ‘हाइट’ है इस की, उस पर छरहरा बदन कितनी सैक्सी लगती है यह?’ मेरे दिमाग में फिर एक और दास्तान ताजा हो आई थी.
अभी बच्चों की गरमियों की छुट्टियों में मैं 15-16 दिन गांव में रह कर आई थी. पीछे से नितिन अकेले ही रहे थे. मैं जब गांव से वापस आई तो देखा कि साहब ने ढेर सारे कपड़े इस्तरी करा रखे थे. यहां तक कि जिन कपड़ोें को पहनना छोड़ रखा था, वे भी धुल कर इस्तरी हो चुके थे.
मैं ने चकित भाव से नितिन से पूछा, ‘‘ये इतने कपड़े क्यों इस्तरी करा रखे हैं? इन कपड़ों को दे कर तो मुझे बरतन लेने थे और तुम ने इन को धुलवा कर इस्तरी करवा दिया. और तो और जो पहनने…’’
मेरी बात को बीच में ही काट कर नितिन ने झट से कहा, ‘‘वह सब छोड़ो, एक बात याद रखना कि मेरे कपड़े इस्तरी करने के लिए उस लड़के को मत देना. वह ठीक से इस्तरी नहीं करता. वह जो सांवली लड़की कपड़े लेने के लिए आती है, उसे दिया करो. वह इस्तरी भी बढि़या करती है और समय पर वापस भी दे जाती है.’’
मैं कुछ परेशान सी यह सब अपने मन में याद करती हुई चली जा रही थी कि अचानक मेरी नजर नितिन के चेहरे पर पड़ी तो देखा कि वह मंदमंद मुसकरा रहे हैं. मैं ने टोक दिया, ‘‘क्या बात है, बड़े मुसकरा रहे हो. मेरी बात पर गौर नहीं किया क्या?’’
‘‘कौन सी बात?’’
‘‘यही कि थोड़ा रौब से रहा करो.’’
बात पूरी होने से पहले ही नितिन बोल पड़े, ‘‘निक्की, अगर तुम बुरा न मानो तो एक बात कहूं. तुम थोड़ी मोटी हो गई हो और वह धोबी की लड़की सैक्सी लगती है, शायद इसलिए.’’
यह सुन कर मेरा मूड खराब हो गया. मैं वापस घर चली आई. ऐसे ही दिन गुजर गया, रात हो आई. न मैं ने बात की न ही नितिन ने.
2 दिन बाद शाम को जालंधर से इन की किसी परिचित का फोन आ गया. नितिन व उस के बीच लगभग 6 मिनट फोन पर बातचीत चली थी. बातों को सुन कर पता चला कि किसी की बेटी का पी.जी. के तौर पर गर्ल्स हास्टल में रहने का प्रबंध कराना था. जब मैं ने पूछा कि कौन थी? किसे पी.जी. रखवाने की बात हो रही थी? तो नितिन टाल गए. मैं ने भी बात को अधिक बढ़ाना उचित नहीं समझा और घर के काम में लग गई.
नितिन कभी जूते पालिश नहीं करते. हमेशा मैं ही करती हूं लेकिन अगले दिन सुबह उठ कर खुद उन को जूते चमकाते देखा तो अचरज सा हुआ. मैं ने पूछा, ‘‘आज शूज बड़े चमकाए जा रहे हैं, क्या बात है?’’
‘‘गर्ल्स हास्टल का पता करने कई जगह जाना है.’’
यह सुन कर मैं ने अपनी मंशा जाहिर करते हुए कहा, ‘‘कहो तो मैं भी तुम्हारे साथ चलूं, एक से भले दो.’’
‘‘रहने दो, तुम नाहक ही थक जाओगी, फिर आजकल धूप भी तेज होती है.’’
‘‘हां, भई हां, मेरा तो रंग काला पड़ जाएगा. मैं छुईमुई की तरह हूं जो मुरझा जाऊंगी. साफसाफ यह क्यों नहीं कहते कि मुझे अकेले जाना है. मैं सब जानती हूं लेकिन पिछली बार जब मेरी सहेली ने अपनी बेटी को पी.जी. रखवाने के लिए फोन किया था तो तुम उन्हें ले कर अकेले ही गए थे. अब की बार मैं तुम्हारे साथ चलूंगी. मुझे अच्छा नहीं लगता, तुम्हारा जवान लड़कियों के ‘हास्टल’ में जा कर पूछताछ करना. मैं औरत हूं, मेरा पूछना हमारी सभ्यता के लिहाज से ठीक है.’’
‘‘नहीं…नहीं, मैं अकेला ही पता कर के आऊंगा,’’ यह कह कर नितिन गाना गाने लगे, ‘‘अभी तो मैं जवान हूं…अभी तो मैं…’’
नितिन को चिढ़ाने के अंदाज में मैं ने कहा, ‘‘अगर आज तुम अकेले गए तो मैं भी तुम्हारे पीछेपीछे आऊंगी और तुम यह मत सोचना कि मैं तुम्हें अब गुलछर्रे उड़ाने का मौका आसानी से दे दूंगी.’’
यह सुन कर नितिन एकदम गंभीर हो गए और सख्त लहजे में बोले, ‘‘बस निक्की, अब तुम आगे एक भी शब्द नहीं बोलोगी. अगर कुछ उलटा बोला तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा.’’
‘‘हां…हां, जानती हूं, और तुम कर भी क्या सकते हो, मुझ कमजोर को पीटने के अलावा. मगर आज मैं तुम्हें अकेले पी.जी. के बारे में पता करने नहीं जाने दूंगी, चाहे कुछ भी हो जाए. तुम जरा अकेले जा कर तो देखो?’’
एकदो भद्दी गाली देने के साथ दोचार थप्पड़ मार कर नितिन ने मुझे घसीटते हुए ला कर बिस्तर पर पटक दिया और दरवाजे को जोर से बंद करते हुए घर से बाहर निकल गए.
बौखलाहट में मुझ पर न जाने कहां से पागलपन सा सवार हो गया. मैं ने उठ कर अपनी व नितिन की फ्रेमजडि़त तसवीर ली और फर्श पर दे मारी तथा साथ में रखा हुआ गुलदान दीवार पर और गुस्से में शादी वाली सोने की अंगूठी उतार कर दूर फेंकते हुए बैड पर धड़ाम से गिर पड़ी. फिर न जाने कब मैं अतीत की स्मृतियों के गहरे सागर में डूबती चली गई.
धीरेधीरे मुझे वे दिन याद आने लगे जब मात्र डेढ़ साल के अंतराल में मैं दूसरी बार मां बनी थी और मैं ने फूल सी कोमल नन्ही गुडि़या को जन्म दिया था. मेरी ननद 10 दिन से अधिक नहीं रुक पाई थीं. वैसे भी उन से जच्चा का काम नहीं होता था. अंकुर व अंकिता, दोनों को एकसाथ संभालना मेरे वश से बाहर था.
मैं ने अपने लिए किसी काम वाली को रखने की बात नितिन से कही तो उन्होंने पड़ोसियों के यहां काम करने वाली निर्मला की 12-13 साल की बेटी प्रीति को घर में मेरी मदद करने के लिए रख लिया था. धीरेधीरे बेटी गोद को समझने लगी थी. दिन छिपने के बाद वह तब तक चुप नहीं होती थी जब तक उसे कोई उठा कर छाती से न लगा ले. प्रीति के साथ वह हिलमिल गई थी. उस का स्पर्श पाते ही अंकिता एकदम चुप हो जाती थी जैसे कि उसे उस की मां ही मिल गई हो.