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उस दिन मेरा मन बहुत बुझाबुझा सा था. मेरी बेटी पिंकी 4 साल का मैडिकल कोर्स करने के लिए कजाकिस्तान चली गई थी. जातेजाते वह घर को बुरी तरह फैला गई थी. न जाने कहांकहां उस का सामान पड़ा रहता था. बड़ी मुश्किल से जुगाड़ लगा कर 8-10 लाख रुपए का लोन ले कर उसे भेजा था. महीनों वह इस तरह के कालेजों में एडमिशन की जानकारी लेती रही थी. मैरिट में उस को वह रैंक नहीं मिली थी कि इतने में भारतीय निजी कालेज में पढ़ाई कर सके.

8 दिन बाद मेरा बेटा रंजू भी जब अपनी नौकरी पर देहरादून चला गया तो मैं काफी अकेलापन महसूस करने लगी थी. पर फिर भी घर समेटने में मुझे 8 दिन और लग गए.

शादी के 2-3 दिन बाद राकेश ने भी दफ्तर जाना शुरू कर दिया था. उस दिन मुझे सुबह से लग रहा था कि अब कोई काम ही नहीं है.

अब तक अपने वैवाहिक जीवन में मैं हमेशा काम समेटने के चक्कर में, घर चलाने व सुव्यवस्थित रखने की हायतोबा में और बच्चे पालनेपोसने में ही जिंदगी जीती आई थी. शांति से बैठने, अपने बारे में सोचने का कभी वक्त ही नहीं मिला. हमारी शादी अरैंज्ड मैरिज थी पर बच्चे जल्दी हो गए और मैं बिहार के एक कसबे से दिल्ली आ गई. अपने शहर में कभी ब्यूटीपार्लर नहीं गई थी. शादी के टाइम पहली बार गई थी. पिंकी बहुत बार कहती कि ममा चलो. पर मुझे लगता था कि मैं ऐसे ही ठीक हूं.

जब भी किसी पत्रिका में हाथों की देखभाल, पांवों की सुरक्षा या त्वचा की देखभाल पर कोई लेख पढ़ती थी तो लगता था ये सब खाली वक्त के चोंचले हैं या फिर उन लोगों के लिए हैं जिन के घर में नौकरचाकर हैं अथवा उन के लिए हैं जो मौडलिंग करती हैं.

मगर अब जिंदगी के इस मोड़ पर पहुंच कर जब मैं दोनों बच्चों की शादियां निबटा चुकी थी फुरसत के क्षण जैसे मेरे आगेपीछे बिखर गए हैं. अब जब मैं ने अपने खुरदुरे हाथों और बिवाई पड़े पैरों पर निगाह डाली तो हैरानी हुई है कि इन पर कभी ध्यान क्यों नहीं गया?

मैं उठ कर शीशे के आगे जा खड़ी हो

गई. उफ क्या यह मैं ही हूं. बाल किस कदर कालेसफेद हो गए हैं. चेहरे की रौनक खत्म

हो गई है. झुर्रियां और आंखों के नीचे का कालापन मेरी लापरवाही का संकेत है या मैं सचमुच बूढ़ी हो गई हूं. दिमाग पर जोर दिया तो याद आया अगले दिन ही तो पूरे 39 वर्ष की हो जाऊंगी मैं. सोच कर उदासी की परत और गहरी हो गई.

अब न मैं बूढ़ी कही जा सकती थी और न ही जवान. बच्चे अपनेअपने ठिकानों पर जा चुके थे और राकेश अपने में ही मस्त थे. रह गई थी

तो सिर्फ मैं. अपनी जिंदगी के अकेलेपन का एहसास होते ही वीरानी और निराशा सी महसूस करने लगी.

अतीत को टटोला तो लगा अपनी नासमझ या फिर जिद्दीपन या दोनों ही की वजह से मैं अपने बच्चों की सिर्फ मां बन सकी हूं, एक अच्छी पत्नी नहीं. राकेश भी बिहार से दिल्ली आया था और उस के विवाह के पहले के बहुत से दोस्त थे. कई तो कई साल तक रूममेट भी थे. उन के साथ उसे अपनापन लगता था.

फिर सोचा, खैर जो हुआ सो हुआ अब अपना फुरसत का साथी अपने पति को ही बनाना होगा. बच्चों के पीछे तो सारी जिंदगी ही बिना दी मैं ने.

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया. मैं ने विचारों की केंचुली से निकल कर दरवाजा खोला. देखा, मेरे पति राकेश दफ्तर से लौट आए हैं. मैं ने मुसकरा कर उन का स्वागत किया.

राकेश बोले, ‘‘ओह, आज यह सूरज कहां से उगा है? तुम और फुरसत से मुसकरा कर मेरा स्वागत करो? क्यों भई, तुम्हें तो इस वक्त रसोई में होना चाहिए था या मोबाइल पर भाभी या फिर मां से चुगली करने में व्यस्त.’’

राकेश का व्यंग्य मुझेअंदर तक कचोट गया. सारा उत्साह बटोर कर बोली, ‘‘अब दोनों बच्चे चले गए. आखिर कभी तो फुरसत होनी

ही चाहिए.’’

‘‘पर मुझे अब फुरसत नहीं है. मेरे फुरसत के क्षणों पर मेरे उन दोस्तों का अधिकार हो गया है, जो शादी से पहले साथ थे,’’ राकेश बोले. फिर कुछ उदास से हो कर आगे कहने लगे, ‘‘मैं ने कितना चाहा कि तुम मेरे साथ रहो. मेरी हमदम रहो शादी के पहले साल ही रंजू हो गया, पर तुम्हें तो बस बच्चों के आगे कभी कुछ सू?ा ही नहीं. मैं ने कहा भी था कि गर्भपात करा लो पर तुम्हारी दकियानूसी मां नहीं मानी. अब मैं मजबूर हूं. चाहो तो रोज की तरह रसोई से चाय बना कर पिंकी के हाथ भेज दो. मैं तब तक तैयार हो रहा हूं. आधे घंटे में हम सब अपने छड़े दोस्त के फ्लैट पर मिल रहे हैं.’’

राकेश मुझे आहत कर के दूसरे कमरे में चले गए. मैं हताश सी दूसरे कमरे से निकल कर रसोई में आ गई. राकेश यह भी भूल गए थे कि रोज उन्हें चाय पहुंचाने वाली पिंकी अब ससुराल जा चुकी है.

चाय बनातेबनाते मैं सोचती रही कि आज राकेश उस के जाने के बाद पहली बार दफ्तर

गए हैं, इसीलिए शायद रोज के क्रम को याद कर रहे हैं.

चाय बना कर मैं ने राकेश को दे दी. प्याला पकड़ते हुए वे बोले, ‘‘ओह, मैं तो भूल ही गया था पिंकी तो अब है ही नहीं.’’

मुझे ऐसा लगा जैसे मैं रो पड़ूंगी, पर रोई नहीं. जैसेतैसे चाय समाप्त हो गई. राकेश भी चुपचाप चाय पी कर मेरे हाथों में प्याला

पकड़ाते हुए बोले, ‘‘खैर, मैं चलता हूं, देर हो

रही है.’’

मैं ने निरीह सी हो कर उन के जाने के बाद दरवाजा बंद कर लिया.

मुझे राकेश पर बहुत गुस्सा आया. एक तो मैं इतना अकेलापन महसूस कर रही थी, उस पर व्यंग्यबाण चला कर मुझे और आहत कर गए. निढाल सी पड़ कर मैं अनायास रोने लगी कि

एक दिन दोस्तों के साथ महफिल न सजाते तो क्या हो जाता. यही सोचसोच कर मैं काफी देर तक रोती रही.

फिर मुझे लगा कि शायद ऐसी स्थिति पर पहुंचने के लिए मैं स्वयं जिम्मेदार हूं. आज कुछ नया तो नहीं घटा. फिर 17 वर्षों के बाद ही क्यों मुझे राकेश का इस तरह जाना खल रहा है.

ऐसा तो हर शाम होता था, पर मुझे कभी कुछ खास नहीं लगा या शायद बच्चों के झंझटों से निकल कर मैं ने कभी इस बात पर ज्यादा गौर ही नहीं किया. लगा कि अब शायद सचमुच मैं बहुत फुरसत में हूं. तभी तो 19 वर्ष पूर्व के अपने सुनहले रुपहले दिन याद आने लगे थे.

मैं 22 की थी, राकेश 28 के. राकेश से जिस वक्त मेरी शादी हुईर् थी उस वक्त मैं और

राकेश एकदूसरे में ही खोए रहते थे. राकेश के दफ्तर जाने तक मैं उन के आगेपीछे ही घूमती रहती थी. उन की हर जरूरत का ध्यान रखती. राकेश तब मुझे पा कर फूले न समाते थे. इतना खयाल तो कभी उन की मां ने भी नहीं किया था. ऐसा उन का कहना था. हम लोग एक बड़े कसबे से आए थे. अच्छी पढ़ाईलिखाई के बावजूद मुझे घर में रहना ही पसंद था. राकेश ने बहुत कहा कि कोई नौकरी कर लो पर मैं नहीं मानी कि बच्चों को कौन देखेगा.

शुरूशुरू में दिनभर मैं राकेश के इंतजार में उन की मनपसंद चीजें बनाती रहती. आने का वक्त होता तो सजधज कर उन का स्वागत करती और फिर हम चाय पी कर घूमने निकल जाते. छुट्टी वाले रोज कभी कहीं घूमते, कभी कहीं. कभी पिक्चर तो कभी पिकनिक.

पड़ोसी तब हमें ‘युगल कपोत’ कहा करते थे क्योंकि मैं शादी के 1 साल में ही गर्भवती हो गई. इच्छा पूरी होती तो मैं ने उस की एहतियात के लिए घूमनाफिरना काफी कम कर दिया. राकेश को घूमने और पिक्चर देखने का बेहद शौक था, पर मैं उन्हें, ‘‘थोड़े ही दिन की तो बात है,’’ कह कर उन प्रोग्रामों को टालने लगी.

फिर 9 महीने बाद रंजू जब मेरी गोद में आया तो मानो मुझे सबकुछ मिल गया. राकेश भी खुश थे. हम ने प्यार से उस का नाम रंजू रखा.

40 दिन के आराम के बाद राकेश ने

पिक्चर का प्रोग्राम बनाया तो मैं ने यह कह कर मना कर दिया, ‘‘वहां रंजू रोएगा. बीच में उस

के दूध का वक्त होगा. वहां कैसे पिलाऊंगी.

आप का बहुत मन हो तो किसी दोस्त के साथ चले जाओ.’’

राकेश उस दिन मन मार कर अकेले

पिक्चर देख आए थे. पर फिर यह एक दिन का क्रम नहीं रहा. मैं रंजू के मोह में धीरेधीरे फंसती चली गई और मेरे घूमनेफिरने पर एकदम पाबंदी सी लग गई.

जब कभी राकेश उत्साहित हो कर कहीं चलने का प्रोग्राम बनाते तो मु?ो लगता बच्चे के साथ बाहर निकलना बहुत मुश्किल है. सर्दी

होती तो कहती, ‘‘रंजू को सर्दी लग जाएगी, बाहर बहुत हवा है. गरमी होती तो उसे लू लग जाने का भय बताती और बरसात होने पर उस के भीग जाने का.’’

सुन कर राकेश कभीकभी चिढ़ जाते थे. कभीकभी राकेश अपनी कमीज के बटन टूटने

की ओर ध्यान दिलाते तो मैं मुसकरा कर

कहती, ‘‘वक्त ही नहीं मिला आप के लाडले से. सारा दिन नचाए रखता है. अच्छा आज जरूर लगा दूंगी.’’

अकसर मैं उन के बताए काम भूल जाती. उन के आगेपीछे घूमना तो

मैं ने छोड़ ही दिया था. इस तरह रंजू की देखभाल में मैं न जाने कब राकेश को खोती चली गई, इस का मुझे पता ही नहीं चला.

राकेश के साथ घूमने में जो मजा आता था, उस से ज्यादा मजा मुझे रंजू को गोद में ले कर निहारते रहने में आता.

दिनभर रंजू के साथ कब गुजर जाता, मुझे पता ही न चलता. यह भी याद न रहता कि राकेश के आने का वक्त हो गया है.

एक दिन की बात है. राकेश ने दफ्तर जाते वक्त मुझे से पैंटकमीज निकाल देने को कहा. उस वक्त रंजू अपने नैपकिन को गोली कर के रो रहा था. मैं बोली कि रंजू हो रहा है, तुम जरा अपनेआप निकाल लो, तब तक मैं इस का नैपकिन बदल देती हूं.

मैं गुनगुनाती हुई रंजू का काम करने लगी. राकेश ने अपनेआप कपड़े तो निकाल कर पहन लिए, परंतु नाश्ते के वक्त मुझ से बिलकुल नहीं बोले, ‘‘आप को तो खुश होना चाहिए कि मैं आप के ही खून की अपने हाथों से देखभाल करती हूं, किसी आया या नौकरानी पर नहीं छोड़ती. अब बच्चे के साथ काम तो बढ़ ही जाता है. ऐसे में उलटे आप को चाहिए कि मेरा हाथ बंटाओ, कभीकभार सब्जी कटवा दो, चाय बना दो या रंजू का कोई काम कर दो. अपने कपड़े तो अपनेआप निकालने ही चाहिए आप को. अब पहले की तरह मैं खाली तो हूं नहीं जो हर वक्त आप के आगेपीछे घूमती रहूं.’’

सुन कर राकेश मुझे घूरते रहे. फिर दफ्तर चले गए. मैं ने बाहर जा कर उन्हें विदा भी नहीं किया… रंजू ने उलटी कर दी थी. उसे ही साफ करने में लगी रही.

उस दिन रंजू ने कई बार उलटियां कीं. घबरा कर मैं उसे डाक्टर के पास ले गई. दवा पीने के बाद वह आराम से सो पाया.

मैं ने रंजू की उलटियों से खराब हुए कपड़े धोने शुरू ही किए थे कि राजेश दफ्तर से लौट आए. शाम के 5 बज गए थे. मुझे पता ही नहीं चला था.

उलझे बालों और भीगे गाउन से मैं ने दरवाजा खोला तो राकेश् को फिर गुस्सा आ गया. बगैर मुझ से बोले ही वे अंदर दाखिल हो गए.

रंजू तब तक जाग गया था. मैं राकेश से बोली, ‘‘राकेश रंजू को उठा लो. मैं तब तक कपड़े सूखने डाल कर आप के लिए चाय बना देती हूं.’’

सुन कर राकेश बोले, ‘‘सारा दिन दफ्तर

में काम करतेकरते थक कर घर आया हूं, अब क्या यहां की नौकरी बजाऊं? तुम चाय रहने दो. तुम्हें तो अब इतनी भी फुरसत नहीं कि अपने बाल संवारो, वक्त पर कपड़े धोओ और मेरे

लिए कुछ वक्त निकालो. मैं कहीं बाहर ही चाय पी लूंगा.’’

राकेश मेरी दिनभर की व्यस्तता का लेखाजोखा लिए बगैर बाहर चले गए. मेरा दिल रोने को हो आया. दरवाजा बंद कर के रोतेरोते रंजू को उठा कर मैं ने चुप कराया. उसे दूध गरम कर पिलाया, दवा दी. वह खेलने लगा तो मैं ने फटाफट कपड़े धो कर सूखने डाल दिए. शाम की चाय अकेले ही पी.

अब तक मैं सुबह से काम करतेकरते थक गईर् थी, परंतु रात का खाना अभी तैयार करना था. जल्दीजल्दी वह भी काम निबटाया और स्वयं तैयार हो कर राकेश का इंतजार करने लगी.

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