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अमरनाथ को अमेरिका में अपने लड़के के घर में रहते हुए 1 वर्ष होने को आया था और इस 1 वर्ष में उन्होंने क्या कुछ काम नहीं किया. वह व्यक्ति जिस ने कभी भारत में रहते हुए एक गिलास पानी खुद ले कर नहीं पिया अब वह अपनों के आदेश पर खाना बनाने और उन्हें पानी पिलाने पर विवश था. जिस ने अपने घर में रहते हुए कभी अपना एक रूमाल तक नहीं धोया था वह अमेरिका आ कर बेटे के घर में नौकरों की तरह सारे घर के कपड़े धोया करता. इस के अलावा मीतेश के दोनों बच्चों की देखभाल, उन का कमरा ठीक करना, उन्हें खानापानी देना, उन के स्कूल जाने के समय उन्हें स्कूल बस तक छोड़ने जाना और स्कूल से वापस आने के समय उन्हें घर लाने के लिए अपना अतिरिक्त समय देना, अब अमर के लिए हरेक दिन की साधारण सी बात हो चुकी थी.

इस बीच जरूरत से अधिक काम करने तथा बढ़ती हुई उम्र के हिसाब से शरीर पर अधिक भार पड़ने से अमरनाथ एक दिन बीमार हो गए. साधारण दवाओं से ठीक नहीं हुए तो मजबूर हो कर उन्हें डाक्टर को दिखाना पड़ा. डाक्टर की सलाह पर उन्हें अस्पताल मेें कुछ दिनों तक रखना पड़ा. इस से एक अतिरिक्त आर्थिक भार और अपना अतिरिक्त समय भी देने की परेशानी मीतेश व उस की पत्नी के ऊपर आ गई.

अमरनाथ का कोई अलग से चिकित्सा बीमा तो था नहीं, इसलिए उन की आर्थिक सहायता के लिए जब मीतेश ने अमेरिकी सरकार के सोशल सिक्यूरिटी कार्यालय में अर्जी दायर की तो वहां से भी यह कह कर मना कर दिया गया कि यह सुविधा अब केवल उन प्रवासियों को ही उपलब्ध है जिन्होंने अमेरिका में अपने सोशल सिक्यूरिटी नंबर के साथ बाकायदा लगभग 3 वर्ष तक कार्य किया होगा.

यह पता चलने के बाद मीतेश और उस की पत्नी दोनों के ही सोचे हुए मनसूबों पर पानी फिर गया क्योंकि उन्होंने सोचा था कि अमरनाथ को अपने पास बुला कर रखने पर 2 प्रकार की सुविधाएं उन्हें स्वत: ही मिल जाएंगी. एक तो उन के दोनों बच्चों को देखने के लिए निशुल्क बेबी सिटर का प्रबंध हो जाएगा, जिस से लगभग 400 डालर उन के प्रतिसप्ताह बचा करेंगे और साथ ही अमरनाथ को सरकार के द्वारा मिलने वाली प्रतिमाह कम से कम 500 डालर की सोशल सिक्यूरिटी की आर्थिक सहायता भी मिलती रहेगी. इस बात का पिता को तो कुछ पता नहीं चल पाएगा, सो एक पंथ दो काज वाली कहावत भी ठीक काम करती रहेगी.

अमरनाथ के लिए मीतेश जब सोशल सिक्यूरिटी का लाभ न ले सका और साथ ही उन के बीमार हो जाने पर उन की चिकित्सा का एक अतिरिक्त खर्च भी उस पर आ पड़ा तो उस के व उस की पत्नी के बदले स्वभाव को अमरनाथ की बूढ़ी अनुभवी आंखों ने पहचानने में देर नहीं लगाई. वह समझ गए कि अब उन का अपने बेटे और बहू के घर में रहना उन दोनों के लिए बोझ बन चुका है.

इस के साथ ही अमरनाथ को यह समझते देर नहीं लगी कि मीतेश का अचानक  से भारत आना और उन को अपने साथ अमेरिका ले जाना मात्र उस का उन के प्रति प्रेम और अपनत्व का एक झूठा लगाव ही था. सच तो यह था कि मीतेश और उस की पत्नी को केवल अपने दोनों बच्चों की देखभाल के लिए उन की जरूरत थी और अब उन के बच्चे बड़े हो गए हैं तो बूढ़ा लाचार बाप, बेटे व बहू के लिए बोझ हो चुका है.

एक दिन अमरनाथ ने मीतेश से कहा, ‘मेरा यहां रहने से कोई मतलब तो निकलता नहीं है, बेहतर होगा कि मुझे भारत भेजने का प्रबंध कर दो.’

यह सुनते ही मीतेश का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. वह चिल्ला कर बोला था, ‘क्या समझ रखा है आप ने हमें. कुबेर का खजाना तो नहीं मिल गया है कि जिसे जब चाहे जितना खर्च कर लो. पूरे 1,500 डालर से कम का हवाई जहाज का टिकट तो आएगा नहीं. कहां से आएगा इतना पैसा? हम अपने को बेच तो नहीं देंगे. यहां घर में आराम के साथ चुपचाप पड़ेपड़े रोटियां तोड़ने में भी कोई तकलीफ होने लगी है क्या?’

‘तो फिर मुझे नीतेश या रीतेश के पास ही भेज दो. कम से कम आबोहवा तो बदलेगी,’ अमरनाथ ने साहस कर के आगे कहा तो मीतेश पहले से भी अधिक झुंझलाता हुआ उन से बोला था, ‘मैं ने उन दोनों को फोन किया था. उन दोनों में से कोई भी आप को रखने के लिए तैयार नहीं है. उन का कहना है कि मैं ही आप को ले कर आया हूं, सो इस मुसीबत को केवल मैं ही जानूं और भुगतूं.’

मीतेश के  मुंह से यह अनहोनी बात सुन कर अमरनाथ ने अपना माथा एक बार फिर से पीट लिया. वह समझ गए कि किसी से कुछ भी कहना और सुनना बेकार ही साबित होगा. वह उस घड़ी को कोसने लगे जब बेटे की बातों में आ कर उन्होंने अपना देश और अपनों का साथ छोड़ा था. एक आह भर कर उन्होंने अपने को पूरी तरह हालात के हवाले छोड़ दिया.

एक दिन बहू अमरनाथ को बड़े ही भोलेपन से अपने साथ स्टोर घुमाने यह कह कर ले गई कि उन का भी मन बहल जाएगा. वैसे भी घर में सदा बैठे रहने से इनसान का मन खराब होने लगता है. स्टोर में खरीदारी करते समय बहू उन से यह कह कर बाहर आ गई कि वह अपना मोबाइल फोन घर पर भूल आई है और उस को मीतेश को फोन कर के यह बताना है कि वह बच्चों को स्कूल से ले आएं.

इतना कह कर मीतेश की पत्नी स्टोर से बाहर निकल कर जो गई तो फिर वह कभी भी उन के पास वापस नहीं आई. बेचारे अमरनाथ अकेले स्टोर का एकएक कोना घूमघूम कर थक गए. फिर जब उन से कुछ भी नहीं बन सका तो थकहार कर स्टोर के बाहरी दरवाजे के पास पड़ी एक बैंच पर बैठ कर अपनी बहू के वापस आने की प्रतीक्षा करने लगे.

इस प्रकार प्रतीक्षा करतेकरते, भूखे- प्यासे उन को शाम हो गई. अंगरेजी आती नहीं थी कि वह अपना दुख किसी को बताते और जो 1-2 भारतीय वहां दिख जाते तो वे केवल उन की ओर मुसकरा कर देखते और आगे बढ़ जाते. उन की जेब में मात्र 2 डालर पडे़ थे, सोचा कि फोन कर लें मगर उन्हें फोन नंबर भी याद नहीं था. कभी भूले से भी उन्होंने नहीं सोचा था कि एक दिन उन की यह नौबत आ जाएगी.

बैठेबैठे परेशान से जब रात घिर आई और स्टोर भी बंद होने को आया तो अमरनाथ की समझ में आया कि वह यहां संयोग से अकेले नहीं छूटे हैं बल्कि उन्हें जानबूझ कर छोड़ा गया है. सो इस प्रकार की मनोवृत्ति को अपनी ही संतान के रक्त में महसूस कर अमरनाथ फफकफफक कर रो पडे़. उन की दशा और उन को रोते हुए कुछेक लोगों ने देखा मगर किसी ने भी उन से रोने का कारण नहीं पूछा.

ऐसे समय में स्टैसी नामक महिला स्टोर से बाहर निकली और अमरनाथ को यों रोते, आंसू बहाते देख उन के पास आ गई. बड़ी देर तक वह एक अनजान, भारतीय बूढ़े की परेशानी जानने का प्रयत्न करती रही. जब उस से नहीं रहा गया तो वह अमरनाथ को संबोधित करते हुए बोली, ‘ऐ मैन, व्हाई आर यू क्राइंग?’

स्टैसी के यों हमदर्दी दिखाने पर अमरनाथ पहले से और भी अधिक जोरों के साथ रोने लगे. स्टैसी समझ गई कि इस आदमी को अंगरेजी नहीं आती है अत: वह तुरंत वापस स्टोर में गई और वहां से एक लड़की, जो भारतीय दिखती थी और उसी स्टोर में क्लर्क का काम कर रही थी, को अपने साथ बुला कर बाहर लाई. बाद में उस लड़की के द्वारा बातचीत से स्टैसी को अमरनाथ के सामने आई हुई समस्त परिस्थिति की जानकारी हो सकी. चूंकि अमरनाथ को अपने लड़के और बहू के घर का न तो कोई पता मालूम था औैर न ही कोई फोन नंबर याद था, इस कारण स्टैसी ने नियमानुसार पहले तो स्थानीय पुलिस को फोन किया, फिर बाद में आवश्यक पुलिस काररवाई के बाद वह अमरनाथ को अपनी निगरानी में अपने घर ले आई. घर आ कर सब से पहले उस ने दिन भर के भूखेप्यासे अमरनाथ को खाना खिलाया. इस के बाद उस ने उन से उन की टूटीफूटी अंगरेजी में अतिरिक्त जानकरी भी प्राप्त कर ली.

अब अमरनाथ अमेरिकी स्त्री स्टैसी के साथ रहने लगे. स्टैसी की भी कहानी कुछकुछ उन्हीं के समान थी. उस के भी बच्चे और पति सब थे मगर जैसे उन में से किसी को भी किसी से कुछ भी सरोकार नहीं था. स्टैसी का पति किसी दूसरी स्त्री के साथ रहता था और बच्चे भी अमेरिकी जीवन के तौरतरीकों के अनुसार रहते थे, जो अपनी मां से भूलेभटके किसी त्योहार आदि पर मिल गए तो ‘हैलो’ हो गई.

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