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एक दिन अंकित बाजार से घर लौटा कि तभी उस का मोबाइल बज उठा. एक अनजान नंबर से काल आ रही थी. उस ने फोन उठाया तो सामने से आवाज आई,”जी मैं अनुज प्रसाद बोल रहा हूं. कल रात मयंक भाई औफिस में अचानक बेहोश हो गए. नाईट शिफ्ट की वजह से औफिस में ज्यादा लोग नहीं थे. मैं ने और मेरे एक कुलीग ने मिल कर उन्हें किसी तरह अस्पताल पहुंचा दिया है. उन का कोई रिश्तेदार तो यहां इस शहर में है नहीं. वे अकसर आप के बारे में बताया करते थे. इसीलिए उन के मोबाइल से आप का नंबर ले कर मैं ने काल लगाया है. आप आ जाएं तो बहुत अच्छा होगा.”

“ओके मैं अभी आता हूं. आप अस्पताल का नाम और वार्ड वगैरह मैसेज कर दीजिए. अंकित जल्दीजल्दी तैयार हो कर अस्पताल पहुंचा. मयंक बैड पर था. डाक्टर ने कई सारे टेस्ट करवाए थे.

टेस्ट रिपोर्ट्स ले कर अंकित डाक्टर से मिला.

डाक्टर ने रिपोर्ट देखते हुए परेशान स्वर में कहा,”सौरी मगर मुझे कहना पड़ेगा कि मिस्टर मयंक अब 5-6 महीने से ज्यादा के मेहमान नहीं हैं.”

“मगर उसे हुआ क्या है डाक्टर?” अंकित की आवाज कांप रही थी.

“बेटे उसे पेनक्रिएटिक कैंसर है. इस के बारे में जल्दी पता नहीं चलता क्योंकि शुरुआती फेज में कोई खास लक्षण नहीं होते. बाद में लक्षण पैदा होते हैं मगर फिर भी इन की पहचान मुश्किल होती है. क्योंकि लक्षण बहुत कौमन होते हैं. जैसे भूख कम लगना, वजन घटना आदि. मयंक को अब तक एहसास भी नहीं हुआ होगा कि उसे कोई गंभीर बीमारी है.”

“पर डाक्टर क्या अब कोई उपाय नहीं है? ”

“नहीं बेटा, अब सच में कोई उपाय नहीं. बस उसे खुश रखो. उसे जितना प्यार और खुशियां दे सको उतना दो और क्या कहूं मैं?”

“जी डाक्टर,”वह भीगी पलकों के साथ डाक्टर के केबिन से बाहर निकला. मयंक कहने को तो उस का कुछ नहीं लगता था पर जाने क्यों उसे लग रहा था जैसे मयंक ही तो उस का पूरा परिवार था. उस के साथ सब कुछ खत्म हो जाएगा. वह दोस्ती और प्यार, वह अपनापन, उस का साथ, हंसीमजाक और छोटीछोटी खुशियां. पिछले कुछ समय से उसे लगने लगा था जैसे मयंक ही उस की दुनिया है. पर अब वह भी जाने वाला था. अचानक गैलरी के फर्श पर बैठ कर अंकित फफकफफक कर रो पड़ा.

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अपनी बीमारी की बात जब मयंक को पता चली तो वह खामोश रह गया. पलकों की कोर से आंसू बह निकले.

अंकित ने उसे संभालते हुए पूछा,”तुम्हारी बड़ी बहन है न. उन का नंबर दो. मैं बात करता हूं.”

नंबर ले कर जब अंकित ने फोन लगाया और सारी बात बताई तो वह भी परेशान स्वर में बोलीं,” मेरे इकलौते भाई को यह अचानक क्या हो गया. इतनी दूर से मैं उस के लिए कुछ कर भी नहीं सकती. मेरे पति खुद बहुत बीमार हैं. उन्हें छोड़ कर आ भी नहीं सकती.”

फिर बहन ने भाई से वीडियो काल पर बात की. उसे दिलासा दिया पर साथ नहीं दे पाई.

अब मयंक की देखभाल के लिए अंकित के सिवा और कोई नहीं था. अंकित ने तय किया कि चाहे जो हो जाए वह अपने दोस्त का अंत तक साथ देगा. उस ने एक बड़ा फैसला लिया और अपनी नौकरी छोड़ दी. मयंक पहले ही रिजाइन दे चुका था. अंकित पूरे समय मयंक की देखभाल करने लगा. मयंक कई बार उलटियां कर देता तब अंकित उस की सफाई करता. उस का मुंह धुलवाता. उस के लिए सादा खाना बनाता फिर प्यार से खिलाता. उसे हर तरह का आराम देता. समय पर दवाएं देता. तरहतरह की फलसब्जियां ले कर आता और उसे खिलाता. जितना होता उसे खुश रखने का प्रयास करता.

एक दिन मयंक ने उदास स्वर में कहा,”जानते हो अंकित मेरा एक सपना था जो अब पूरा नहीं हो पाएगा.”

“कैसा सपना? कहीं शादी तो नहीं करना चाहता था तू…” हंसते हुए अंकित ने कहा तो मयंक बोला,”नहीं यार मेरा सपना शादी नहीं बल्कि मैं तो दुनिया घूमना चाहता था. दुनिया नहीं तो कम से कम भारत दर्शन तो करना चाहता ही था. हमेशा सोचता था कि कभी औफिस से 1-2 महीने की छुट्टी ले कर पूरा भारत देखूंगा. पर देख ले अब तो दुनिया से ही छुट्टी मिलने वाली है.”

“यदि ऐसा है तो तेरा यह सपना मैं जरूर पूरा करूंगा.”

“पर कैसे? नहीं यार इस हाल में अब संभव नहीं.”

“ऐसा कुछ नहीं है. डाक्टर ने केवल खानपान में परहेज करने को कहा है मगर घूमने से नहीं रोका है. फिर भी मैं डाक्टर से एक बार बात कर लूंगा. पर तेरा यह सपना जरूर पूरा करूंगा. तेरी खुशी ही तेरी बीमारी का इलाज है और फिर कोई इच्छा अधूरी छोड़नी भी नहीं चाहिए. नईनई जगह घूमने से तेरा मन बहलेगा. आबोहवा बदलेगी तो तुझे अच्छा लगेगा. तेरी तबीयत में भी सुधार आएगा. मैं आज ही प्लान बनाता हूं कि कैसे जाना है और कब जाना है.”

“सच यार तू मेरा यह सपना पूरा करेगा? तू मेरे भाई से भी बढ़ कर है. काश, हम पहले मिले होते. अब तो समय ही बहुत कम है मेरे पास.”

“कम है तो क्या हुआ? जितना समय है हम साथ घूमेंगे. तेरी मुसकान बनी रहेगी…” कहते हुए मयंक ने अंकित को भींच कर सीने से लगा लिया.

जल्द ही अंकित ने पुरानी कार खरीदी और अपने दोस्त को ले कर भारत दर्शन पर निकल पड़ा. उस ने मयंक की दवाएं और खानेपीने की जरूरी चीजें भी रख ली थीं. बीमारी की हालत में भी मयंक ने यह ट्रिप बहुत ऐंजौय किया. अंकित ने हर कदम पर उस का साथ दिया. उस के खानेपीने और दवाओं का ध्यान रखा. कोशिश करता कि मयंक के लिए साफसुथरा और सादा खाना मिल जाए. समय पर दवाएं खिलाता.

सफर के दौरान एक दिन वे मुंबई से पुणे के रास्ते में थे. पुणे के आउटर ऐरिया तक पहुंचतेपहुंचते ही शाम हो गई. दोनों ने तय किया कि रात यहीं बिताई जाए. उन्होंने ऐसी जगह कार रोकी जहां थोड़ी आबादी दिख रही थी.

अभी वे होटल, ढाबा जैसी कोई चीज ढूंढ़ ही रहे थे कि एक लड़की उन के करीब आई और बोली,”ठिकाना ढूंढ़ रहे हो क्या मुसाफिर?”

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“हां जी. हमें ठहरने के लिए जगह चाहिए.”

“नो प्रौब्लम. पास में ही मेरे चाचू का होटल है. चलो आप को वहां ले चलती हूं,” कह कर लड़की उन्हें एक छोटे से होटल में ले आई.

आगे पढ़ें- नीचे के फ्लोर पर ही उन्हें…

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