एक
उन दिनों हम ऊटी में रहते थे. एक शाम मेरे पति राम, मेरी 10 वर्षीय बेटी प्रियंवदा के साथ कहीं से वापस आए.
‘‘यह देखो तो…हमारे साथ कौन आया है!’’
प्रियंवदा ने एक गत्ते का डब्बा पकड़ रखा था, उसे मेज पर रख दिया. ढक्कन को हलके से खोला तो अंदर बिना दुम वाला एक छोटा सा चूहेनुमा जानवर था. ‘‘मम्मी, देखिए, यह तारा है.’’
हम उसे देख रहे थे, तारा हमें देख रही थी. वह एक टशनदार हैम्स्टर थी. चौकस, उत्सुक और हद दरजे की फौर्वड. शर्मीलापन का ‘श’ भी नहीं समझ रही थी. घबरा तो बिलकुल नहीं रही थी.
कुछ साल पहले भीमसेन ने एक जरबिल पाली थी. बड़ी प्यारी सी. ऐलिस नाम था उस का. उस बेचारी का तो देहांत हो चुका था. उसी का तीनमंजिला पिंजरा अब भी पड़ा था घर में. सो पिंजरा साफ कर के तारा के लिए तैयार कर लिया गया. पिंजरे में घुसते ही तारा की छानबीन भी शुरू हो गई. कुछ ही देर में उस ने पिंजरे का कोनाकोना समझ लिया. अंदर रखी हर चीज को वह सूंघ चुकी थी, खाने की डिब्बी को छान चुकी थी. प्रियंवदा ने उसे व्यस्त रखने के लिए लकड़ी के जो टुकड़े रखे थे उन्हें वह दांत से दबा कर देख चुकी थी. पानी की बोतल चूस चुकी थी. सब जांचपड़ताल पूरी होने के बाद वह पहियादौड़ लगा रही थी. सिर्फ वह ‘सीरियल बार’ अनछुआ छोड़ दिया जो उस के लिए पैट शौप से ये दोनों लोग खरीद के लाए थे.
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मुझे लगता है, उस रात बिस्तर में नींद का इंतजार करते हुए हम सभी के चेहरों पर मुसकान चिपकी हुई थी, एक प्यारी सी बढ़ोतरी जो हो गई थी हमारे परिवार में.
हमारे यहां सुबह सब से पहले राम ही उठते हैं. अगली सुबह कौफी का पानी रख हीटर को औन कर के वे टौयलेट चले गए. आंखों में नींद अब भी भरी थी. टौयलेट सीट पर बैठेबैठे वे नींद के कुछ आखिरी पल चुरा रहे थे, जब उन्हें अपने दिन का पहला ‘गुड मौर्निंग’ मिला. देखा कि तारा उन के पांव का अंगूठा कुतर रही थी.
‘‘आप इतनी सुबह उठ कर क्या कर रही हैं, मैडम? और वह भी अपने पिंजरे के बाहर?’’ राम ने उसे संभाल कर उठा लिया. टौयलेट सीट के पीछे देखा तो वहां उस का नया बसेरा पाया. जिस सीरियल बार में वह बिलकुल रुचि नहीं दिखा रही थी उसे वह रातभर में कई टुकड़ों में तोड़तोड़ कर एकएक कर वहां ले आई थी. बार ने अब एक ढेर का रूप धारण कर लिया था.
‘‘अरे मेरी बुद्धू चुहिया, तुम यहां कैसे रह सकती हो?’’ यह कह कर राम ने उसे वापस पिंजरे में पहुंचा दिया.
सब नाश्ता कर रहे थे और तारा पिंजरे में रखे इगलू, यानी अलास्का में बर्फ के बने गोलघर, जिन के अंदर लोग बंद हो जाते हैं और बाहर की दुनिया से उन का कोई वास्ता नहीं रहता, के अंदर मुंह फुलाए बैठी थी. बाहर निकल कर तभी आई जब बच्चे स्कूल चले गए थे. बड़ी बगावती मूड में थी. पिंजरे की कडि़यां पासपास ही थीं, मगर कोनों से बाहर निकलने की थोड़ी गुंजाइश थी. वहीं से, थोड़ा ऐंठ कर, थोड़ा खुद को सिकोड़ कर, अपने को पतला कर के जैसेतैसे वह फिर बाहर निकल आई और घर के दूसरे कोने में स्थित टौयलेट की तरफ भागने लगी. राम फिर उसे वापस ले आए.
‘अब इस आफत की पुडि़या के लिए नया पिंजरा लाना पड़ेगा,’ ऐसा सोचतेसोचते मैं कोनों की कडि़यों को कस के तार से बांधने लग गई. तारा ने फिर कडि़यों के बीच चौड़ा गैप ढूंढ़ना शुरू कर दिया.
नखरे उस के तब शुरू हुए जब उस ने अपने भागने के सारे रास्ते बंद पाए. पागल हो गई वह और बेतहाशा पिंजरे की सलाखों पर चढ़ने लगी. तीसरी मंजिल पर चढ़ कर, कभी मेरी, कभी राम की आंखों में आंखें डाल कर उस ने पिंजरे की दीवार पर सिर मारना शुरू कर दिया. गुस्से में पास रखे लकड़ी के टुकड़े को लात मारी. दोनों हाथों से सलाखें पकड़ कर जोरजोर से हिलाईं. इतनी छोटी सी चुहिया का इतना बड़ा संग्राम. हम दोनों को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था. मुझे डर था, उस का यह आवेग कहीं उसे बीमार न कर दे, सो पास पड़ी भीमसेन की कमीज से उस के पिंजरे को ढक दिया. तब जा कर वह कुछ शांत हो पाई.
ऐसा ही कुछ तो मेरे साथ हुआ.
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दो
कुछ साल बाद, जब मैं ने अपने 46 साल पूरे किए और मेरे दोनों बच्चे कालेज के लिए घर छोड़ कर चले गए थे, मुझे वैसी ही व्याकुलता महसूस होने लगी जैसी उस दिन तारा ने जाहिर की थी. राम को छोड़ कर और अपनी सालों की सफल साइकाइटरी की प्रैक्टिस को डंप कर के, अपनी जवानी के खोए हुए प्यार, जुल्फी, को ढूंढ़ने के लिए मैं भोपाल निकल पड़ी.
तीन
तारा पिंजरे से एक बार और निकल गई थी, पर कुछ घंटों में ही उस के सामने आ कर बैठ गई थी. पिंजरा ही उस का घर जो था.
चार
पता नहीं कहां से स्कूल के आखिरी सालों में जुल्फिकार आ कर भरती हो गया. आर्ट्स स्टूडैंट था. कुछ ही हफ्तों में ऐसा लोकप्रिय हो गया कि बच्चे तो बच्चे, शिक्षक भी उस के जादू में आ गए थे और यह जानते हुए भी कि स्कूल कैप्टन के ओहदे के लिए मैं सालों से कामना, तैयारी और इंतजार कर रही थी, उन्होंने यह पद उस बंदर को दे दिया.
‘‘तुम को तो इस साल अपने ऐंट्रैंस एग्जाम्स के बारे में सोचना है, बेटा,’’ मैथ्स के टीचर ने ये ढाढ़स भरे सादेसूखे शब्द कह कर मुझे किनारे खिसका दिया.
क्या मालूम, वह जुल्फिकार का बच्चा लंगड़ा था या डरपोक, मैं ने उसे कभी अकेले चलते हुए नहीं देखा. हमेशा उस के साथ लड़कों का एक झुंड चलता था. सब चमचे थे उस के. उसे देखते ही मुझे जबरदस्त चिढ़ मचती थी, मेरा खून खौलने लगता था. मैं रास्ता बदल देती थी. उस की तरफ देखती भी नहीं थी.
इस का मतलब यह नहीं कि मुझे यह जान कर हैरानी हुई हो कि जनाब को इश्क हो गया था मुझ से. मेरा मतलब है, ऐसे कम ही हैं जो मुझ पर फिदा नहीं हुए हैं.
रोजाना लंच में और जब भी थोड़ा अवकाश मिलता, मैं और मेरी सब से प्यारी सहेली रत्ना हाथों में हाथ डाल, जाड़ों की गुलाबी धूप में स्कूल के ग्राउंड में घूमा करते थे, गप मारते थे, अपने पसंदीदा गीत गुनगुनाते थे. बहुत गहरी थी हमारी दोस्ती. अकसर यों टहलतेटहलते मेरी नजर क्लास की तरफ जाती और मैं हंस देती. ‘‘वह देखो, वहां कौन खड़ा है! बेवकूफ, तुम सब का हीरो!’’ खोयाखोया सा अपने साथियों से टिक कर खड़ा खिड़की से मुझे घूरघूर कर देखता था वह पागल जुल्फी. ‘लूजर’, सीधीसादी रत्ना कभी किसी का बुरा न सोचने, न चाहने वाली लड़की थी. वह चुप ही रहती.
रत्ना से मैं फिर तब मिली जब मैं मैडिकल कालेज के सेकंड ईयर में थी. स्कूल छोड़ने के बाद हमारे संपर्क टूट गए थे. अजीब बात थी, क्योंकि स्कूल में हम दोनों को अलग करना असंभव ही था.
उस के पहले वाक्य ने ही मुझे हिला कर रख दिया.
‘‘हम भागने की सोच रहे हैं. तुम्हारी राय चाहिए, मुनमुन.’’
कुछ देर तक मैं ‘क्याक्या’ ही करती रही. ये भागनेवागने की बातों की तो मैं बस स्पोर्ट्स में ही कल्पना कर सकती थी.
‘‘भागने की सोच रही हो, किस के साथ?’’ मैं बड़ी मुश्किल से पूछ पाई.
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अंतर्मुखी स्वभाव की थी मेरी रत्ना. उस वक्त मुझे एहसास हुआ कि हमेशा उस के कान मेरी बातों के लिए तैयार रहते थे. आज पहली बार गीयर उलटा लगा था.
वह रोने लगी, ‘‘मैं उस से प्यार करती हूं, मुनमुन. हम दोनों एकदूसरे को बेहद चाहते हैं.’’
सिसकियों के बीच वह बोलती गई, ‘‘लेकिन वह…वह मुसलमान है, और मेरे मम्मीपापा को तो तुम जानती ही हो. कभी नहीं मानेंगे…उफ, कितनी दुखी हूं मैं! अब तुम ही मुझे बताओ, मैं क्या करूं?’’
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