सो, नैवेद्य की तो कोई दिक्कत थी नहीं. मैं उसे तैयार कर मिसेज सिंह के यहां छोड़ने जाने ही वाली थी कि दाहिनी पलक जोर से फड़की. मुझे याद आया, मां दाहिनी आंख के अपशकुन से कितना डरती थीं, खासकर हम बच्चों की सलामती के लिए.
‘इसे साथ भी तो ले जाया जा सकता है,’ मेरे भीतर से किसी ने कहा.
‘अरे, यह अपशकुन नहीं होता.’
मैं बच्चे के बालों में कंघी करने लगी. आदतन उस का माथा चूमा और उस के चेहरे को देख कर मुसकरा ही रही थी कि पलक में फिर कंपन महसूस हुई.
‘साथ ले जाने में क्या बुराई है?’
इस दफा मैं खुद पर काबू न रख सकी और मन बना लिया, नैवेद्य को अपने साथ ले जाऊंगी.
बाहर, देर से होती बारिश पूरी तरह रुक चुकी थी और आसमान से बादल छंट रहे थे. अभीअभी फिर से निकली तेज धूप में चुभन थी. मैं ने स्कूटी बाउंड्री से बाहर निकाली और स्टार्ट भी नहीं कर पाई थी कि नैवेद्य दौड़ कर उस में आगे खड़ा हो गया. दाहिनी आंख का फड़कना बदस्तूर जारी था. मन में एक आशंका जगी. अगर कहीं स्कूटी टकरा गई, फिसल या गिर पड़ी तो आगे खड़े नैवेद्य को मुझ से ज्यादा चोटें आएंगी. क्रूर कल्पना ने जैसे मेरे शरीर को निचोड़ लिया, पिंडलियों और कलाइयों में इस कदर कमजोरी महसूस हुई कि स्कूटी को स्टैंड पर खड़ी कर मैं बच्चे को देखने लगी. मन सांपछछूंदर वाली हालत में था.
मैं ने खुद से अचरज से पूछा, ‘आज क्यों मैं नैवेद्य को पड़ोस में नहीं छोड़ना चाहती?’ भीतर से तुरंत उत्तर आया, बुरेबुरे खयाल की शक्ल में, ‘मिसेज सिंह का क्या भरोसा, बुढ़ापे का शरीर है. बच्चा कहीं दौड़ कर सड़क पर आ गया तो? कोई भारी चीज अपने ऊपर गिरा ली तो? छत पर अकेला भाग गया तो?’ और भी न जाने कितने ‘तो’ दिमाग में आने लगे. मिसेज सिंह पहली बार मुझे बच्चे को संभालने में असमर्थ जान पड़ीं.
पर स्कूटी में बेटे को आगे खड़ा करना भी तो सेफ नहीं? मन बोझिल होने लगा. अपशकुन मानी जाने वाली आंख की फड़कन ने मेरे 10 साल के शानदार ड्राइविंग के अनुभव से उपजे आत्मविश्वास को धूल में मिला दिया.
अब मैं ने सोचा, क्यों न पति को फोन कर के मना कर दूं, पर यह कमजोर खयाल एक पल के पंखों पर आया और दूसरे के पंखों पर उड़ गया. एक तो मैं यह जानती थी कि काम वाकई जरूरी है. दूसरे, हफ्ते भर बाद घर लौट रहे अपने पति को मैं नाराज नहीं करना चाहती थी.
बच्चे को मैं ने स्कूटी पर अपने पीछे बैठाया. उस के नन्हे, नर्म हाथों को अपनी कमर पर कस लिया और आवाज को भरसक आदेशात्मक बनाते हुए कहा, ‘देखो नानू, चाहे कुछ भी हो जाए, तुम मुझे कस के पकड़े रहना,’ तभी बगल वाली बालकनी से मिसेज सिंह की अनमनी आवाज हम तक आई, ‘‘अरे, आज नानू को साथ ले जा रही हो?’’
‘‘हां, मैं ने सोचा घूम आएगा तो इसे अच्छा लगेगा.’’
‘‘मेरे पास भी इसे अच्छा ही लगता है,’’ एक पल को उन्होंने बुरा मान जाने वाली आवाज में कहा, फिर जैसे संभलीं और विवश प्रार्थना सी मनुहार में मेरे बेटे को पुकारा, ‘‘नानू, आ जाओ न. चोरपुलिस खेलेंगे.’’
‘‘नहीं, दादी, मैं मम्मा के साथ जाऊंगा,’’ उस ने मेरी कमर कस कर पकड़ते हुए कहा.
‘‘ठीक है, घूम आओ, पर सुनो, तुम्हारे बाबा गुब्बारों का पूरा पैकेट खरीद कर लाए हैं. लेना है तो आओ.’’
‘‘नहीं, मैं लौट कर लूंगा. आप खूब सारे, गुब्बारे फुला कर रखना दादी,’’ उस ने ऊंची आवाज में कहा.
मेरा बेटा जबजब मिसेज सिंह को ‘दादी’ कह कर पुकारता है, खासकर सड़क से, जब पड़ोसियों के घरों के भीतर तक उस का मोहक संबोधन सुनाई देता है तो मिसेज सिंह के झुर्रियों वाले पोपले चेहरे पर न जाने कौन सा भाव आता है कि वे सुंदर दिखने लगती हैं.
‘‘बाय नानू, जल्दी आना.’’
पीछे से उन की आवाज आई और नैवेद्य ने बाय करने के लिए हाथ मेरी कमर से हटाया ही था कि मैं ने स्कूटी रोक दी, ‘‘देखो बेटे, अगर तुम ठीक से नहीं पकड़ोगे तो मैं नहीं ले जाऊंगी तुम्हें. जाओ, अपनी पड़ोस वाली दादी के पास.’’
‘‘नहीं, मम्मा, प्लीज, अब नहीं छोड़ूंगा. प्रौमिस.’’
उस के चेहरे पर डर देख कर मुझे अपनेआप पर गुस्सा आया. क्या हो गया है मुझे? मैं ने उस का माथा चूमा और फिर स्कूटी स्टार्ट की.
अब हम मुख्य सड़क पर थे. दाहिनी पलक बुरी तरह फड़क रही थी. दिल ऊंची आवाज में धड़क रहा था. हाथों में खालीपन महसूस हो रहा था. तभी नैवेद्य चहका, ‘‘मम्मा, घोड़ा.’’
सामने से दुलकी चाल में आते सजीले घोड़े को उस ने हथेली की पांचों उंगलियों से इंगित किया. कोई और दिन होता तो पल दो पल मैं भी उस खूबसूरत अरबी घोड़े को निहारती. पहले दोएक बार मैं ने घोड़े वाले को 10-5 रुपए दे कर नैवेद्य को घोड़े की सवारी भी करवाई है और सैलफोन के कैमरे में इस शाही दृश्य की खुशगवार स्मृतियां कैद भी की हैं, पर उन कमजोर क्षणों में, मेरे खुदमुख्तार दिमाग ने खुद को एक भीरु मां में बदलते पाया और मुझे पता भी नहीं चला कि नन्हे परिंदे से चहकते अपने नर्म बच्चे पर मैं किस कदर चीखी, ‘‘ठीक से पकड़ो.’’
मेरी कमर के इर्दगिर्द उस की पकड़ फिर कस गई और चेहरा मेरी पीठ से सट गया, साफ था कि वह सहम गया है. मैं खुद पर फिर झल्लाई और अपने होशोहवास दुरुस्त रखने के बारे में सोचने लगी. इन 5-7 मिनटों में आंख एक बार भी नहीं फड़की थी. मैं ने स्कूटी की गति बढ़ाई और अपनेआप में लौटते हुए बेटे से पूछा, ‘‘नानू, मजा आ रहा है कि नहीं?’’
‘‘हां, मम्मा, मजा आ रहा है,’’ वह चटखती कली की तरह खिलते हुए बोला.
अब मैं तकरीबन सहज थी. यह बात और थी कि मैं ने बाजार वाला दुपहियोंचौपहियों से पटा रास्ता न चुन कर झील किनारे वाली वीआईपी सड़क चुनी थी जो दिनदोपहर लगभग सूनी रहती है.
मौसम, जैसा कि भोपाल में आमतौर पर रहता है, सुहाना था. सांवली बदली की बांहों में सूरज डूबडूब जा रहा था. झील के किनारे कमउम्र लड़केलड़कियां यहांवहां जोड़ों में टिके खड़े थे. कमसिन लड़कियों के चेहरों पर दुपट्टे थे और तरुण लड़कों की आंखों में साहस, उत्तेजना और हड़बड़ाहट. सख्त हाथों में नर्म कलाइयां थीं और सड़क की नाभिरेखा पर फूल ही फूल. शफ्फाक सफेद, चटख, किरमिजी, सुर्ख सिंदूरी और शोख नीले विदेशी फूलों पर थरथराती तितलियों के नृत्य थे. सुंदर सी रची झील में एक फौआरा आसमान को छूने का बुलंद हौसला लिए ऊंचा, और ऊंचा उठ रहा था और ऊंचाई से झरती बूंदों को हवा पानी पर ऐसे बिखेर रही थी जैसे कोई अदृश्य अप्सरा मोतियों को उछालने का खेल खेल रही हो. दूर पानी में कश्ती पर एक मांझी दिखा, जलसुंदरियों के लिए जाल बिछाता हुआ.