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वह हमेशा से बहुत कम बोलने वाला खामोश सा लड़का था. अपने में खोया, कुछ सोच रहा हो मानो. पहले मुझे लगा कोई बात है इस खामोशी में. लेकिन उस ने पूछने पर हर बार हलके से मुसकराते हुए कहा, ‘ऐसी तो कोई बात नहीं. मेरा स्वभाव ही है शायद ऐसा.’कालेज में काफी लंबा समय उस के साथ बिताया. प्रथम वर्ष में तो हम सब सीनियरों से डरेसहमे रहते थे. कालेज का नयानया माहौल. रमने में थोड़ा समय तो लगता है.

फिर द्वितीय वर्ष में हमारे मध्य बातचीत आरंभ हुई. बातें स्कूल के दिनों की, आने वाले भविष्य की, वर्तमान में जो चल रहा है, उस की. जानपहचान हुई तो बातें भी धीरेधीरे प्रगाढ़ता से होने लगीं. अकसर ऐसा होता है किन्हीं 2 लोगों की अच्छी बनती है. दोस्त हों, सहेलियां हों या कोई भी 2 लोग. लड़कालड़की भी हो सकते हैं. भले ही लोग उसे प्रेम का नाम दें लेकिन वह मित्रता भी हो सकती है. आरंभ तो मित्रता से ही होता है. मेरे और उस के विचार मिलते थे. मुझे उस का स्वभाव पसंद था. उस में फूहड़ता नहीं थी. वह शांत व गंभीर था. जोकि मुझे पहले खटकता था. लगता था इस गंभीरता के पीछे कोई हादसा छिपा हुआ है. लेकिन धीरेधीरे मुझे समझ आया कि उस का स्वभाव ही ऐसा है.

वह 25 वर्ष का खूबसूरत युवक था. बीए द्वितीय वर्ष में हम साथसाथ थे. वह पढ़ने में अव्वल था और मैं ठीकठाक थी. मैं तो बस डिगरी के लिए पढ़ रही थी. मुझे पढ़ाई में कोई विशेष दिलचस्पी नहीं थी. न ही परिवार से ऐसा कोई दबाव था. मेरे सपने सीमित थे. जब तक शादी नहीं हो जाती, तब तक क्या करूं? सो पढ़ाई जारी रखी. मेरे पिता पूर्व विधायक थे. उन का अपना प्रौपर्टी का कारोबार था. प्रौपर्टी का कारोबार और पूर्व विधायक होने का अर्थ यही है कि मुझे न तो किसी नौकरी की जरूरत थी और न आर्थिक सुरक्षा की. पिताजी का यही कहना था कि बिना टैंशन के पढ़ाई करो. शादी किसी बड़े घर के लड़के से धूमधाम से करूंगा. किसी तरह का तनाव लेने की जरूरत नहीं है. हां इतना अवश्य चेताया था कि यदि लड़का तुम्हारी पसंद का हो तो जातबिरादरी का ध्यान रखना और उस से भी ज्यादा जरूरी यह कि पहले औकात देख लेना लड़के की. फिर प्यार के फेर में पड़ना. खाली प्यारमोहब्बत से जीवन नहीं चलता. प्यार करना लेकिन पागलपन मत करना.

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अब उन्हें कौन समझाए कि प्यार और पागलपन पर्यायवाची ही हैं एकदूसरे के. मैं पिताजी की हां में हां इसलिए मिलाती थी क्योंकि मेरा प्यार में पड़ने का कोई इरादा था ही नहीं. पिताजी ने दुनियादारी देखी है. उन्हें मेरी चिंता होना स्वाभाविक ही था. मैं उन की इकलौती कन्या संतान थी. मुझ से बड़े 2 भाई थे. जो पढ़लिख कर पिताजी के व्यवसाय में हाथ बंटा रहे थे. मैंउसे अपना दोस्त मानने लगी थी. सब से अच्छा दोस्त. मैं उस से हर बात शेयर करती थी. उसे अपने परिवार के विषय में बताती थी. कभी भाइयों से झगड़ा हो जाए या मां डांट दे तो भी उसे बता कर अपना मन हलका कर लेती थी.

मैं उस के लिए घर से टिफिन लाती थी. वैसे मैं टिफिन तो अपने लिए लाती थी लेकिन जब से वह दोस्त बना था, खास दोस्त, तब से टिफिन में कुछ ज्यादा खाना रखवा लेती थी मां से कह कर. ‘किस के लिए?’ मां हास्य से पूछतीं. ‘फ्रैंड के लिए’, मैं बात को टालने वाले अंदाज में कहती. ‘लड़का या लड़की’, मां उत्सुकता से पूछती. ‘मां, तुम भी…’ मैं बात को खत्म करने के उद्देश्य से मां से दूर जा कर बात करने की कोशिश करती लेकिन मां पीछे से आ कर कहती, ‘मुझे कोई एतराज नहीं तुम्हारी दोस्ती से. चाहे किसी से भी हो. लेकिन बात आगे बढ़े तो सोचसमझ कर कदम उठाना. कोई ऐसी गलती मत कर बैठना कि…’

मां की बात जब तक पूरी होती मैं कालेज के लिए निकल घर से बाहर होती. मां का चेतावनीभरा स्वर सुनाई देता था. चेतावनी थी या समझाइश या दोनों ही. लेकिन मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था. अपने बारे में क्या कहूं. बस ठीकठाक थी. 20 वर्ष की उम्र, दुबलापतला, गौर वर्ण का शरीर. नैननक्श अच्छा ही था. तभी तो कई लड़के निहारते रहते थे. वैसे लड़कों का क्या है, लड़की दिखी नहीं और टकटकी लगानी शुरू कर दी. मैं खुद क्या समझूं. अगर वह कहे तो समझ में आए और वह कहे ऐसी संभावना नजर नहीं आती.

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वो यानी मेरा बैस्ट फ्रैंड. दुबलापतला, मझोले कद का गोरा सा लड़का. वह शांत सा, खामोश सा लड़का. हिंदी प्रदेश के छोटे से शहर का लड़का. कहना भी चाहता होगा तो संकोच के मारे कह नहीं पाएगा. अब मुझ दिल्ली की लड़की को ही सब पूछना पड़ेगा. मुझे तो उस के बारे में कुछ भी पता नहीं. दोस्त के बारे में कुछ पता होना ही चाहिए. आज पूछूंगी. कालेज गई, हम दोनों एक ही डैस्क पर बैठते थे. 2 पीरियड हो गए. वह बहुत बारीकी से लैक्चर सुनता रहा. अपनी कौपी पर नोट करता रहा. तीसरा पीरियड राजनीतिशास्त्र का था. प्रोफैसर साहब अवकाश पर थे. सब क्लास से बाहर जाने लगे. मैं ने कहा, ‘चलो, क्लास खाली है.’ वह कहीं डूबा हुआ था. मैं ने उस को झकझोरा. जैसे उसे होश आया ‘हां, चलते हैं’ कहते हुए वह उठ खड़ा हुआ.

हम कैंटीन में आ गए. मैं ने अपना टिफिन खोल कर उस के सामने रख दिया. ‘शुद्ध मैथी के परांठे,’ मैं ने चहकते हुए कहा. ‘शुद्ध मतलब.’ उस ने पूछा. ‘देशी घी से बना,’ मैं ने उत्तर दिया. वह कुछ नहीं बोला. मैं ने उस की तरफ एक परांठा बढ़ाते हुए कहा, ‘कुछ अपने बारे में बताओ.’ ‘क्या?’ उस ने मेरी तरफ देखते हुए कहा. ‘मतलब अपने परिवार के बारे में.’ ‘परिवार के बारे में क्या बताऊं?’ उस ने कहा. ‘नहीं बताना चाहते?’ ‘नहीं, ऐसी बात नहीं है.’ ‘तो बताओ.’ ‘तो सुनो, हम 3 भाई हैं. 2 मुझ से छोटे हैं. मां हैं, पिताजी हैं. पिताजी वकील हैं.’ इतना कह कर वह चुप हो गया. ‘किस शहर के हो?’

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‘शहर का नहीं, गांव का. छतरपुर से 30 किलोमीटर दूर एक छोटे से गांव का.’ ‘बिहार से हो या यूपी से?’ मैं ने पूछा ‘बिहार और यूपी के अलावा भी राज्य हैं. पढ़ने या काम की तलाश में निकला हर लड़का बिहार, यूपी का नहीं होता.’ ‘लेकिन ज्यादातर तो होते हैं.’ ‘मैं मध्य प्रदेश से हूं,’ उस ने कुछ गर्व से कहा, ‘नक्शे में ठीक बीचोंबीच.’ ‘ओह.’ ‘और कुछ?’ उस ने बात को खत्म करने वाले अंदाज में कहा. ‘बहुत कुछ,’ मैं ने बात को बढ़ाने के अंदाज में कहा, ‘क्या, कुछ?’ ‘सबकुछ.’ ‘अपना तो बस इतना ही है,’ उस ने परांठा खत्म करते हुए कहा और पानी का गिलास उठाया. मैं ने बात बदलते हुए पूछा, बात इसलिए बदल दी कि परिवार के बारे में बताते समय उस के चेहरे पर कुछ तनाव सा आ गया था.

‘मैं कैसी दिखती हूं?’ ‘मतलब?’ उस ने हैरानी से मेरी तरफ देखते हुए कहा. ‘ज्यादा मतलब मत निकालो. मैं सिर्फ ईमानदारी से यह जानना चाहती हूं कि मैं कैसी दिखती हूं?’ ‘तुम्हें नहीं पता, तुम कैसी दिखती हो? आईना तो रोज देखती होगी?’ ‘मुझे पता है कि मैं ठीकठाक दिखती हूं. बस तुम्हारा नजरिया जानना चाहती हूं. मतलब, मुझ में क्या खास है कि कोई मुझ से प्यार करे, शादी के लिए प्रपोज करे. कहने का मतलब लड़कों की देखने की जो दृष्टि होती है उस के हिसाब से मैं कैसी दिखती हूं?’ मुझे उस के उत्तर की प्रतीक्षा थी. मैं जानती थी उस का उत्तर ईमानदारी का होगा.

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