‘‘ओहो…, कहां खोई हैं मेरी दीदी?’’ ‘‘ना रे, सोच रही थी तेरी शादी में किस को बुलाऊं, किस को नहीं? तू ही बता किसेकिसे बुलाना चाहेगी? मैं तो समझ नहीं पा रही किसे बुलाना है, किसे नहीं?’’ ‘‘दीदी, मैं समझ रही हूं आप की समस्या. आप विश्वास रखो आप जिसे भी बुलाएंगी वे हमारे शुभचिंतक ही होंगे, न कि हम पर ताने कसने वाले. चाहे वे हमारे पापा ही क्यों न हों. यदि उन्हें हमारी खुशी से खुशी नहीं तो मत ही बुलाइएगा. पर मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि आप कुछ और ही सोच रही हैं.’’ ‘‘अरे नहीं, कोई बात नहीं है. तू एंजौय कर अपनी शादी. तेरी खुशी से बढ़ कर मेरे लिए कोई चिंताफिक्र नहीं.’’
‘‘कुछ तो छिपा रही हो दीदी, क्या अपनी बहन को भी नहीं बताओगी?’’ ‘‘मैं ने कहा न, कोई बात नहीं. क्या मुझे थोड़ी देर आराम करने देगी?’’ मैं झुंझला कर बोली. मैं पहली बार अभिलाषा पर झुंझलाई थी. वह भी असहज हो कर चली गई. मैं कैसे बताती मुझे क्या चिंता खाए जा रही थी? अतीत के पन्ने को फिर से उधेड़ने की हिम्मत अब रही नहीं और उस में उलझ कर निकलने की काबिलीयत भी अब पस्त हो चुकी है. जो मोहित के रहते कभी नमकतेल का भाव न जान सकी थी वह आज आशियाना सजाना चाहती है.
जुगनू की रोशनी जैसा कमल के इश्क को तवज्जुह देती रह गई पूरी जिंदगी. कभी समझ ही नहीं पाई मोहित की खामोशी को. भरसक उस ने मुझे अपने पावर का इस्तेमाल कर के अपनाया था. लेकिन वह पावर भी तो उस का प्यार ही था. कहां मैं एक औरकेस्ट्रा में नाचने वाली खूबसूरत मगर मगरूर लड़की और कहां मोहित ग्वालियर के राजमहल के केयरटेकर का बेटा. काले रंग का गोलमटोल ठिगना जवान. मुझे शुरू से ही पसंद नहीं था. लेकिन उसे पता नहीं किस शो में मैं दिख गई थी और वह मुझ पर फिदा हो गया था. मैं मोहित को कभी प्यार करने की सोच भी नहीं सकती थी. भले ही वह और उस के दोस्तों ने मेरे पिता को लालच की कड़ाही में छौंक दिया हो लेकिन मुझे इंप्रैस न कर सका. मैं तो शादी जैसे लफड़े में पड़ना ही नहीं चाहती थी. लेकिन पापा ने मोहित के साथ शादी के बंधन में बांध दिया. मुझे उन्मुक्त हो कर नाचना था. अपनी मरजी के लड़के से प्यार और फिर शादी करना चाहती थी.
पर इस जबरन में पापा की भी कोई गलती नहीं थी. मेरे आशिकों की बढ़ती तादाद और मिलने वाली प्रशंसा व रुपयों से मेरा ही दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ बैठा था. मैं कला को भूल चुकी थी. मेरे लिए नाचना केवल व्यापार बन कर रह गया था. और व्यापार में सबकुछ जायज होता है. बस, यही मैं समझती थी. और समझतेसमझते इतना गिर गई कि गिरती ही चली गई. कौमार्य कब भंग कर आई, पता ही नहीं चला. पापा की चिंता और फैसला दोनों ही अपनी जगह जायज थे परिस्थिति के अनुसार. और शादी कर मैं ग्वालियर से गुड़गांव डीएलएफ आ गई.
गुड़गांव में ही तो कमल से मिली थी. वह हरियाणवीं लोकसभा के स्टेज प्रोग्राम में अनाउंसर का काम करता था. जब भी आता था तो रंगीनियां साथ ले कर ही आता था. उस के छींटेदार चुटकुले, हरियाणवी लोकगीतों के झड़ते बोल, रोमांटिक शेरोशायरी में बात करने का अंदाज मुझे आकर्षित करने लगा. मैं कमल में अपने टूटे सपनों को ढूंढ़ती रहती. देखते ही देखते कमल, मोहित से ज्यादा मेरा दोस्त बन गया. हम दोनों एकदूसरे के समक्ष खुलने लगे. उस की रोजरोज के स्टेज प्रोग्राम पर की जाने वाली चर्चाएं, खट्टीमीठी नोंकझोक वाली बातें, उस के हंसनेबोलने का स्टाइल सब मुझे भाने लगा.
सबकुछ तो उस में कमाल ही था. गेहुआं रंग पर मद्धिममद्धिम मोहक मुसकान. किसी भी महिला को कैसे अपनी ओर आकर्षित किया जाता है, यह कोई कमल से सीखे. मैं कमल के रंग में रंगने लग गई थी. मुझे उस से प्यार होने लगा. मैं कमल के प्रति समर्पित होने लगी. लेकिन मुझे कमल की आर्थिक स्थिति हमेशा से खलती रही पर उसे कोईर् परवा नहीं थी. वह असीम पर निर्भर रहता. उसी दौरान असीम से भी मिलवाया था मुझे और मोहित को, कुछ ही समय में असीम हमारे परिवार में घुलमिल गया. उन दिनों असीम की उम्र 23-24 के लगभग होगी. इधर अभिलाषा की भी उम्र 14-15 की होने जा रही थी. एक तरफ नईनई जवानी, दूसरी तरफ गांवदेहात से आया आशिक. उस पर से मेरे घर का माहौल, जहां मैं खुद इश्क के जाल में फंसी थी वहां अपनी बहन को कैसे रोक पाती.
कमल असीम को प्यार और शादी के सपने दिखाता रहा और रुपए ऐंठता रहा. पर सच तो यह है कि मैं प्यार में थी ही नहीं, बल्कि वासनाग्रस्त थी. जब खुद की ही आंखों पर हवस की पट्टी चढ़ी हो तो बहन को किस संस्कार का वास्ता देती. मोहित के औफिशियल टूर पर जाते ही मैं खुद को कमल के हवाले सौंप दिया करती. मैं पूरी तरह ब्लैंक पेपर की तरह कमल के सामने पन्नादरपन्ना खुलती जाती और कमल उस पर अपने इश्क के रंग से रंगबिरंगी तस्वीरें बनाता रहता. उस की आगोश में मैं खुद को भूल जाती थी.
वह मेरे मखमली बदन को चूमचूम कर कविताएं लिखता. सांस में सांसों को उबाल कर जब इश्क की चाशनी पकती, मैं पिघल जाया करती. मुझे एक अजीब सी ताकत अपनी ओर खींचने लगती. मैं कमल के गरम बदन को अपने बदन में महसूस करने लगती. उस के बदन के घर्षण को पा कर मैं मदहोश हो जाती. वह मेरे दिलोदिमाग पर बादल की तरह उमड़ताघुमड़ता और मेरे शरीर में बारिश की तरह झमाझम बूंदों की बौछारें करने लगता. मैं पागलों की तरह प्यार करने लगती कमल से. मुझे उस के साथ संतुष्टि मिलती थी. मैं इतनी पागल हो चुकी थी कि भूल गई थी कि मैं प्रैग्नैंट भी हूं. मोहित के बच्चे की मां बनने वाली हूं. मुझे सिर्फ और सिर्फ अपनी खुशी, अपनी दैहिक संतुष्टि चाहिए थी. मैं ने सैक्स और प्यार में से केवल और केवल सैक्स चुना. मुझे तनिक भी परवा न रही अपने ममत्व की.
मेरी ममता तनिक भी नहीं सकपकाई मोहित के बच्चे को गिराते हुए. जब मेरे गुप्तांगों में सूजन आ जाया करती या मेरे रक्तस्राव न रुकते तब असीम दवाईयां ला कर देता मुझे. उस ने भी कई बार समझाने की कोशिश की, ये सब गलत है भाभी. पर मेरी ही आंखों पर हवस की, ग्लैमर की पट्टी बंधी थी. मैं कुछ सोचनेसमझने के पक्ष में ही नहीं थी. मैं खुद को मौडर्न समझती रही. और फिर से मैं जब दोबारा प्रैग्नैट हुई वह बच्चा तुम्हारा नहीं था, वह कमल का बच्चा था. मैं कमल के बच्चे की मां बनने वाली थी. मेरी जिंदगी पर से तुम्हारा वजूद खत्म होने को था. मैं पूरी तरह से कमल से प्यार की गहराई में थी. मुझ पर मेरा खुद का जोर नहीं था. कमल पिता बनने की खुशी में एक पल भी मुझे अकेला न छोड़ता.
सुबह औफिस निकलते ही कमल आ जाया करता. शाम तक मेरे साथ रहता और फिर तुम्हारे आने के समय एकआध घंटे के लिए मार्केट में निकल जाता, अपने और तुम्हारे लिए कुछ खानेपीने का सामान लेने. और तुम्हारे आने के एकआध घंटे बाद फिर वापस आ जाता. कमल तुम्हारे सामने मुझे माया कह कर भी संबोधित नहीं करता था. तुम्हें तो शायद पता भी नहीं कि वह अकसर तुम्हारे लिए कौकटेल ड्रिंक ही बनाया करता था ताकि तुम्हें होश ही न रहे और हम अपनी मनमानी करते रहें. मैं कमल की हरकतों पर खुश हो जाया करती थी. उस के माइंड की तारीफ करते न थकती.