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कहने लगा, ‘तुम बिन ब्याही बच्चे की मां हो,?’ इस सवाल पर मैं सन्न रह गई. मेरे बुरे समय ने यहां भी मेरा पीछा न छोड़ा. पहले तो खुद को संयत किया, फिर बोली, ‘इतने बड़े आरोप के पीछे आप के पास सुबूत क्या है?’

कहने लगा कि जिस अस्पताल में तुम ने बच्चा जना था उस की नर्स मुझे जानती थी. वह मेरे गांव की रहने वाली थी. एक दिन तुम और मैं एक मौल में खरीदारी कर रहे थे. तभी उस नर्स नें तुम्हें पहचान लिया. उस ने एक दिन मुझे अपने घर बुलाया, फिर तुम्हारे बारे में पूछा. मैं ने बताया कि तुम मेरी पत्नी हो. मैं ने महसूस किया कि वह मुझ से कुछ बताना चाहती है मगर संकोचवश नहीं कह रही थी. मैं ने जोर दिया. तो वह बेाली, ‘क्या अपनी पत्नी के बारे में तुम ने कुछ पता किया था?’

‘मैं कुछ समझा नहीं?’

‘जैसे, वह कहां की रहने वाली है, उस का घरपरिवार कैसा है, लड़की का चालचलन कैसा है?’

‘मेरे पापा और उस के पापा एक ही औफिस में काम करते थे. सजातीय होने के कारण मेरे पापा ने बात चलाई. लड़की देखी, अच्छी लगी, पढ़ीलिखी थी. उन्होंने दहेज भी काफी दिया. नर्स ने यहीं बात खत्म करनी चाही मगर मैं ने सत्य उगलवा कर ही दम लिया.

मेरे पति के कथन से मुझे गहरी निराशा हुई. एक स्त्री से मुझे ऐसी उम्मीद न थी. उस ने मेरा बसाबसाया घर उजाड़ दिया. सत्य सत्य होता है. वह लाख छिपाने पर भी नहीं छिपता. मुझे मांपापा दोनों पर गुस्सा आया क्यों नहीं साफसाफ बता कर शादी की. अगर उसे मेरी जरूरत होती तो शादी करता, वरना मैं जैसे थी वैसी ही खुश थी.

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दुख तो बहुत हुआ मगर मैं ने भी सोच लिया था कि रोनेधोने से काम नहीं चलेगा. शादी कोई अंतिम रास्ता नहीं. मुझे बरगला कर मेरा यौनशोषण करने वाला चैन की जिंदगी जिए और मैं तिलतिल कर खुद को जलाऊं और अपने समय को कोसूं. नहीं, ऐसा नहीं होगा. मैं जिऊंगी और अपनी शर्तो पर.

मांपापा दोनों दुखी थे. मैं ने कहा, ‘आप मुझे या खुद को क्यों अपराधी मानते हैं? शादी का संबंध बच्चे पैदा करना होता है. तो वह मैं ने बिन ब्याहे कर दिया. अब रहा किसी के साथ का, तो मेरे समय में लिखा होगा तो कोई न कोई मिल ही जाएगा जो सबकुछ जानते हुए भी मुझे अपनाने से गुरेज नहीं करेगा. वास्तव में मुझे ऐसे ही इंसान की जरूरत है.’

चित्त शांत हुआ तो मैं ने एक कंपनी में नौकरी कर ली. एक रोज एक दंपती ने मेरे फ्लैट के दरवाजे पर दस्तक दी. मां ने दरवाजा खोला. उस वक्त मैं दूसरे कमरे में थी. वे लोग मां के जानपहचान के थे. उन्हें देख कर मां के माथे पर बल पड़ गए. मां ने उन्हें डाइंनिग रूम में बिठाया. उन के साथ एक 8 साल का लड़का भी था. लड़के को मेरे कमरे में भेज कर मां न जाने क्या उन के साथ खुसुरफुसुर करती रहीं. इस बीच वह लड़का मेरे साथ घुलमिल गया. करीब आधे घंटे के बाद मैं ने देखा कि वे दंपती जा चुके थे. मुझे आश्चर्य हुआ क्येांकि वह लडका तो यहीं रह गया. जब उस लडके को पता चला कि उस के कथित मांबाप चले गए तो वह रोने लगा. मुझे दया आई. उसे सीने से लगा कर चुप कराने लगी.

‘मम्मी, इसे क्यों नहीं ले गई?’ मैं ने अपनी मां से पूछा. मां ने इशारे से मुझे चुप करा दिया.

‘अब यह यहीं रहेगा.’ कहने को तो मां ने कह दिया मगर तत्काल उस में सुधार करते हुए बोलीं, ‘कुछ दिनेां के लिए. जैसे ही इस के मांबाप विदेश से आ जाएंगे, यह उन्हीं के पास चला जाएगा.‘

मुझे मां के कथन संदिग्ध लगे. उन्हें अन्य कमरे में ले जा कर वस्तुस्थिति की सहीसही जानकारी हासिल करने का प्रयास किया तो मां कहने लगीं, ‘तुम से क्या छिपाना. यह तुम्हारा ही बेटा है.’ यह सुनते ही मैं क्षणांश भावविभोर हो गई. मां आगे बोलीं, ‘इसी बच्चे को तुम ने जन्म दिया था. लोकलाज के भय से मैं ने इस बच्चे को जन्मते ही अपने एक रिश्तेदार को दे दिया था. वे निसंतान थीं. मगर अब उन की अपनी औलाद हो चुकी है. वे इसे रखने के लिए तैयार नहीं हैं.’

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मैं ने उस लड़के को देखा. वह अब भी रोए जा रहा था. मेरे दिल में मां की ममता उमड़ पड़ी. कितना अभागा था यह बच्चा. असल मां जिंदा थी तो भी गैर के पास पल रहा था? यह सोच कर मेरा कलेजा फट गया. उसे सीने से लगाया, मेरा मन भीग गया था. वह लड़का मेरे लिए अंधेरे में चिराग की तरह था. कुदरत को मैं ने लाखलाख धन्यवाद दिया जिस ने मुझे जीने का मकसद दे दिया. मैं ने बच्चे का नाम पूछा, तो उस ने आकाश बताया. जब वह शांत हुआ तो मां ने मुझे एकांत में बुला कर दबे स्वर में कहा, ‘अभी इस के सामने तुम्हें मां बताना मुनासिब नहीं होगा. तुम इसे इतना प्यार दो कि वह अपने पूर्व मांबाप को भूल जाए. फिर मौका देख कर बता देना कि तुम इस की असली मां हो.’

‘क्या वह मानेगा, क्या वह यह नहीं पूछेगा कि मैं इतने दिन कहां रही, मेरे पिता कहां है? तब?’

‘तब की तब देखी जाएगी. अभी मैं जैसा कह रही हूं वैसा ही करो.’ मां ने यह कहा तो मुझे उन से तर्क करना मुनासिब न लगा. मैं कमरे से बाहर ड्राइंगरूम में आई. उस के करीब आ कर प्यार से पुचकारते हुए बोली, ‘मैं तुम्हें आकाश नाम से पुकारूं, तो कैसा लगेगा?’ नाक सुघड़ते हुए वह बोला, ‘अच्छा.’

‘तो ठीक है आकाश, आज मैं तुम्हें आइसक्रीम खिलाने ले चलती हूं, कैसा रहेगा?’ मैं खुश थी. मेरे प्यार की तपिश पा कर उस के चेहरे पर मुसकान की रेखाएं खिंच गईं. जल्दीजल्दी मैं ने अपने कपड़े बदले. उस को ले कर आइसक्रीम पार्लर में पहुंची. उस दिन मैं ने आकाश पर जीभर प्यार उड़ेला. क्यों न उड़ेलती. वह मेरे शरीर का अंश था. वर्षों तक उस के रूपरंग को ले कर तरसती रहती थी कि आज मेरा बेटा जिंदा होता तो कैसा होता. मां ने कहा था कि वह मरा हुआ पैदा हुआ था. अगर जिंदा भी बतातीं तो क्या मैं उसे पालने लायक थी? मैं तो उस वक्त खुद एक बच्ची थी.

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