संतोष के आग्रह को दीपिका ठुकरा न सकी. कुछ घंटों की असहजता के बाद दोनों पहले की तरह घुलमिल गए. वही हंसीमजाक, वही मधुर स्वरलहरी भरा अभ्यास.
‘‘अपने अतीत में घटे हादसों पर शोकाकुल होने से अब क्या लाभ? जो होना था वह हो चुका. अब आगे की सुध लेने में ही समझदारी है,’’ अगले दिन अभ्यास के बाद उदास संतोष को दीपिका समझा रही थी. उसे संतोष का उदास चेहरा देख कर पीड़ा होती थी.
‘‘तुम्हें अपने सामने किसी और को देख मुझे जो पीड़ा होती है शायद तुम समझ नहीं सकतीं. तुम मेरी थीं और अब…’’ कहते हुए संतोष ने दीपिका की बांहें कस कर पकड़ लीं.
कुंआरी लाज को बचाए रखना हर लड़की को धरोहर में सिखाया जाता है.
लेकिन अब दीपिका कुंआरी नहीं थी, शादीशुदा थी. अब वह इस सीमा को लांघ चुकी थी. शादी के बाद उस ने मजबूरी में इस सीमा को लांघा, तो क्या अब अपनी खुशी के लिए नहीं लांघ सकती और फिर घर की चारदीवारी में किसी को क्या खबर लगेगी. फिर उस के पति ने स्वयं ही संतोष को उस के कमरे में धकेल दिया था. संतोष और दीपिका स्वयं को नहीं रोक सके. उन के प्यार का सागर उमड़ा और फिर बांध को तोड़ते चला गया.
इस घटना के बाद दीपिका का उन्मुक्त व्यवहार लौट आया था. उदय इस से काफी प्रसन्न था. उसे लग रहा था कि दीपिका संगीत में डूब कर इतनी खुश है.
‘‘कभी कोई स्वैटर हमारे लिए भी बना दो,’’ आसमानी रंग का स्वैटर देख उदय के मुंह में पानी आ गया, ‘‘क्या लाजवाब डिजाइन डाली है इस बार तुम ने.’’
‘‘अगली बार आप के लिए बना दूंगी, पक्का. यह तो अपने चचेरे भाई के लिए बना रही हूं. दरअसल, अगले महीने उस का जन्मदिन आ रहा है.’’
‘‘तो हो क्यों नहीं आतीं तुम अपने मायके? काफी अरसे से गई नहीं.’’
‘‘नहीं, नहीं, मुझे नहीं जाना. आप के खानेपीने का क्या होगा और फिर…’’
‘‘मैं कोईर् दुधमुंहा बच्चा हूं, जो इतनी चिंता करती हो? मायके जाने में भला कौन लड़की मना करती है? तुम तसल्ली से जाओ और सब से मिल कर आओ. मैं अपनी देखभाल खुद कर लूंगा,’’ उदय ने जोर दिया तो दीपिका मना न कर सकी.
‘‘अब क्या होगा, अब हम कैसे मिलेंगे? उस शहर में मिलना असंभव है, किसी ने देख लिया तो अनर्थ हो जाएगा,’’ आज दोपहरी में दीपिका का अभ्यास में बिलकुल मन नहीं लग रहा था.
‘‘तुम चिंता मत करो. तुम से मिले बिना मैं भी नहीं रह सकता हूं. कुछ सोचता हूं…’’ संतोष ने आखिर एक उपाय निकाल लिया, ‘‘तुम और मैं यहीं इसी शहर में किसी होटल में रह लेंगे 3-4 दिन. उदय को तुम खुद ही फोन करती रहना अपने मोबाइल से. होटल के कमरे से बाहर ही नहीं निकलेंगे तो कोई हमें देखेगा कैसे? हंस कर कहते हुए संतोष दीपिका के बदन पर अठखेलियां करने लगा.’’
टे्रन के टिकट हाथ में लिए उदय को बाय करती दीपिका ट्रेन में सवार हो गई. अगले स्टेशन पर संतोष उस की प्रतीक्षा कर रहा था. वहां से दोनों होटल चले गए. रिसैप्शन पर गलत नाम बताने की सोची, किंतु आजकल आईडैंटिटी पू्रफ, घर का पता, पैन कार्ड आदि की कौपी रखी जाती है, इसलिए असली नामपता बताते हुए दोनों की हालत खराब हो रही थी. हर जगह सीसीटीवी कैमरे लगे थे, जिन से मुंह छिपाते दीपिका को किसी कालगर्ल वाली अनुभूति हो रही थी.
‘‘मुझे पता होता कि ऐसा अनुभव रहेगा तो मैं कभी नहीं आती,’’ दीपिका को खुद पर गिलानी हो रही थी.
‘‘अब तो कमरे में आ गए हैं… छोड़ो न बातों को और आ जाओ मेरी बांहों में,’’ संतोष ऐसे लालायित था जैसे आज उस की सुहागरात हो.
‘‘ठहरो, पहले उदय को फोन कर के बता तो दूं कि मैं पहुंच गई हूं.’’
‘‘अरेअरे, यह क्या कर रही हो? अभी नहीं, तुम कल सवेरे पहुंचोगी. भूल गईं कि अभी तुम ट्रेन में सफर कर रही हो.’’
संतोष का अट्टहास दीपिका को जरा भी अच्छा नहीं लगा. एक ही कमरे में, बिना किसी लोकलाज के बावजूद दीपिका का यौवन संतोष की बांहों को टालने लगा. सिरदर्द का बहाना बना कर वह जल्दी सो गई.
अगली सुबह जब दीपिका ने चाय का और्डर दिया तो 2-3 वेटरों को उस ने अपनी ओर देख फुसफुसाते हुए पाया. ‘हो न हो ये हम दोनों के भिन्न नाम और पते के बारे में बात कर रहे होंगे… क्या सोच रहे होंगे ये मेरे बारे में… छि…’ दीपिका के मन का चोर बारबार सिर उठा रहा था.
‘‘अब तो फोन कर लूं उदय को? अब तक तो ट्रेन पहुंच गई होगी,’’ थोड़ीथोड़ी देर में यही राग अलापती दीपिका से संतोष भी परेशान हो उठा. बोला ‘‘हां, कर लो.’’
‘‘तुम्हारे चायपानी का इंतजाम तो ठीक है न? पता नहीं कैसे यह ट्रेन लेट हो गई. अकसर तो समय पर पहुंचती है,’’ उदय के सुर में चिंता घुली थी. शुक्र है दीपिका ने फोन उठाते ही यह नहीं कहा कि मैं ठीक से पहुंच गई. एक बार फिर वह बच गई. वह बहुत घबरा गई. बोली, ‘‘यदि मेरे मुंह से निकल जाता कि मैं ठीकठाक पहुंच गई तो क्या होता, संतोष?’’
‘‘कहा तो नहीं न. मत घबराओ इतना. कल वैसे ही तुम्हारे सिर में दर्द था. आज सोचसोच कर और सिरदर्द कर लोगी,’’ इस चोरीछिपे की पिकनिक से न तो दीपिका खुश थी और न ही संतोष को चैन था.
‘‘चलो, आज नीचे रेस्तरां में चल कर नाश्ता कर के आते हैं. तुम्हारा थोड़ा मन बहल जाएगा,’’ संतोष बोला.
उदय के साथ रहने से दीपिका को स्वास्थ्यवर्धक नाश्ता करने की आदत हो गईर् थी. उस ने ओट्स और आमलेट लिया. संतोष ने कालेज के दिनों की तरह आलू के परांठे और रायता मंगवाया.
‘‘दीपू, इतना हलका नाश्ता क्यों? पेट ठीक नहीं है क्या?’’ संतोष ने पूछा.
‘‘अब हम कालेज में पढ़ते लड़केलड़की नहीं रहे, संतोष. उम्र के साथ हमें अपना खानपान और मात्र भी बदलनी चाहिए. उदय कहते हैं कि…’’ पर फिर दीपिका संभल कर चुप हो गई.
यह क्या हो रहा था उसे… बारबार उदय का खयाल, उदय की बात. उदय का नाम सुन संतोष के चेहरे का रंग फीका पड़ गया. दोनों ने चुपचाप नाश्ता किया और फिर कमरे में लौट आए.
‘‘मैं बहुत बोर हो रही हूं, चलो कहीं घूम आएं,’’ दीपिका के अनुरोध पर संतोष मान गया. कमरे में पड़ेपड़े टीवी देख कर वह भी उकता रहा था. देर शाम तक दोनों ने आसपास के बाजार की खाक छानी और रात को कमरे में लौट आए. कपड़े बदल कर दीपिका बिस्तर पर लेट तो गई, किंतु जैसे वह उदय को टालती थी, वैसे आज उस का हृदय संतोष को टालने को कर रहा था. यह अजीब अपराधबोध की भावना क्यों जकड़ रही थी उसे आज?
संतोष को वह टाल नहीं पाई. मगर उस की ठंडी प्रतिक्रिया पर संतोष ने शिकायत अवश्य की, ‘‘यह क्या यंत्रचालित सी व्यवहार कर रही हो आज? क्या हुआ है?’’
दीपिका ने कोई उत्तर नहीं दिया. उस का मन स्वयं नहीं समझ पा रहा था कि जिन घडि़यों के लिए वह तरसती रही, आज जब वे सामने हैं, तो क्यों वह भाग कर उन्हें नहीं पकड़ लेना चाहती?