होता,बहुत कुछ यों ही होता है अचानक, वरना 46 साल के सीधे से बिलकुल चुपचुप रहने वाले मुकुंद प्रधान की एक प्रेम कहानी नहीं बनती और वह भी पत्नी की मृत्यु के बाद.
मुकुंद प्रधान तो ऐसे व्यक्ति हुए कि वे सरेआम किसी लड़की को चूम भी रहे हों तो लोग अपनी आंखों को गालियां देते निकल जाएंगे, लेकिन अपनी आंखों पर भरोसा कभी न करेंगे.
बच्चों के डाक्टर उम्र तो बता ही दी, कदकाठी मध्यम. देखनेभालने की बात निकल ही आती है जब प्रेम प्रसंग की बात छिड़े. तो अपने मुकुंद प्रधान यद्यपि देखने में उतने बुरे भी नहीं थे, फिर भी कमसिन स्त्रियों की नजर उन पर कम ही पड़ती. गेहुंए वर्ण का एक सामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति, मूंछें नदारद और आंखें. शायद जबान का काम करती.
बच्चों के मैडिसिन के डाक्टर थे. आए दिन गरीब बच्चों का मुफ्त इलाज करते. रविवार अपने बेटे के साथ समय बिताते. नीलिमा यद्यपि डाक्टर साहब की आगे की जिंदगी में भले ही न हों, मगर उन्हें भुलाया भी नहीं जा सकता.
नीलिमाजी डाक्टर साहब की सिर्फ अर्द्धांगिनी ही नहीं थीं, बल्कि वे डाक्टर साहब के साथसाथ पूरी कालोनी की आंखों का तारा भी थीं. गांव की सरल सी स्त्री, सीधीसादी, सूरत भोली सी. महल्ले भर में किसी को कोई तकलीफ हो नीलिमा दौड़ी जातीं. डाक्टर साहब की तो हर वक्त सेवा में मुस्तैद.
हां डाक्टर साहब और उन की पत्नी के दिल में तब चुभन सी हो जाती जब उन के इकलौते बेटे निलय की बात छिड़ जाती. 12 साल का यह बच्चा सैरेब्रल पैलेसी का शिकार था. कमर से लाचार था निलय और चलनेफिरने में उसे बहुत तकलीफ थी. नीलिमाजी इस बच्चे के उपचार के लिए आए दिन बड़ेबड़े डाक्टरों और विशेषज्ञों के चक्कर लगातीं, घर पर भी ज्यादा वक्त उसे व्यायाम करवाती रहतीं.
दूसरे शहर से खबर आई थी कि नीलिमाजी के ननदोई की तबीयत ज्यादा खराब है और उन्हें अस्पताल में भरती करवाया गया है. नादान और सारी स्थितियों को संभालने में अक्षम. नीलिमा दौड़ी गईं ननद के पास. 3 दिन बाद वहां स्थिति कुछ सही हुई और ननद के जेठजेठानी ने आने की खबर दी तो वे वहां से वापसी का मन बना पाईं. ननद के घर से बसस्टैंड 5 किलोमीटर था. ननद के बेटे को सुबह 5 बजे स्कूटर से उन्हें बसस्टैंड तक छोड़ने को कहा गया. 2 रातों से सोई नहीं थीं नीलिमा, और उन का बीपी भी हाई रहता था. स्कूटर के पीछे बैठी नीलिमा कब नींद से बोझिल हो सड़क पर लुढ़क गईं और किस तरह अचानक सबकुछ खत्म हो गया, कोई कुछ समझ ही नहीं पाया.
एकाएक जैसे दुनिया चलती सी रुक गई थी. डाक्टर साहब जैसे बीच समंदर में फेंक दिए गए थे. दिनोंदिन उदास, चुपचुप और खुद में ही वे सिकुड़ते चले गए. निलय बीचबीच में दहाड़ें मार कर रोता और डाक्टर साहब के चुप कराने पर भी चुप नहीं होता. 3 महीने हुए थे उन की जिंदगी वीरान हुए और करीब 6 महीने पहले वे आईर् थी, ठीक उन के घर के सामने इस मकान में. वह सारिका थी, सुदेश की नई सी दिखने वाली 7 साल पुरानी 27 वर्षीय पत्नी. इन का एक 5 साल का बेटा अंकित भी साथ था.
सुदेश के कई तरह के व्यवसाय थे. 6 महीने पहले ये लोग डाक्टर साहब के घर के सामने वाला मकान खरीद कर यहां आ बसे थे.
36 साल के सुदेश महोदय की यह दूसरी शादी है. उन की पहली शादी टिकी नहीं. पत्नी ज्यादा सहनशील नहीं थी. जैसाकि आमतौर पर भारतीय महिलाओं के असंख्य गुणों में से एक माना जाता है.
सुदेश को बिजनैस ट्रिप पर जा कर नशा करने और खूबसूरत लड़कियों को बिस्तर की संगिनी बनाने का बेहद शौक था. पहली पत्नी इन की कुछ तेज किस्म की थीं. उन की खोजी दृष्टि से सुदेश बच न पाए और बीवी ने भी इस तरह घुटघुट कर जीने से बेहतर अलग हो जाना ही ठीक समझ.
सारिका बड़े परिवार और सीमित आय वाले घर की है. पैसे वाले 2 बहनों पर इकलौते लड़के का रिश्ता आते ही 21 साल की सारिका किसी भी कीमत पर बख्शी न जा सकी, ‘हर मर्द ऐसा ही होता है,’ ‘पहली पत्नी ने बदनाम करने के लिए ऐसा कहा’ आदि तर्कों से सारिका की अनिच्छा को खारिज करते हुए उसे सुदेश को सौंप दिया गया. हां यह शादी सौंप कर मुक्त हो जाने जैसी ही थी.
जिंदगी से सम?ौता तो कर लिया था सारिका ने, लेकिन अंदर की घुटन बातबात पर फूट पड़ती. पहले से ही वह ज्यादा बात करने वालों में से थी, तिस पर अब जब जिंदगी के फैसलों के आगे उस की एक न चली तो छोटीछोटी बातों पर ही वह खाने को दौड़ती.
सुदेश 2-4 दिन घर आता और निकल जाता. सारिका महसूस करती कि बिजनैस के साथसाथ उस की निजी जिंदगी के गहराए रहस्य उस के पति को बाहर दौड़ाते रहते.
आज भी वह अकेले ही बड़बड़ाती, भुनभुनाती बच्चे को स्कूल के लिए तैयार कररही थी.
बच्चा लगातार रो रहा था. सारिका को लगा बाहर स्कूल वैन आ चुकी है. वह दौड़ती गेट पर आई, वैन तो आई नहीं थी, लेकिन वह वहीं खड़े चिल्ला पड़ी, ‘‘सुबह से दहाड़ें मार रहा लड़का. पता नहीं चुप क्यों नहीं होता?’’
पास ही सामने गेट पर डाक्टर साहब अपने मुकुंद प्रधान खड़े निलय के स्कूल की गाड़ी का इंतजार कर रहे थे. उधर आंगन में बैठा निलय आधे घंटे से रोता हुआ अभी भी मां की याद में सुबुक रहा था.
सारिका के इस तरह कहने पर डाक्टर साहब बड़े लज्जित हुए. सैरेब्रल पैलेसी का शिकार निलय अपनी भावनाओं को बड़ी मुश्किल से दबा पाता है. वैसे तो पढ़ने में बड़ा होशियार है, ज्यादा शांत बैठ कर ड्राइंग आदि करता रहता है, लेकिन स्कूल जाते वक्त उसे मां की याद बड़ी सता जाती है. वह रोक नहीं पाता खुद को. डाक्टर साहब भी थोड़ी देर सहला कर छोड़ देते हैं. जितना ही वे उसे चुप कराते हैं, उस का दुख बढ़ ही जाता.
मुकुंदजी ने सारिका की ओर पलट कर देखा. आंखों में उन की मूक दर्द सा था. सारिका की उन पर नजर पड़ी. अभी तक 6 महीने बीत चुके थे, पर कभी भी उन से बातचीत नहीं हुई थी उस की. नीलिमाजी से परिचय होतेहोते ही वे चल बसीं. फिर सारिका की उन लोगों में दिलचस्पी नहीं रही. बेटे के स्कूल जाने के बाद वह घर के कामकाज और सिलाईबुनाई में व्यस्त हो जाती.
सारिका को महसूस हुआ कि उस का कहना डाक्टर साहब ने अपने बेटे के लिए समझ है. अभी वह बहुत जल्दी में थी, निलय की स्कूल वैन आ गई थी, वह जा चुका था, लेकिन सारिका का अपने बेटे को स्कूल वैन में बैठाना टेढ़ी खीर लग रहा था. लड़का कुछ ज्यादा ही अड़ गया.
डाक्टर साहब अचानक आगे आए और बच्चे को गोद में ले लिया. उसे पता नहीं कैसे बहलायाफुसलाया, लड़का स्कूल वैन में आराम से बैठ गया. उस के जाने के बाद सारिका मुकुंदजी की ओर बढ़ आई. कहा, ‘‘मैं ने अपने बेटे के बारे में कहा था कि दहाड़ें मार रहा है.’’
‘‘कोई बात नहीं,’’ डाक्टर साहब कह कर अंदर जाने लगे तो सारिका को अपनी बात पर अफसोस हो रहा. वह उन के पीछेपीछे अंदर तक आ गई.
डाक्टर साहब ने अचानक पीछे मुड़ कर उसे देखा तो ठिठक गए.
‘‘मुकुंदजी आज चाय मैं आप को पिलाती हूं,’’ सारिका मनुहार सी करने लगी.
‘‘चाय मैं पी चुका हूं, अब टिफिन तैयार कर क्लीनिक के लिए निकलूंगा,’’ डाक्टर साहब पिघलने को तैयार नहीं थे.