कहानी के बाकी भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

फिर देव को सामने देख कहती, ‘‘छूओ, देखो मेरा कलेजा कैसे धकधक कर रहा है,’’ कह कर वह उस का हाथ अपने सीने पर रख देती.

उस के ऐसे आचारण से घबरा कर देव वहां से भाग खड़ा होता. कभी जब देव अपने ही खयालों में खोया होता तो अचानक पीछे से वह उस के गले में बांहें डाल कर झल जाती और वह घबरा कर उठ बैठता. कहता कि कोई देख लेगा तो क्या सोचेगा? तो रमा कहती कि वही जो सोचना चाहिए और फिर खिलखिला कर हंस पड़ती. देव उसे देख कर सोचने लगता कि कैसी पकाऊ लड़की है यह देव ने कभी उसे उस नजर से नहीं देखा, पर वह थी कि उस के पीछे ही पड़ी थी.

कभीकभी तो वह देव के कमरे में ही आ कर जम जाती और फिर देर रात तक बैठी रहती. हार कर देव को कहना पड़ता कि भई जाओ अपने कमरे में अब तो वह यह बोल कर देव से चिपक जाती कि क्या हरज है अगर आज रात वह उसी के कमरे में सो जाए तो?

‘‘और अगर कोई शरारत हो गई मुझ से तो?’’ खीजते हुए देव कहता.

‘‘तो डरता कौन है आप की शरारतों से? कर के देखो तो एक बार,’’ अपनी एक आंख दबा कर रमा कहती तो देव ही शरमा जाता.

ये भी पढ़ें- आखिर कब तक और क्यों: क्या हुआ था रिचा के साथ

समझ में आने लगा था देव को कि रमा अपनी बहन जैसी बिलकुल नहीं है और वह उस के एक इशारे पर अपना सबकुछ समर्पित कर सकती और शायद बाद में वह उस का फायदा भी उठाना चाहे, इसलिए अब वह उस से दूरी बना कर चलने लगा. औफिस से आते ही वह या तो अपने किसी दोस्त के घर जा कर बैठ जाता या फिर अपने कमरे में ही बंद हो जाता यह बोल कर कि आज वह बहुत थका हुआ है तो आराम करना चाहता है. लेकिन इतनी ढीठ थी रमा कि दरवाजा खटखटा कर उस के कमरे में घुस आती और ऊलजलूल बातें करने लगती. अब तो चिढ़ होने लगी थी देव को उस के छिछले आचरण से पर कहे तो किस से भला?

जब कभी किसी काम से देव मार्केट जाता, तो रमा भी उस के पीछे पड़ जाती. यह बोल कर वह उस की बाइक पर बैठ जाती कि उसे भी बाजार से कुछ जरूरी सामान खरीदना है. जब देव कोई बहाना बनाने लगता तो कल्याणी यह बोल कर कि ले जा इसे भी साथ उसे चुप करा देती, लेकिन उसे शर्र्म आती जब वह बाइक पर उस से चिपक कर बैठती और जब देव ब्रेक लगाता तो जानबूझ कर वह उस पर लद जाती.

एक रोज देव के दोस्त मनोज ने दोनों को एकसाथ बाइक पर बैठे देख कर बोल भी दिया, ‘‘क्या बात है बड़ी मस्ती चल रही आजकल तेरी तो? दीदी का देवर दीवाना हो गया क्या?’’

उस की बात पर जहां देव सकुचा कर रह गया वहीं रमा उस से और चिपट गई. जब भी रमा उस के साथ होती, जानबूझ कर देव अपने दोस्तों से कटता फिरता ताकि बात का बतंगड़ न बन जाए. लेकिन रमा तो मन ही मन उस की पत्नी बनने का खयाली पुलाव पका रही थी.

गोरीचिट्टी, हाथ लगाए तो मैली हो जाए, साथ ही इंजीनियर, एमबीए की डिगरी के साथ तनिका जब पूर्व की कंपनी में आई तो सब उसे देखते रह गए. औफिस का हर बंदा उस से दोस्ती करना चाहता था, पर वह थी कि बस ‘हाय’ का जवाब दे कर मुसकरा भर देती. उस का और देव का कैबिन आमनेसामने थी, जिस कारण अकसर दोनों की आंखें चार होतीं, तो अनायास ही उस की खामोश निगाहें बहुत कुछ ब्यां कर जातीं. तनिका को देख कर देव को लगता वह उस से पहले भी मिल चुका है, शायद सपनों में मन में ही बोल कर वह मुसकरा देता और जब उस की नजर तनिका से टकराती तो वह ?झोंप जाता जैसे उस के मन की बात उस ने सुन ली हो. तनिका को ले कर उस के मन में हलचल पैदा हो चुकी थी और कब तनिका भी उस की ओर आकर्षित होने लगी थी यह तो उसे भी खबर नहीं थी.

एक रोज शाम से ही काले बादल उमड़घुमड़ रहे थे. लग रहा था जोर की बारिश होगी. कुछ ही देर में मूसलाधार बारिश शुरू हो गई. देव अपनी गाड़ी से आया था. पर वह औटो का इंतजार कर रही थी.

ये भी पढ़ें- घरौंदा : क्यों दोराहे पर खड़ी थी रेखा की जिंदगी

‘‘कोई बात नहीं, आप मेरे साथ मेरी गाड़ी में चलिए मैं आप को आप के घर तक छोड़ दूंगा,’’ देव ने कहा तो तनिका थोड़ी सकुचाई, पर फिर वह गाड़ी में बैठ गई.

बातोंबातों में पता चला कि तनिका इलाहाबाद से है और वह यहां 2 कमरों का घर ले कर कुछ लड़कियों के साथ रह रही है.

‘‘अरे वाह, फिर तो आप मेरी पड़ोसिन हो गईं,’’ वह बोला. देव ने जब कहा कि उस का घर बिहार में है पर वह वहां कभीकभार ही जा पाता है तो तनिका भी बताने लगी कि बिहार उस की नानी का घर है और वह  भी कई बार वहां जा चुकी है.

‘‘बस मेरा घर आ गया. यहीं उतार दीजिए.’’

‘‘काफी दूर है आप का घर. औफिस के लिए तो घर से जल्दी निकलना पड़ता होगा आप को? वैसे हमारे घर के पास भी कई घर ऐसे हैं जहां नौकरी करने और पढ़ने वाली लड़कियां रहती हैं. अगर आप कहें तो..’’

‘‘नहींहीं,’’ बीच में ही वह बोल पड़ी, ‘‘जरूरत होगी तो बता दूंगी,’’ और फिर घर तक पहुंचाने के लिए देव को धन्यवाद दे कर वह चली गई.

कुछ समय बाद तनिका देव के घर के करीब ही रहने आ गई और फिर औफिस दोनों साथ आनेजाने लगे थे. धीरेधीरे उन की जानपहचान गहरी दोस्ती में तबदील हो गई. दोनों एकदूसरे के सान्निध्य में बहुत सहज महसूस करते और पसंद भी दोनों की बहुत मिलतीजुलती थी.

‘‘वाकई, दिल्ली बहुत ही अच्छा शहर है,’’ एक रोज यूं ही देव के साथ दिल्ली की सड़कें नापते हुए तनिका बोली.

‘‘अरे वाह, क्या बात है पर लोग तो इसे बेदिल दिल्ली कहते हैं,’’ बोल कर देव हंस पड़ा तो तनिका को भी हंसी आ गई.

ये भी पढ़ें- रिश्ता दोस्ती का: क्या सास की चालों को समझ पाई सुदीपा

अकसर देव तनिका के खयालों में खोया रहता और जब कल्याणी उस का कारण पूछती तो बहुत काम का बहाना बना कर बात को टाल जाता. सोचता कि क्यों न एक बार तनिका को कौल कर लूं? पर फिर सोचता कि क्या सोचेगी वह उस के बारे में?

जब एक दिन तनिका ने ही फोन कर के उस से कहा कि उसे नींद नहीं आ रही है. क्या वे कहीं बाहर चल सकते हैं? अब अंधे को क्या चाहिए, दो आंखें ही न? धीरेधीरे उन की निकटता बढ़ने लगी और वे एकदूसरे की जरूरत महसूस करने लगे. तनिका के मन में भी देव के लिए प्यार पनत चुका था क्योंकि एक दिन की भी जुदाई उसे बेचैन कर देती और जब तनिका कभी छुट्टियों में अपने घर जाती तो देव भी पागलों की तरह यहांवहां भटकता फिरता.

आगे पढें- मगर रमा को तो पूर्ण विश्वास था कि…

और कहानियां पढ़ने के लिए क्लिक करें...