जीहां मैं चीयर गर्ल हूं उस की जिंदगी में और यह भूमिका मैं पिछले 3 वर्षों से निभा रही हूं. आप सोच रहे होंगे यह क्या अजीब सा नाम या रिश्ता है. यह रिश्ता तो है ही नहीं बस यह एक अजीब सा एक पागलपन है जो मैं सबकुछ जानते हुए भी कर रही हूं और वह अपने को खास अनुभव करने के लिए करता है.
आज भी याद है मुझे वह दिन, शायद 15 जनवरी की बात होगी, एक फ्रैंड रिक्वैस्ट आई थी, कुछ म्यूच्युअल फ्रैंड भी थे इसलिए मैं ने स्वीकार कर ली. रिक्वैस्ट होते ही, उधर से मैसेज आरंभ हो गए, मैं ने भी जवाब देने आरंभ कर दिए.
मैसेज आया, ‘‘तुम बहुत खूबसूरत हो.’’
मैं ने लिखा, ‘‘हा… हा… हा…’’
मैसेज आया, ‘‘अरे बाबा सच बोल रहा हूं, तुम्हारा पति बहुत खुशहाल वाला है.’’
मैं ने फिर लिखा, ‘‘हा… हा… हा… पर इस हा… हा… में अंदर का दर्द, आंखों में आंसू बन कर आ गया,’’ उस ने नंबर मांगा.
मैं ने लिखा, ‘‘इतनी जल्दी? अभी तो मैं तुम को जानती भी नहीं… बस यह जानती हूं कि हम एक ही स्कूल में पढ़े थे.’’
मैसेज आया, ‘‘तभी तो मांग रहा हूं, जानने के लिए पर खूबसूरत लड़कियों के नखरे होते हैं, कोई बात नहीं रहने दो.’’
मैं ने मन में सोचा कि कोई किशोरी तो नहीं हूं और न ही यह मेरा कोई आशिक, 2 सभ्य लोग क्यों नहीं नंबर ऐक्सचेंज कर सकते हैं?
न जाने बातों में क्या कशिश थी कि मैं ने सहर्ष नंबर दे दिया. 1 मिनट में ही मेरे मोबाइल की स्क्रीन पर नंबर फ्लैश हो रहा था. कुछ सोचते हुए मैं ने फोन उठा लिया. उधर से एक बहुत बेलौस हंसी सुनाई दे रही थी एक ऐसी हंसी जिस के लिए मैं तरस रही थी.
वह बोला, ‘‘बस इसलिए फोन किया कि कोई गुंडा नहीं हूं, एक सीधासादा इंसान हूं और तुम सच में बहुत खूबसूरत हो.’’
मैं थोड़ा सा शरमा गई पर मन ही मन खुश भी हो रही थी. बस ‘‘थैंक यू’’ बोल पाई थी और फोन काट दिया. फिर कुछ देर बाद व्हाट्सऐप पर उस का मैसेज था, ‘‘थैंक्स फौर टौकिंग ऐंड ब्यूटीफुल पिक्चर औफ मम्मी ऐंड डाटी.’’
मैं एक शादीशुदा 40 वर्षीय औरत हूं जो अपनी बिखरी हुई शादी से गुजर रही हूं. मेरा पति मेरा हो कर भी मेरा नहीं है, यह बात मुझे बहुत सालों से पता है पर समाज और बच्चों की खातिर मैं इस रिश्ते को निभा रही हूं. पति मुझे समाज में अपना नाम दे रहा है और मैं उस के मकान को घर बना कर संजो रही हूं.
प्यार जैसा बहुत कुछ था हमारे रिश्ते में शादी के पहले 2 वर्षों तक, फिर जिम्मेदारियों
के बोझ तले पता नहीं क्या हो गया कि शादी रह गई और प्यार काफूर हो गया.
आज पति का देर से आना भी नहीं खल रहा था. अपने नए फेसबुक फ्रैंड का बहुत देर तक प्रोफाइल चैक करती रही.
इसी बीच मैं ने देखा उस ने मेरी लगभग सब पिक्चर्स को लाइक कर दिया है. हर पिक्चर पर बहुत प्यारे कमैंट दिए हैं. मन ही मन में 40 वर्ष की उम्र में भी 14 वर्ष की किशोरी की तरह इतरा रही थी.
फिर जब बच्चे इधरउधर ट्यूशन इत्यादि जाते हम रोज फोन पर बात करते. उस की बातों ने मेरी जिंदगी को पंख लगा दिए, खुद को खास महसूस करने लगी, फिर से एक औरत की तरह महसूस करने लगी. बहुत दिनों बाद पार्लर का मुंह देखा पर हर कार्य कराते हुए उस का चेहरा ही सामने था.
हम दोनों जब भी फोन पर बात करते वह यही बोलता कि मैं कितनी खूबसूरत हूं और इस उम्र में भी कितना मैंटेन कर रखा है. पर उस की बातों से एक अजीब सा डर भी मन में समा गया क्योंकि आईना उस की बातों की गवाही नहीं
देता था.
देखतेदेखते 2 माह बीत गए और वह बारबार मिलने के लिए दबाव बना रहा था. मैं मिलने के लिए उत्सुक थी पर फिर भी डर रही थी फिर कहीं जो आकर्षण मेरी तसवीरों ने पैदा किया है वह मिलने के बाद खत्म न हो जाए. फिर भी हम ने मार्च में मिलना निश्चित किया. उस ने कहा साड़ी उस की पसंदीदा ड्रैस है.
बच्चों के जाने के बाद बहुत देर तक अलमारी खोल कर खड़ी रही, फिर फिरोजी रंग की साड़ी निकाली और उस से मेल खाते कानों के बूंदे, बहुत देर तक तैयार होती रही. जब गहरे गुलाबी रंग की लिपस्टिक लगा रही थी तो आईने में खुद को देख कर संतुष्ट हो गई.
दिल धकधक कर रहा था पर फिर भी वहां चली गई. एक सफेद कार मेरी बाजू में आ खड़ी हो गई. अंदर वही बैठा था. अपनी तसवीर से अधिक आकर्षक. मेरे बैठते ही उस ने दोस्ती का हाथ आगे बढ़ाया. मैं ने भी हाथ मिलाया और फिर वही मदमस्त हंसी.
वह ठहाके पर ठहाके लगा रहा था. घरपरिवार की बातें इत्यादि. मैं हवा की तरह हलका महसूस कर रही थी बहुत सालों बाद. उस ने रेस्तरां के सामने कार रोकी और मुझ से बोला, ‘‘मैडम क्या और्डर करूं?’’
मैं ने बोला, ‘‘कुछ भी कर दो.’’
कुछ स्टार्टर्स आए, वह बीचबीच में कनखियों से मुझे देख रहा था. मेरा चेहरा लाल हो रहा था. मेरी स्थिति भांपते हुए वह बोला, ‘‘इतनी क्यों शरमा रही हो? मैं क्या तुम्हें पसंद करने आया हूं? हम तो ऐसे ही 2 दोस्तों की तरह मस्ती करने आये हैं.’’
मुझे अपने गंवारूपन पर शर्म आ रही थी. विवाह से पहले कुछ घर के माहौल के कारण और कुछ अपने दब्बूपन के कारण कभी कोई पुरुष मित्र नहीं बनाया. विवाह मांबाप की मरजी से हुआ और फिर जिंदगीरूपी चक्की में पिस गई.
खाने के पश्चात कार में बैठ कर हम यों ही सड़कें नापने लगे. फिर यह क्या एक अनजनी सुनसान सड़क पर जाते ही वह मेरे शरीर से खेलने लगा. मैं थोड़ा सा विरोध करने लगी तो वो धीमे से बोला, ‘‘यह क्या बच्चों की तरह व्यवहार कर रही हो… मुझे ये नखरे नहीं चाहिए.’’
मैं थोड़ा सा कन्फ्यूज हो गई और उस के साथ एक असुरक्षा की भावना भी कि कहीं यह मुझे छोड़ कर न चला जाये.
मैं कुछ झिझकते हुए बोली, ‘‘मैं इस के लिए तैयार नहीं थी.’’
वह बिना कुछ कहे अपने हिसाब से मेरे शरीर पर हाथ फेरता रहा और वही वाक्य दोहराता रहा जो अकसर पुरुष इस स्थिति में दोहराते हैं.