‘‘शादी…यानी बरबादी…’’ जब उस की मां ने उस के सामने उस की शादी की चर्चा छेड़ी तो सुलेखा ने मुंह बिचकाते हुए कहा था, ‘‘मां मुझेशादी नहीं करनी है, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रह कर तुम्हारा देखभाल करना चाहती हूं.’’

‘‘नहीं बेटा ऐसा नहीं कहते,’’ मां ने स्नेहभरी नजरों से अपनी बेटी की ओर देखा.

‘‘मां मुझेशादी जैसी रस्मों पर बिलकुल भरोसा नहीं… विवाह संस्था एकदम खोखली हो चुकी है… आप जरा अपनी जिंदगी देखो, शादी के बाद पापा से तुम्हें कौन सा सुख मिला है? पापा ने तो तुम्हें किसी और के लिए तलाक…’’ कहती हुई वह अचानक रुक गई और फिर आंसू भरे नेत्रों से मां की ओर देखने लगी.

मां ने दूसरी तरफ मुंह घुमा अपने आंसुओं को छिपाने की कोशिश करते हुए बोलीं, ‘‘अरे छोड़ो इन बातों को… इस वक्त ऐसी बातें नहीं करते और फिर लड़कियां तो होती ही हैं पराया धन. देखना ससुराल जा कर तुम इतनी खो जाओगी कि अपनी मां की तुम्हें कभी याद भी नहीं आएगी,’’ और फिर बेटी को गले लगा कर उस के माथे को चूम लिया.

मालती अपनी बेटी को बेहद प्यार करती हैं. आज 20 वर्ष हो गए उन्हें अपने पति से अलग हुए, जब मालती का अपने पति से तलाक हुआ था तब सुलेखा सिर्फ 5 वर्ष की थी. तब से ले कर आज तक उन्होंने सुलेखा को पिता और मां दोनों का प्यार दिया. सुलेखा उन की बेटी ही नहीं उन की सुखदुख की साथी भी थी. अपने टीचर की नौकरी से जितना कुछ कमाया वह अपनी बेटी पर ही खर्च किया. अच्छी से अच्छी शिक्षादीक्षा के साथसाथ उस की हर जरूरत का खयाल रखा. मालती ने अपनी बेटी को कभी किसी चीज की कमी नहीं होने दी भले खुद कितना भी कष्ट झेलना पड़ा हो.

आज जब मालती अपनी बेटी से उस की शादी कर ससुराल विदा करने की बात कर रही थीं तो भी उन्होंने अपने दर्द को अपनी बेटी के आगे जाहिर नहीं होने दिया ताकि उसे कोई कष्ट न हो.

सुलेखा आजाद खयालोंकी लड़की है और उस की परवरिश भी बेहद आधुनिक परिवेश में हुई है. उस की मां ने कभी किसी बात के लिए उस पर बंदिशें नहीं लगाईं.

सुलेखा ने अपनी मां को हमेशा स्वतंत्र और संघर्षपूर्ण जीवन बिताते देखा है. ऐसा नहीं कि उसे अपनी मां की तकलीफों का अंदाजा नहीं है. वह बहुत अच्छी तरह जानती है कि चाहे कुछ भी हो, कितना भी कष्ट उन्हें ?ोलना पड़े, ?ोल लेंगी परंतु अपनी तकलीफ कभी उस के समक्ष व्यक्त नहीं करेंगी.

सुलेखा की शादी से इस तरह बारबार इनकार करने पर मालती भावुक हो कर कहतीं, ‘‘बेटा तू क्यों नहीं समझती… तुझेले कर कितने सपने संजो रखे हैं मैं ने और तुम कब तक मेरे साथ रहोगी… एक न एक दिन तुम्हें इस घर से विदा तो होना ही है,’’ और फिर हंसते हुए आगे बोलती हैं, ‘‘और तुम्हें एक अच्छा जीवन साथी मिले इस में मेरा भी तो स्वार्थ छिपा हुआ है… कब तक मैं तुम्हारे साथ रहूंगी. एक न एक दिन मैं इस दुनिया को अलविदा तो कहूंगी ही… फिर तुम अकेली अपनी जिंदगी कैसे काटोगी?’’ कहते हुए उन का गला भर्रा गया.

योगेंद्र एक पढ़ालिखा लड़का है और एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर है. उस के परिवार में उस के मांबाप, भैयाभाभी के अलावा उस की दादी है जो 80 या 85 साल की है. मालती को अपनी बेटी के लिए यह रिश्ता बहुत पसंद आया है. उन्हें लगा कि उन की बेटी इस भरेपूरे परिवार में खुशहाल जिंदगी जीएगी… यहां पर तो सिर्फ उन के सिवा उस के साथ सुखदुख को बांटने वाला कोई और नहीं… वहां इतने बड़े परिवार में उन की बेटी को किसी बात की कमी नहीं और फिर उन्होंने अपनी बेटी का रिश्ता तय कर दिया.

मालती अपनी जिंदगीभर की सारी जमापूंजी यहां तक की अपने सारे जेवर भी शादी का खर्चा जुटाने हेतु बेच दिए ताकि बड़ी धूमधाम से अपनी बेटी को ससुराल विदा कर सकें. बेटी के ससुराल वालों को किसी भी बात की कोई परेशानी न हो. इस बात का पूरापूरा खयाल रखा गया. आखिर एक ही तो बेटी थी उन की और उसी की खातिर तो उन्होंने वर्षों से पाईपाई जमा कर रखी थी.

विदाई के वक्त सुरेखा की आंखों से तो आंसू थम ही नहीं रहे थे. उस ने धुंधली आंखों से मां और उस घर की ओर देखा जिस में उस का बचपन बीता था.

‘‘अरे, पूरा पल्लू माथे पर रखो,’’ ससुराल में गृहप्रवेश के वक्त किसी ने जोर से ?िड़कते हुए कहा और फिर उस के माथे का पल्लू उस की नाक तक खींच दिया.’’

‘‘आंखें पल्लू में ढक गईं… मैं देख कैसे पाऊंगी…’’ उस ने हलके स्वर में कहा.

तभी अचानक अपने सामने उस ने नीली साड़ी में नाक तक घूंघट किए अपनी जेठानी को देखा जिस ने बड़ों के सामने शिष्टाचार की परंपरा की रक्षा करने हेतु घूंघट अपनी नाक तक खींच रखा था.

‘‘तुम्हें तुम्हारी मां ने कुछ सिखाया नहीं कि बड़ों के सामने घूंघट किया जाता है?’’ यह उस की सास की आवाज थी.

‘‘आप मेरी मां की परवरिश पर सवाल न उठाएं,’’ सुलेखा की आवाज में थोड़ी कठोरता आ गई.

‘‘तुम मेरी मां से तमीज से बात करो,’’ योगेंद्र गुस्से से सुलेखा की ओर देखते हुए चिल्लाया.

सुलेखा ने तिलमिला कर गुस्से से योगेंद्र की ओर देखा.

‘‘अरे, नई बहू दरवाजे पर कब तक खड़ी रहेगी… इसे कोई अंदर क्यों नहीं ले आता,’’ दादी सास ने सामने के कमरे पर लगे बिस्तर पर से बैठेबैठे ही आवाज लगाई. दरवाजे पर जो कुछ हो रहा था उसे सुन पाने में वे असमर्थ थीं वैसे भी उन के कानों ने भी उन के शरीर के बाकी अंगों के समान ही अब साथ देना छोड़ दिया था. मौत तो कई बार आ कर दरवाजे से लौट गई थी क्योंकि उन्हें अपने छोटे पोते की शादी जो देखती थी. अपनी लंबी उम्र तथा घर की उन्नति के लिए कई बार बड़ेबड़े पंडितों को बुला कर बड़े से बड़े कर्मकांड करवा चुकी हैं ताकि मौत को टाला जा सके.

उन्हीं पंडितों में से किसी ने कभी यह भविष्यवाणी की कि उन के छोटे पोते  की शादी के बाद उन की मृत्यु का होना लगभग तय है और उसे टालने का एकमात्र उपाय यह है कि जिस लड़की की नाक पर तिल हो उसी लड़की से इन के छोटे पोते की शादी कराई जाए. अत: सुलेखा की नाक पर तिल का होना ही उसे उस घर की पुत्रवधू बनने का सर्टिफिकेट दादीजी द्वारा प्रदान कर दिया गया था. अब उन्हें बेचैनी इस बात की हो रही थी कि पंडितजी द्वारा बताए गए मुहूर्त के भीतर ही नई बहू का गृहप्रवेश हो जाना चाहिए वरना कहीं कुछ अनिष्ट न हो जाए.

मगर घूंघट पर छिड़े उस विवाद ने अब तूल पकड़ना शुरू कर दिया था.

‘‘आप मुझ से ऐसे बात कैसे कर सकते हैं?’’ सुलेखा गुस्से से चिल्लाते हुए बोली.

‘‘तुम्हें अपने पति से कैसे बात करनी चाहिए क्या तुम्हारी मां ने तुम्हें यह भी नहीं सिखाया?’’ घूंघट के अंदर से ही सुलेखा की जेठानी ने आग में घी डालते हुए कहा.

‘‘अरे इसे तो अपने पति से भी बात करने की तमीज नहीं है,’’ सुलेखा की सास ने गुस्से में कहा.

‘‘आप मुझेतमीज मत सिखाइए,’’ सुलेख का स्वर भी ऊंचा हो गया.

‘‘पहले आप अपने बेटे को एक औरत से बात करने का सलीका सिखाइए…’’

‘‘सुलेखा…’’ योगेंद्र गुस्से में चीख पड़ा.

‘‘चिल्लाइए मत… चिल्लाना मुझेभी आता है,’’ सुलेखा ने भी उसी अंदाज में चिल्लाते हुए कहा.

‘‘इस में तो संस्कार नाम की कोई चीज ही नहीं है… पति से जबान लड़ाती है,’’ सास ने फटकार लगाते हुए कहा.

‘‘आप लोगों के संस्कार क्या हैं… नई बहू से कोई इस तरह से बात करता है?’’ सुलेखा ने भी चिल्लाते हुए कहा.

‘‘तुम सीमा लांघ रही हो…’’ योगेंद्र चिल्लाया.

‘‘और आप लोग भी मुझेमेरी हद न सिखाएं…

‘‘सुलेखा…’’ और योगेंद्र का सुलेखा पर हाथ उठ गया.

सुलेखा गुस्से से तिलमिला उठी. साथ में उस की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी और फिर आंसुओं के साथसाथ विद्रोह भी उठ खड़ा हुआ.

अचानक उस के पैर डोल गए और फिर नीचे रखे तांबे के कलश से  उस के पैर जा उछल कर और वह कलश उछल कर सीधा दादी सास के सिर से जा टकराया और दादी सास इस अप्रत्याशित चोट से चेतनाशून्य हो कर बिस्तर पर लुढ़क गईं. चारी तरफ कुहराम मच गया.

‘‘देखो तो जरा नई बहू के लक्षण… कैसे तेवर हैं इस के. गुस्से में दादी सास को ही कलश दे मारा,’’ लोग कानाफूसी करने लगे.

सुलेखा ने नजर उठा कर देखा तो सामने के कमरे में बिस्तर पर दादी सास लुढ़की हुई थीं. उन का सिर एक तरफ को झका हुआ था. यह दृश्य देख कर सुलेखा की सांसें जैसे क्षणभर के लिए रुक गईं.

‘‘अरे हाय यह क्या कर दिया तुम ने,’’ सुलेखा की जेठानी अपने सिर के पल्लू को पीछे की ओर फेंकती हुई दादी सास की ओर दौड़ पड़ीं.

सुलेखा को तभी अपनी जेठानी का चेहरा दिखा. उस के होंठों पर लाल गहरे रंग की लिपस्टिक लगी हुई थी तथा साड़ी की मैचिंग की ही उस ने बिंदी अपने बड़े से माथे पर लगा रखी थी. आंखों पर नीले रंग का आईशैडो भी लगा रखा था तथा गले में भारी सा लटकता हुआ हार पहना था. उन का यह बनावशृंगार उन के अति शृंगार प्रिय होने का प्रमाण पेश कर रहा था.

सुलेखा भी दादी सास की स्थिति देख कर घबरा गई और आगे बढ़ कर उन्हें संभालने की कोशिश में अपने पैर आगे बढ़ा पाती उस से पहले ही योगेंद्र उस का हाथ जोर से पकड़ कर खींचते हुए उसे पीछे की ओर धकेल देता है. वह पीछे की दीवार पर अपने हाथ से टेक बनाते हुए खुद को गिरने से बचा लेती है.

‘‘कोई जरूरत नहीं है तुम्हें उन के पास जाने की. जहां हो वहीं खड़ी रहो,’’ योगेंद्र ने यह बात बड़ी ही बेरुखी से कही.

अपने पति के इस व्यवहार से उस का मन दुखी हो गया. वह उसी तरह दीवार के सहारे खुद को टिकाए खड़ी रह गई. उस की आंखों से आंसू बहने लगे. वह मन ही मन सोचने लगी कि जिस रिश्ते की शुरुआत इतने अपमान और दुख के साथ हो रही है उस रिश्ते में अब आखिर बचा ही क्या है. जो आज नए जीवन की शुरुआत से पहले ही उस का इस कदर अपमान कर रहा है, जिस मानसिकता का प्रदर्शन उस के पति और उन के घर वालों ने किया जितना कुंठित विचारधारा इन सबों की है वैसी मानसिकता के साथ वह अपनी जिंदगी नहीं गुजार पाएगी.

उस के लिए वहां रुक पाना अब मुश्किल हुआ जा रहा था और इस सब से ज्यादा अगर कोई चीज उसे ज्यादा तकलीफ पहुंचा रही थी तो वह था योगेंद्र का उस के प्रति व्यवहार. कहां तो वह मन में सुंदर सपने संजोए अपनी मां के घर से विदा हुई थी. अपने जीवनसाथी के लिए जिस सुंदर छवि को उस ने संजोया था वह अब एक झटके में ही टूटतीबिखरती नजर आ रही थी.

सभी तरफ कुहराम मचा हुआ था. तभी कोई डाक्टर को बुला लाता है. आधे घंटे के  निरीक्षण के बाद डाक्टर बताते हैं, ‘‘चिंता की कोईर् बात नहीं सभी कुछ ठीकठाक है. मैं ने दवा दे दी है जल्द ही इन्हें होश आ जाएगा.’’

दादी सास मौत के मुंह से बच निकलती हैं.

‘‘अरे अब क्या वहीं खड़ी रहेगी महारानी… कोई उसे अंदर ले कर आओ,’’ सास ने बड़े ही क्रोध में आवाज लगाई.

‘‘नहीं, मैं अब इस घर में पैर नहीं रखूंगी,’’ सुलेखा ने दृढ़ता से कहा.

‘‘क्या कहा… कैसी कुलक्षणी है यह… अब और कोईर् कसर रह गईर् है क्या…’’ सास ने क्रोध से गरजते हुए कहा.

‘‘अब ज्यादा नाटक मत करो… चलो अंदर चलो…’’ योगेंद्र ने उस का हाथ जोर से खींच कर कहा.

‘‘नहीं मैं अब आप के घर में एक पल के लिए भी नहीं रूकूंगी,’’ कह सुलेखा ने एक झटके में योगेंद्र के हाथ से अपना हाथ छुड़ा लिया, ‘‘जिस व्यक्ति ने मेरे ऊपर हाथ उठाया, जिस के घर में मेरी इतनी बेइज्जती हुई अब मैं वहां एक पल भी नहीं रुक सकती,’’ कहते हुए सुलेखा दरवाजे से बाहर निकल अपनी मां के घर चल दी.

सुलेखा मन ही मन सोचती जा रही थी कि जिस रिश्ते में सम्मान नहीं उसे पूरी उम्र कैसे निभा पाऊंगी… जो परंपरा एक औरत के खुल कर जीने पर भी पाबंदी लगा दे, जिस रिश्ते में पति जैसा चाहे वैसा सुलूक करे और पत्नी के मुंह खोलने पर भी पाबंदी हो वैसे रिश्ते से तो अकेले ही जिंदगी जीना बेहतर है. मां ने तो सारी जिंदगी अकेले ही काटी है बिना पापा के सहारे के… उन्होंने तो मेरे लिए अपनी सारी खुशियों का बलिदान किया है सारी उम्र उन्होंने मुझे सहारा दिया है अब मैं उन का सहारा बनूंगी.’’

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