पूर्व कथा
परले दरजे के कंजूस शिवनाथजी अपने बड़े से बंगले में नौकर मदन के साथ रहते थे. घरगृहस्थी के जंजाल में व्यर्थ पैसा खर्च होगा, यह सोच कर उन्होंने शादी तक नहीं की. हालांकि उन के पास बापदादा की छोड़ी हुई जायदाद और मां के लाखों के आभूषण थे, पर उन का मानना था कि पैसा बचा कर रखना बेहद जरूरी है. यह बुढ़ापे का सहारा है. नौकर मदन को भी वे मात्र 100 रुपए महीना तनख्वाह देते थे और साल में 2 जोड़ी कपड़े. बदले में वह सारे घर का काम करता था और बगीचे में अपने पैसों से ला कर खाद और बीज डालता था. एक दिन एक नवयुगल उन के घर आया और ऊपर का हिस्सा किराए पर रहने के लिए मांगा. पैसों के लालच में शिवनाथजी ने उन्हें किराएदार रख लिया. पति का नाम अमित व पत्नी का नाम आरती था. मदन ने उन के साथ जा कर ऊपर के हिस्से की साफसफाई करा दी.
अब आगे…
‘‘बाबूजी, आप का एडवांस.’’
शिवनाथजी ने रुपए गिने, पूरे 3 हजार, खुश हुए. फिर बोले, ‘‘देखो, किराया समय पर देते रहे तो कोई बात नहीं, मैं तुम को हटाऊंगा नहीं पर मेरी कुछ शर्तें हैं. एक तो बिजली का बिल तय समय पर दोगे. ज्यादा लोगों का आनाजाना मुझे पसंद नहीं. ऊपर जाने के लिए तुम बाहर वाली सीढ़ी ही इस्तेमाल करोगे और रात ठीक 10 बजे गेट पर ताला लग जाएगा, उस से पहले ही तुम को घर आना होगा. किसी उत्सव, पार्टी में जाना हो तो मदन से दूसरी चाबी मांग लेना. तुम नौकरी कहां करते हो?’’
‘‘मेरे दोस्त की एक फर्म है. कल से काम पर जाऊंगा. फर्म का नाम याद नहीं है.’’
‘‘तुम साथ में कोई सामान क्यों नहीं लाए?’’
‘‘घर मिलेगा या नहीं, यह पता नहीं था.’’
‘‘अब क्या करोगे?’’
‘‘रसोई का सामान खरीदने जा रहे हैं.’’
‘‘ठीक है.’’
अमित व आरती चले गए और 2 घंटे के बाद लौटे तो उन के हाथों में गृहस्थी का सामान था. रात को आरती नीचे आई तो तौलिए से ढका थाल ले कर आई और बोली, ‘‘बाबूजी, खाना…’’
शिवनाथजी उस समय समाचार देख रहे थे. मदन रात के खाने के लिए आलू काटने बैठा था. वे अवाक् रह गए.
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‘‘आज मेरी गृहस्थी में पहली बार खाना बना है. हमारे यहां बड़ों को भोग लगाने का नियम है.’’
‘वाह, लड़की तो संस्कारी लगती है,’ शिवनाथजी ने मन ही मन सोचा, ‘अवश्य अच्छे घर की होगी.’
मदन ने उठ कर थाल लिया. आलू- टमाटर की डोंगा भर कर सब्जी थी. साथ में हलवा और पूरी. पूरे कमरे में खाने की सुगंध छा गई. आरती चली गई. आज बहुत दिन बाद शिवनाथजी को जल्दी भूख लगी.
‘‘मदन, खाना लगा दे.’’
घर का काम जैसेतैसे निबटा कर मदन बाग में आ जाता और काम करने लगता. आरती भी घर का पूरा काम कर के बाग में मदन का हाथ बंटाती. पौधों में पानी डालती, छंटाई कर देती, बेलों को लपेट कर सहारा देती, झुकी डाल में डंडी लगा कर उन्हें खड़ा कर देती. मदन खुश होता. फिर अपने बचपन की बात, बड़े मालिक और मालकिन की बात, आरती को बताता.
‘‘बहूरानी, ऐसा इंसान तुम ने कहीं देखा है जो पत्नी को खिलाने के डर से शादी ही न करे.’’
आरती हंसतेहंसते लोटपोट हो जाती. ‘‘दादाजी, शादी तो आप ने भी नहीं की.’’
‘‘मेरी बात और है बिटिया,’’ मदन दुखी हो सिर हिलाता, ‘‘होश संभालते ही अपने को नौकर पाया. बड़े मालिक सड़क से उठा कर लाए थे. मैं जानता भी नहीं कि मेरे मांबाप कौन थे. बस, मां की हलकी सी याद है. दूसरे के अन्न पर, पराए घर में जो जीवन काटे उसे कौन अपनी बेटी देगा?’’
आरती ने बात पलटी. ‘‘इतना बड़ा और इतनी सुगंध से भरा फूलों वाला घर पहले कभी नहीं देखा. क्या इन पौधों को कोलकाता से लाए हो?’’
‘‘न बहूरानी. 2 कोठी छोड़ कर तीसरी कोठी रायबाबू की है. उन को बढि़याबढि़या फूल बहुत पसंद हैं. पैसा भी खूब खर्च करते हैं. उन के बगीचे में गंधराज का यह फूल बहुत बड़ा हो गया था तो माली ने छंटाई कर के डाल बाहर फेंक दी. मैं उठा लाया. 2 लगा दिए और दोनों ही लग गए. दूसरा बाहर दरवाजे के पास है.’’
‘‘दादा, मैं 1-2 फूल ले सकती हूं?’’
‘‘अरे, क्यों नहीं बिटिया. तुम जितने चाहो ले लो, बहुत हैं.’’
किराएदार क्या आए, 2 बूढ़ों को ले कर उदास खड़ा घर कैसा खिल उठा. उस दिन आरती मटरपनीर और पालक के पकौड़े दे गई. गरम रोटी बना कर मदन ने खाना परोसा तो शिवनाथजी ज्वालामुखी की तरह फट पड़े.
‘‘क्या है यह सब? मेरा श्राद्ध है क्या आज?’’
अब मदन के धीरज का बांध टूटने लगा, पर बहुत शांत स्वर में बोला, ‘‘नहीं.’’
‘‘तो यह शाही खाना बनाने का मतलब? क्या कटोरा ले कर मुझ से भीख मंगवाने का इरादा है?’’
‘‘मालिक, कटोरा ले कर आप नहीं मैं भीख मांगूंगा.’’
‘‘मतलब?’’
‘‘आप गिन कर सागसब्जी के पैसे देते हैं, उन में ये महंगे मटर और पनीर आ सकते हैं क्या? आप आराम से खाइए. ये सब बिना पैसों के किराएदार के घर से आया है. बस, रोटी घर के आटे की है.’’
चैन की सांस ले शिवनाथजी ने थाली खींच ली. सब्जी की सुगंध के साथ गरम रोटी ने भूख तेज कर दी थी. खापी कर बिस्तर पर लेट कर मन ही मन वे बोले, ‘यह मदन भी गधा है एकदम. वह क्या जाने पैसे में कितना दम है. अरे, पैसा भरोसा है, आदमी की ताकत है.’
किराएदार नवविवाहित जोड़ा है. ऐसे जोड़े घर में रहें तो उस घर के माहौल में अपनेआप एक मधुर रस घुल जाता है. 2 बूढ़ों के इस घर में भी वही हुआ. शांत पड़े घर में अचानक से खिलखिलाती हंसी की मधुर गूंज, कभी छेड़छाड़ का आभास, कभी सैंट, पाउडर और सुगंधित साबुन की सुगंध नीचे तक तैर आती. शिवनाथजी की अनुभूति तो पैसे के हिसाबकिताब में उलझ कर जाने कब की दम तोड़ चुकी थी. पर मदन पुलकित होता और मन ही मन दोनों की सलामती की कामना करता.
लड़की के संस्कार अच्छे हैं. आजकल की लड़कियों जैसे शरीर उघाड़ू कपड़े नहीं पहनती. खाना भी बहुत अच्छा बनाती है. अकसर कुछ न कुछ बना कर दे जाती है. शायद यही वजह है कि मदन को आरती से बड़ा स्नेह हो गया था. दोनों को देख कर मदन को लगता मानो उस के ही बच्चे हैं. मदन इसलिए भी खुश था कि उस घर का सन्नाटा तो टूटा और शिवनाथजी प्रसन्न थे कि 3 हजार रुपए की ऊपर की आमदनी घरबैठे बिना मांगे ठीक समय पर मिल जाती है. लड़का सज्जन है, लड़की भी भले घर की है.
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बरसात समाप्त हो कर हल्की ठंड पड़ने लगी. सुबहशाम कोहरा भी पड़ने लगा. उन्हें यहां आए 3 महीने हो गए थे. अचानक एक दिन मदन को लगा कि घर में जो मधुर रस गूंज रहा था उस की ताल कहीं से टूटी है. गुनगुनाहट थम सी गई है. अब खिलखिलाहट भी नहीं गूंजती. आरती का मुख कमल सा खिला रहता था लेकिन अब उस पर एक मलिन छाया है. कहीं न कहीं इन दोनों के बीच कोई बात जरूर है पर इस तरह की बात एकदम से पूछी नहीं जा सकती. वह भी उन के बीच कुल 3 महीने का परिचय है. प्यार जो है वह तो है ही पर कृतज्ञता बहुत ज्यादा है.
उस दिन आरती नीचे आई ही नहीं. ऐसा कभी हुआ नहीं. क्या तबीयत ठीक नहीं? मदन ने कई प्रकार के फूलों का बड़ा सा गुलदस्ता बनाया और ऊपर गया. जीना बालकनी में खुलता है. वहां पहुंच कर देखा, आरती ध्यानमग्न सी बैठी कुछ सोच रही है. मुख पर चिंता की काली छाया. बात कुछ गंभीर ही है.
‘‘बहूरानी…’’
चौंक कर आरती ने मुड़ कर देखा. थोड़ा हंसी. ‘‘आओ, दादाजी.’’
‘‘ये फूल मैं अपनी बिटिया के लिए लाया हूं. आज क्या तबीयत ठीक नहीं है?’’
‘‘जी…दादाजी, यों ही थोड़ा सिर भारी सा है…कितने सुंदर फूल हैं…’’
फूलों को सजा कर आरती लौटी और बोली, ‘‘दादाजी, कई दिन से मैं आप से एक बात कहने की सोच रही थी.
‘‘दादाजी, मैं दिन भर घर में बैठेबैठे ऊब जाती हूं. मुझे दोचार ट्यूशन दिला दोगे? यहां मुझे कोई जानता नहीं है…आप कहोगे तो मेरा काम जल्दी हो जाएगा.’’
‘‘तुम ट्यूशन करोगी, बहूरानी?’’ मदन ने आश्चर्य से पूछा.
‘‘मैं ने एम.एससी. किया है. शादी से पहले भी मैं पढ़ाया करती थी. दादाजी, अब आप से क्या छिपाना. हम दोनों ही मामूली परिवार से हैं और हमारी जाति भी अलगअलग है. घर वालों ने शादी की अनुमति नहीं दी तो हम ने प्रतीक्षा की. जब अमित के एक दोस्त ने यहां उन की नौकरी लगवा दी तब हम ने मंदिर में जा कर शादी कर ली. हमारे कुछ जोड़े हुए पैसे थे, कुछ आभूषण जिन्हें बेच कर किराया दिया और गृहस्थी का सामान ले लिया. अमित को कुल 4 हजार रुपए मिलते हैं. 3 हजार किराया दे कर हाथ में जो बचता है उस से पूरा महीना खाएं क्या? उस पर हाथ का जो पैसा था, सब समाप्त हो गया. दोचार ट्यूशन दिला दो तो हम भूखे रहने से बच जाएं.’’
मदन का दिल भर आया. उन्होंने पूरे 4 हजार की ट्यूशन दिला दी. विज्ञान के अध्यापक कम ही मिलते हैं. ट्यूशन के बजाय एक स्कूल में अध्यापिका की नौकरी मिल गई. 12 से 4 बजे तक क्लास लेनी थी. समस्या का समाधान होते ही आरती फिर पहले की तरह खिल उठी.
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