मां के कहे को अनसुना करते हुए कल्पना बीच में बोली, ‘‘सारे दिन हाथ में डंडा घुमाओ या फिर सलाम ठोंको. इस के अलावा सिपाही का कोई काम नहीं. किसी ताकतवर अपराधी को पकड़ लो तो उलटे आफत. किसी की शिकायत अधिकारी से करने जाओ तो वह ऐसे देखता है मानो वह बहुत बड़ा एहसान कर रहा हो और फिर इस की भी कीमत मांगता है. तुम से क्या बताऊं, मां, इन अधिकारियों के कारण ही तो मैं…’’
आवेश में कहतेकहते कल्पना की जबान एकदम से रुक गई फिर चिंतित स्वर में बोली, ‘‘जीनेखाने की कीमत चुकानी पड़ती है. तुम जाओ मां, मैं आज कुछ भी नहीं खाऊंगी. मुझे भूख नहीं है.’’
कहते हैं न कि चोर जब तक पकड़ा नहीं जाता चोर नहीं कहलाता. लोग गलत काम करने से उतना नहीं डरते जितना समाज में होने वाली बदनामी से डरते हैं. समाज के सामने यदि सबकुछ ढकाछिपा है तो सब ठीक. अपनी नजर में अपनी इज्जत की कोई परवा नहीं करता. सुमित्रा अपनी बेटी के दफ्तर व वहां के काम के ढंग से वाकिफ थीं इसलिए उन्होंने निष्कर्ष यही निकाला कि बेटी सयानी है, उस की जितनी जल्दी हो सके शादी कर देनी चाहिए.
सुमित्रा को अब किसी सहारे की जरूरत नहीं थी क्योंकि उन की अपनी दुकान अच्छी चलने लगी थी. बेटी अपने घर चली जाए तो वह एक जिम्मेदारी से छुटकारा पा सकें, यही सोच कर उन्होंने कुछ लोगों से कल्पना के विवाह की चर्चा की. चूंकि घर की आर्थिक स्थिति ठीक होने के बाद वे भी अब सुखदुख के साथी बने खडे़ थे जो तंगी के समय उस के घर की ओर देखते भी नहीं थे. अब खतरा नहीं था कि सुमित्रा अपना दुखड़ा सुना कर उन से अपने लिए कुछ उम्मीद कर सकती हैं. अब कुछ देने की स्थिति में भी वह थीं.
सुमित्रा के बडे़ भाई एक रिश्ता ले कर आए थे. अच्छे खातापीता परिवार था. जमीनजायदाद काफी थी. लड़के के पिता कसबे के प्रतिष्ठित व्यक्तियों में थे और उन की राजनीतिक पहुंच थी. कल्पना की सुंदरता से प्रभावित हो कर वह यह शादी 1 रुपए में करना चाहते थे. दहेज न ले कर वह चाहते थे लाखों लोगों की वाहवाही व प्रचार, क्योंकि उन की नजर अगले विधानसभा चुनाव पर टिकी थी और सुमित्रा जैसी विधवा दर्जी की सिपाही बेटी के साथ अपने बेरोजगार बेटे का विवाह कर वह न केवल एक विधवा बेसहारा को धन्य कर देना चाहते थे बल्कि उस पूरे इलाके में वाहवाही पाना चाहते थे.
कल्पना का विवाह हो गया. सुमित्रा ने राहत की सांस ली. बेटी के पांव पूज वह अपने को धन्य मान रही थीं. बेटी को विदा करते समय सभी बड़ीबूढ़ी व खुद सुमित्रा उसे समझा रही थीं कि अब वही तुम्हारा घर है. सुख मिले या दुख सब चुपचाप सहना. मां के घर से बेटी की डोली उठती है और पति के घर से अर्थी.
कल्पना की सुहागरात थी. फूलों से महकते कमरे में एक विशेष मादकता बिखरी थी. वह डरीसहमी सेज पर बैठी थी. तमाम कुशंकाओं से उस का जी घबरा रहा था. एक तरफ खुशी तो दूसरी तरफ भय से शरीर में विचित्र संवेदना हो रही थी. नईनवेली दुलहन जैसी उत्तेजना के स्थान पर आशंकित उस का मन उस सेज से उठ कर भाग जाने को कर रहा था. वह अजीब पसोपेश में पड़ी थी कि उस के पति प्रमेश ने कमरे में प्रवेश किया. वह बिस्तर पर सिकुड़ कर बैठ गई और उस का दिल जोर से धड़कने लगा. चेहरे पर रक्तप्रवाह बढ़ जाने से वह रक्तिम हो उठा था. इतने खूबसूरत तराशे चेहरे पर पसीने की बूंदें फफोलों की तरह जान पड़ रही थीं.
प्रमेश ने जैसे ही घूंघट उठाया और दोनों की नजरें मिलीं वह सकते में आ गया. उस का हाथ पीछे हट गया. उस ने कल्पना को परे ढकेलते हुए कहा, ‘‘ऐसा लगता है हम पहले भी कहीं मिल चुके हैं.’’
‘‘मुझे याद नहीं,’’ कल्पना ने धीमे स्वर में कहा.
क्रोध के मारे प्रमेश की मांसपेशियां तन गईं. उस के माथे पर बल पड़ गए और होंठ व नथुने फड़कने लगे. शरीर कांपने से वह उत्तेजित हो कर बोला, ‘‘तुम झूठ बोल रही हो, तुम्हें सब अच्छी तरह से याद है.’’
कल्पना को जिस बात का भय था वही हुआ. प्रमेश के हावभाव को देखते हुए वह अब अपने को संयत कर चुकी थी. आने वाले आंधी, तूफान व बाढ़ से सामना करने की शक्ति उस में आ गई थी. वह इस सच को जान गई थी कि अब उसे सच के धरातल पर सबकुछ सहना, झेलना व पाना था.
प्रमेश उस के चेहरे को गौर से देखते हुए आगे बोला, ‘‘तुम कालगर्ल हो. स्त्री के नाम पर कलंक. इतना बड़ा धोखा मेरे परिवार के साथ करने की तुम्हारे घर वालों की हिम्मत कैसे हुई? मैं अभी जा कर सब को तुम्हारी असलियत बताता हूं.’’
यह कह कर प्रमेश ने जैसे ही उठने का उपक्रम किया, कल्पना दोनों हाथ बंद दरवाजे पर रख कर सामने खड़ी हो गई और बोली, ‘‘पहले आप मेरी मजबूरी भी सुन लीजिए फिर आप को जो भी फैसला लेना है, लीजिए. मेरा जीवन तो तबाह हो गया जिस की आशंका से मैं कुछ पल पहले तक बहुत विचलित थी. कम से कम अब उस दशा से मुझे मुक्ति मिल गई है. मेरे गले में मेरा अतीत फांस की तरह गड़ रहा था. अफसोस है कि ऐसा कुछ मैं ने शादी की स्वीकृति देने से पहले यदि महसूस किया होता तो आज यह दिन मुझे न देखना पड़ता.
‘‘हर युवा लड़की के दिल में अरमान होते हैं कि उस का एक घर, पति व परिवार हो और यह भावना ही मेरे जीवन की ठोस धरती पर ज्यादा प्रबल हो गई थी, नहीं तो मुझे क्या अधिकार था किसी को धोखा देने का.’’
कल्पना एक पल को रुकी. उस ने प्रमेश को देखा जिस के चेहरे पर पहले जैसी उत्तेजना नहीं थी. वह आगे बोली, ‘‘यह सच है कि मैं कालगर्ल का धंधा करती थी लेकिन यह भी सच है कि मैं कालगर्ल स्वेच्छा से नहीं बनी बल्कि मेरे हालात ने मुझे कालगर्ल बनाया. जब मुझे सिपाही की नौकरी मिली तो मैं बहुत खुश थी. एक दिन मेरे अधिकारी ने मुझे बुलाया और पूछा कि तुम्हारा जाति प्रमाणपत्र कहां है. यदि तुम ने फौरन जाति प्रमाणपत्र नहीं जमा किया तो तुम्हारी नौकरी चली जाएगी. नौकरी जाने का भय मुझ पर इस कदर हावी था कि मैं घबराहट में समझ न सकी कि क्या करूं.
‘‘मेरा जन्म बिहार में हुआ था. वहां आनेजाने में लगभग एक सप्ताह लग जाता. फिर जाते ही प्रमाणपत्र तो नहीं मिल जाता. मेरी आंखों के सामने मेरे छोटे भाईबहन व मां के उम्मीद से भरे चेहरे घूम गए, जिन्हें मेरा ही सहारा था. वैसे भी हम लोग पिता की मृत्यु के बाद घोर गरीबी में दिन गुजार रहे थे. मेरी नौकरी से घर में सूखी रोटी का इंतजाम होता था.
‘‘मैं अपने अधिकारी से बहुत गिड़गिड़ाई कि कम से कम 10 दिन की छुट्टी व कुछ पैसा एडवांस दे दें तो मैं जाति प्रमाणपत्र ला दूंगी किंतु वह टस से मस नहीं हुए. उलटे उन्होंने कहा कि तुम्हारी नई नौकरी है, अभी छुट्टी भी नहीं मिल सकती और न ही एडवांस पैसा.
‘‘यह सुन कर मेरे हाथपैर फूल गए. मैं उन के पैर पकड़ कर गिड़गिड़ाई और शायद यही मेरी सब से बड़ी भूल थी. यदि हड़बड़ाहट के बजाय मैं ने थोड़ा धैर्य से काम लिया होता तो मैं उन के झांसे में आने से शायद बच जाती.
‘‘मैं कुछ भी सोच पाने की स्थिति में न थी और इस का अधिकारी ने पूरापूरा फायदा उठाया और मुझे भरोसा दिया कि यदि मैं उन के आदेशों का पालन करती रही तो मुझे न तो बिहार जाना पडे़गा और न ही एडवांस रुपयों की जरूरत पडे़गी. उन्होंने उस शाम मुझे अपने बताए स्थान पर बुलाया और एक पेय पिलाया जिस से मुझे हलकाहलका नशा छा गया. उस के बाद उन्होंने मेरे शरीर के साथ मनमानी की और मेरे पर्स में कुछ रुपए डाल दिए. इस के बाद तो मैं उन के हाथ की कठपुतली बन गई.
‘‘मैं ने तो अपनी मजबूरी बता दी और आज भी स्वीकारती हूं कि यदि मैं ने धैर्य से काम लिया होता तो इस विनाश से बच जाती पर आप की क्या मजबूरी थी? आप बाहर जा कर अपने रिश्तेदारों के बीच अपनी सफाई में क्या कहेंगे? आप एक कालगर्ल के साथ क्या कर रहे थे, इस का उत्तर आप दे पाएंगे?’’
दरवाजे से अपना हाथ हटाते हुए कल्पना बोली, ‘‘बाहर जाने से पहले मेरा कुसूर बता दीजिए फिर जो सजा आप मुझे देंगे वह मंजूर होगी.’’
प्रमेश अपने सिर को दोनों हाथों में पकडे़ चुपचाप आंखें फाडे़ छत की ओर देख रहा था. कल्पना भी दरवाजा छोड़ कर दीवार से टिक कर जमीन पर बैठ गई. मनमंथन दोनों में चल रहा था. कल्पना आशंकित थी कि समाज में औरत और आदमी के लिए आज भी अलगअलग मापदंड हैं. प्रमेश पुरुष है, घरपरिवार वाले उस का ही साथ देंगे. उस में दोष क्यों देखेंगे? सारी लांछनाकलंक तो उस के हिस्से में आएगा. अब तो मां के यहां भी ठिकाना न रहेगा.
अपने कलंकित जीवन से छुटकारा पाने के लिए उसे यह हक तो कतई न था कि दूसरों को अंधेरे में रखती. यह तो इत्तफाक था कि प्रमेश दूध का धुला नहीं है. आज यदि किसी चरित्रवान युवक के साथ ब्याह दी जाती तो क्या अपने अंत:-करण से कभी सुखशांति पाती. जरूर उस के मन का चोर उसे जबतब घेरता. हमेशा यह भय बना रहता कि कहीं कोई उसे पहचान न ले. इतनी दूर तक सोच कर ही उसे विवाह करना था. क्या पता जीवन के सफर में कोई ऐसा हमराही मिल ही जाता जो सबकुछ जान कर भी उस का हाथ थामने को तैयार हो जाता.
दोनों की आंखों में प्रथम मिलन की खुमारी दूरदूर तक नजर नहीं आ रही थी. फटी आंखों से दोनों सोच में डूबे सुबह होने का इंतजार कर रहे थे. चिडि़यों की चहचहाहट से सुबह होने का आभास होते ही प्रमेश उठा, अपने केशों को हाथ के पोरों से संवार और कमरे से निकलने के पहले कल्पना से बोला, ‘‘देखो, जो हुआ सो हुआ. तुम किसी प्रकार का नाटक नहीं करोगी, समझीं. हमारा परिवार इज्जतदार लोगों का है.’’