अजय को मानव फूटी आंख नहीं सुहाता. आज से नहीं तभी से जब से उस ने उस के औफिस में जौइन किया था. 5 साल पहले उस की पोस्टिंग पास के कसबे में हुई थी, लेकिन मंत्रीजी की सिफारिश लगवा कर उस ने यहां मुख्यालय में बदली करवा ली थी. मंत्रीजी के नाम का नशा आज भी उस के सिर चढ़ कर बोलता है. तभी तो औफिस में अपनी मरजी चलाता है. देर से आना और जल्दी चले जाना उस की आदत बन चुकी है. लंच तो उस का 1 घंटे का होता ही है उस के अलावा चाय के बहाने भी घंटों अपनी सीट से गायब रहता है. कभी डांटफटकार दो तो तुरंत मंत्रीजी के पीए का शिकायती फोन आ जाता है और अजय की क्लास लग जाती है.
मानव अपनी कौलर ऊंची किए मस्ती मारता रहता है और मजबूरन उस की सीट का पैंडिंग काम अजय को किसी अन्य कर्मचारी से करवाना पड़ता है और ऐसा करने से स्वाभाविक रूप से शेष कर्मचारियों में असंतोष फैलता है.कंट्रोलिंग औफिसर होने के नाते सभी कर्मचारियों को समान रखना अजय की ड्यूटी भी है और विवशता भी लेकिन मानव को कार्यालय शिष्टाचार से कोई फर्क नहीं पड़ता. उसे तो अपनी मनमानी करनी होती है और वह मंत्रीजी के दम पर ऐसा करता भी है.
यहां तक तो फिर भी सहन किया जा रहा था, लेकिन जब से नैना इस औफिस में आई है तब से मानव के लिए औफिस कंपनी गार्डन की तरह हो गया है. जितनी देर औफिस में रहता है, उसी के इर्दगिर्द मंडराता रहता है. कभी चायकौफी और लस्सी के दौर तो कभी मिठाईनमकीन और केकपेस्ट्री की दावत. स्टाफरूम को पिकनिक स्पौट बना कर रख दिया है उस ने. सामने तो कोई कुछ नहीं कहता लेकिन पीठ पीछे सभी उन दोनों को ले कर तरहतरह की अनर्गल बातें करते हैं.अजय भी अंधाबहरा नहीं है,
सब सुनता और देखता है. मन तो करता है कि अनुशासनभंग करने के नाम पर मानव को तगड़ी सजा दे लेकिन न तो उस के पास कोई पुख्ता सुबूत हैं और न ही नैना ने कभी उस की शिकायत की. ऐसे में किसी के चरित्र को निशाना बनाना खुद उसे ही भारी पड़ सकता है, इसलिए वह केवल कुढ़ कर रह जाता है.‘‘नैना, तुम अभी नई हो. अत: जितना सीख सकती हो सीख लो.
आगे तुम्हें बहुत काम आएगा. बेकार इधरउधर की बातों में समय बरबाद करना तुम्हारे भविष्य के लिए ठीक नहीं,’’ कह कर अजय नैना को इशारों ही इशारों मेंमानव से दूर रहने की सलाह देता था, लेकिननैना भी जैसे मानव के रंग में रंगी जा रही थी. वैसे भी सरकारी दफ्तरों में काम करना किसे सुहाता है. अधिकतर लोग अपनी हाजिरी पक्की करने की जुगाड़ में ही रहते हैं. नैना भी उसी राह चल रही थी.नैना और मानव का फ्लर्ट पूरे परवान पर था. नोक झोंक और छेड़छाड़ से ले कर रूठना और मनाना तक. कभी चोरीछिपे तो कभी खुलेआम हो रहा था.
‘कोई क्या कहेगा’ जैसी बंदिश तो आज की पीढ़ी मानती ही कहां है. औफिस में सब इस रासलीला को देख कर अपनी आंखें सेंक रहे थे. केवल अजय ही था जो ये सब अपनी आंखों के नीचे होते देख कर सहन नहीं कर पा रहा था.‘‘मानव और तुम्हें ले कर स्टाफ में तरहतरह की बातें हो रही हैं. मैं तुम्हें चेतावनी दे रहा हूं कि औफिस का डेकोरम बना कर रखो. मु झे यहां कोई तमाशा नहीं चाहिए जो करना है, औफिसके बाद करो,’’ कहते हुए एक दिन अजय ने नैना को चेताया.‘‘क्या करूं सर, मैं तो नई हूं और जूनियर भी. मु झे तो सब की सुननी पड़ती है. चाहे मानव हो या आप,’’ नैना ने मासूमियत से जवाब दिया.अजय हालांकि उस के सब इशारे और तंज सम झ रहा था, लेकिन फिलहाल उस के पास कोई पुख्ता सुबूत नहीं था, इसलिए वह भी कुछ न कर पाने के लिए मजबूर था.