कैसे भूले जा सकते हैं वे दिन जब कोरोना महामारी के कारण देश में आपातकालीन लौकडाउन लगा दिया गया था. मानो तेज रफ्तार गाड़ी में अचानक हैंडब्रैक लगा दिया हो. हर तरफ अफरातफरी का माहौल था. एक तो अनजान बीमारी, दूसरे इलाज का अतापता नहीं. भय तो फैलना ही था. सब अंधेरे में तीर चला रहे थे. दवाओं के अलावा कोई काढ़ा-आसव तो कोई कुछ… जिसे जो समझ में आ रहा था वह वही आजमा कर देख रहा था.
न रेल चल रही थी, न ही बस. स्कूल, कालेज, कोचिंग और अन्य दूसरे होस्टल खाली करवाए जा रहे थे. ऐसे में उन लोगों को परेशानी हो गई जो किसी कारण से अपने ठिकाने से दूर थे.
निष्ठा के साथ भी यही हुआ. कहां तो वह अपना वीकैंड मृदुल के साथ बिताने आई थी और कहां इस झमेले में फंस गई. नहींनहीं, यह कोई पहली बार नहीं था जब वे दोनों इस तरह से एक साथ थे. वे अकसर इस तरह के शौर्ट ट्रिप प्लान करते रहते थे.
चूंकि दोनों ही अपनेअपने घरों से दूर यहां पुणे में जौब करते हैं, इसलिए कोई रोकटोक भी नहीं थी. भविष्य में शादी करेंगे या नहीं, इस फिक्र से दूर दोनों वर्तमान को जी रहे थे.
जनता कर्फ्यू की घोषणा के साथ ही आगामी दिनों में लौकडाउन लगने की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी. निष्ठा और मृदुल ने भी सोचा कि कौन जाने कितने दिन एकदूसरे से दूर रहना पड़े, इसलिए क्यों न खुल कर जी लिया जाए. निष्ठा चूंकि वर्किंग वुमन होस्टल में रहती थी और मृदुल कहीं पेइंगगैस्ट, इसलिए दोनों ने पणजी में मृदुल के दोस्त अभय के घर जाना तय किया. अभय अपने दोस्तों के साथ कहीं बाहर था, इसलिए उस का घर खाली था. मौके का फायदा उठाते हुए वे दोनों 2 दिन की अपनी जमा की हुई लीव ले कर पणजी चले गए.
अभी दोनों इस वीकैंड को एंजौय कर ही रहे थे कि देशव्यापी लौकडाउन घोषित कर दिया गया. खबर सुनते ही मृदुल की आंखें चमक उठीं.
ये भी पढ़ें- कल्लो : कैसे बचाई उस रात कल्लो ने अपनी इज्ज्त
“हम तुम एक कमरे में बंद हों, और चाबी खो जाए…” वह शरारत से आंख दबाते हुए गुनगुनाया.
“तुम्हें बड़ा मजाक सूझ रहा है. क्या तुम्हें अंदाजा भी है कि हम किस मुश्किल में फंस चुके हैं?” निष्ठा ने उसे सीरियस करने की कोशिश की.
“इस में कौन सी मुसीबत हुई भला? जैसे हम यहां फंसे हैं वैसे अभय भी फंसा हुआ है. घर में राशन तो रखा ही हुआ है. बस, बनाओ और खाओ. अच्छा ही है, इस बहाने तुम्हारे हाथ के बने पकवान खाने को मिलेंगे.” मृदुल ने उसे बेफिक्र करना चाहा लेकिन निष्ठा तो दूसरी ही चिंता में घुली जा रही थी.
“एकसाथ एक घर में रहने का मतलब तुम समझ रहे हो न, वह भी बिना किसी सुरक्षा उपाय के.” निष्ठा ने कुछ संकोच के साथ कहा तो मृदुल खिलखिला दिया.
“तो क्या हुआ? नन्हा सा गुल खिलेगा, अंगना… सूनी बैंया सजेगी सजना.” गाते हुए उस ने निष्ठा को छेड़ा. वह गुस्से में पांव पटकती हुई वहां से हट गई.
यह पूरे 21 दिन का लौकडाउन था. जब तक थे तब तक तो सुरक्षा उपाय अपनाए गए, फिर मन मार कर कुछ दिन संयम भी रखा गया. जब धैर्य चूक गया तो महीने के सुरक्षित दिनों का हिसाब रखते हुए भी दोनों ने संबंध बनाए लेकिन उस में कोई आनंद न था.
एकएक दिन चिंता में गुजर रहा था. किसी को लौकडाउन खुलने का इंतजार होगा, लेकिन निष्ठा तो अपने मासिकधर्म के आने का इंतजार कर रही थी. आखिर जिस दिन उसे अपनी पैंटी पर कत्थई निशान दिखे, उस ने सुकून की सांस ली. जिंदगी में पहली बार अपना मासिकधर्म आने पर निष्ठा खुश हुई थी. इस से पहले तो यह पीरियड उसे बहुत ही असहज कर दिया करता था.
खैर, किसी तरह पहले लौकडाउन के 21 दिन बीते. हालांकि लौकडाउन को आगे भी बढ़ा दिया गया लेकिन पाबंदियों में कुछ ढील भी मिली. मृदुल और निष्ठा भी किसी तरह पणजी से निकले और पुणे आए. निष्ठा ने राहत महसूस की. बेशक निष्ठा आधुनिक विचारधारा की लड़की है लेकिन समाज में बिनब्याही मां की स्थिति से भी बखूबी वाकिफ है, इसलिए लौकडाउन में वह किसी मुसीबत में नहीं फंसी, इसी बात से वह बहुत राहत महसूस कर रही थी.
कहते हैं कि एक बार वर्जनाएं टूट जाएं तो उन के बारबार टूटने का अंदेशा बना रहता है. लौकडाउन की पाबंदियों के बीच फिर से जिंदगी न्यू नौर्मल होने लगी थी. यातायात के साधन खुलने लगे थे. इस बीच कहींकहीं पर्यटन उद्योग भी फिर से पटरी पर आने लगा था. निष्ठा और मृदुल की जिंदगी में पुराने समय के दौर ने फिर से गति पकड़ ली. दोनों फिर से हर वीकैंड में एकसाथ दिखने लगे. लेकिन इस कठिन समय ने निष्ठा को अपने रिश्ते के लिए अवश्य ही संजीदा कर दिया था. उस ने और मृदुल ने शादी करने का फैसला कर लिया.
ये भी पढ़ें- तेरी देहरी : अनुभव पर क्यों डोरे डाल रही थी अनुभा
यों तो आजकल प्रेम विवाह टैबू नहीं रहे लेकिन फिर भी अलग जातिधर्म के व्यक्ति को अपनी बिरादरी में शामिल करने से पहले पुराने लोग आज भी हिचकते हैं. शुरूआती आपत्ति के बाद दोनों परिवार इस रिश्ते के लिए राजी हो गए. नवंबर के महीने में जब सबकुछ बिलकुल ठीक सा लग रहा था तब कुछ निजी लोगों की उपस्थिति में निष्ठा और मृदुल की मंगनी हो गई.
हमारे समाज में मंगनी होने को शादी की गारंटी मान लिया जाता है. ऐसी स्थितियों में समाज और संस्कार दोनों ही लड़कालड़की के मिलन पर एतराज नहीं करते. ये दोनों तो वैसे भी खूब मिलतेजुलते थे, अब थोड़े से अधिक बेपरवाह होने लगे थे.
यह शादी अप्रैल के महीने में होने वाली थी लेकिन इस से पहले ही एक मनचाही समस्या सामने आ खड़ी हुई. निष्ठा ने इस बार अपना पीरियड मिस कर दिया. यह बात जब उस ने मृदुल को बताई तो उस ने आदतन लापरवाही से निष्ठा की फिक्र को हवा में उड़ा दिया.
“अरे यार, क्यों टैंशन ले रही हो. अब तो शादी होने ही वाली है न. वैसे, तुम चाहो तो एबौर्शन करवा सकती हो.” फ़िक्रमुक्त करने के साथ ही मृदुल ने उसे सलाह भी दे डाली.
“नहीं. कहते हैं, पहला बच्चा प्रकृति का उपहार होता है. पहले ही गर्भ को गिरवा दिया जाए तो बाद में गर्भ धारण करने में समस्याएं होने लगती हैं. मैं यह बच्चा नहीं गिरवाऊंगी,” कहते हुए निष्ठा ने एबौर्शन करवाने से इनकार कर दिया.
आगे पढ़ें- किसी का सोचा हुआ अक्षरशः कभी हुआ है…