माहौल कोई भी हो, मौसम कैसा भी हो, दुनिया जाए भाड़ में, उन्हें कोई मतलब नहीं था. वे दोनों जब तक 3-4 घंटे गप नहीं लड़ातीं, उन्हें चैन नहीं पड़ता. उन्हें ऐसा लगता कि दिन व्यर्थ गया. उन्हें मिलने व एकदूसरे से बतियाने की आदत ऐसी पड़ गई थी जैसे शराबी को शराब की, तंबाकू खाने वाले को तंबाकू की. उन्हें आपस में एकदूसरे से प्रेम था, स्नेह था, विश्वास था. एकदूसरे से बात करने की लत सी हो गई थी उन्हें. कोई काम भी नहीं उन्हें. 65 साल के आसपास की इन दोनों महिलाओं को न तो घर में करने को कोई काम था न करने की जरूरत. घर में बहुएं थीं. कमाऊ बेटे थे. नातीपोते थे.
इसलिए दोपहर से रात तक वे बतियाती रहतीं. कभी तारा के घर सितारा तो कभी सितारा के घर तारा. वे क्या बात करती हैं, उस पर कोई विशेष ध्यान भी नहीं देता. हां, बहुएं, नातीपोते, चायनाश्ता वगैरा उन के पास पहुंचा देते. दोनों बचपन की पक्की सहेलियां थीं. एक ही गांव में एकसाथ उन का बचपन बीता. थोड़े अंतराल में दोनों की शादी हो गई. जवानी के राज भी उन्हें एकदूसरे के मालूम थे. कुछ तो उन्होंने आपस में बांटे. फिर इत्तफाक यह हुआ कि विवाह भी उन का एक ही शहर के एक ही महल्ले में हुआ.
शादी के बाद शुरू में तो घरेलू कामों की व्यस्तता के चलते उन की बातचीत कम हो पाती लेकिन उम्र के इस मोड़ पर वे घरेलू कार्यों से भी फुरसत पा चुकी थीं. पानदान वे अपने साथ रखतीं. थोड़ीथोड़ी देर बाद वे अपने हाथ से पान बना कर खातीं और खिलातीं. सितारा मुसलिम थी, तारा हिंदू ठाकुर. लेकिन धर्म कभी उन के आड़े नहीं आया. सितारा ने नमाज पढ़ी शादी के बाद, वह भी परिवार के नियमों का पालन करने के लिए, अंदर से उस की कोई इच्छा नहीं थी. जब उन्हें बात करतेकरते दोपहर से अंधेरा हो जाता तो परिवार का कोई सदस्य जिन में नातीपोते ही ज्यादातर होते, उन्हें लेने आ जाते. उन की बात कभी पूरी नहीं हो पाती. सो, वे कल बात करने को कह कर महफिल समाप्त कर देतीं.
अभी सितारा के घर रिश्तेदार आए हुए थे तो महफिल तारा के घर में उस के कमरे में जमी हुई थी. बहू अभीअभी चाय रख कर गई थी. दोनों ने चाय की चुस्कियों से अपनी वार्त्ता प्रारंभ की. सितारा ने शुरुआत की.
‘‘सब ठीक है घर में, मेरे आने से कोई समस्या तो नहीं?’’
‘‘कोई समस्या नहीं. घर मेरा है. मेरे आदमी ने बना कर मेरे नाम किया है. आदमी की पैंशन मिलती है. किसी पर बोझ नहीं हूं. फिर मेरे बिना तो पत्ता भी नहीं हिलता घर का. तुम कहो, तुम्हारे बहूबेटी को तो एतराज नहीं है हमारे मिलने पर?’’ ‘‘एतराज कैसा? मिल कर चार बातें ही तो करते हैं. अब जा कर बुढ़ापे में फुरसत मिली है. जवानी में तो शादी के बाद बहू बन कर पूरे घर की जिम्मेदारी निभाई. बच्चे पैदा किए, बेटेबेटियों की शादियां कीं. अब जिम्मेदारियों से मुक्त हुए हैं.’’
दोनों के पति गुजर चुके थे. विधवा थीं दोनों. उन के घर मात्र 20 कदम की दूरी पर थे. सितारा ने कहा, ‘‘सुना है कि वर्मा की बेटी का किसी लड़के के साथ चक्कर है.’’
‘‘क्या बताएं बहन, जमाना ही खराब आ गया है. बच्चे मांबाप की सुनते कहां हैं. परिवार का कोई डर ही नहीं रहा बच्चों को.’’
‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’
‘‘बुढ़ापे में कान कम सुनते हैं. बेटेबहू आपस में बतिया रहे थे.’’
‘‘मैं तो यह तमाशा काफी समय से देख रही हूं. छत पर दोनों एकसाथ आते, एकदूसरे को इशारे करते. उन्हें लगता कि हम लोग बुढि़या हैं, दिखाई तो कुछ देता नहीं होगा. लेकिन खुलेआम आशिकी चले और हमारी नजर न पड़े. आंखें थोड़ी कमजोर जरूर हुई हैं लेकिन अंधी तो नहीं हूं न.’’
‘‘हां, मैं ने भी देखा, ट्यूशनकालेज के बहाने पहले लड़की निकलती है अपनी गाड़ी से, फिर लड़का. हमारे बच्चे अच्छे निकले, जहां शादी के लिए कह दिया वहीं कर ली.’’
‘‘हां बहन, ऐसे ही मेरे बच्चे हैं. मां की बात को फर्ज मान कर अपना लिया.’’ अपनेअपने परिवार की तारीफ करतीं और खो जातीं दोनों. न तो दोनों को कंप्यूटर, टीवी से मतलब था, न जमाने की प्रगति से. वे तो जो देखतीसुनतीं उसे नमकमिर्च लगा कर एकदूसरे को बतातीं. इस मामले में दोनों ने स्वयं को खुशनसीब घोषित कर दिया. तारा ने कहा, ‘‘जब घर में यह हाल है तो बाहर न जाने क्या गुल खिलाते होंगे?’’ सितारा ने कहा, ‘‘मांबाप को नजर रखनी चाहिए, लड़की 24-25 साल की तो होगी. अब इस उम्र में मांबाप शादी नहीं करेंगे तो बच्चे तो ये सब करेंगे ही. कुदरत भी कोई चीज है.’’ तारा ने कहा, ‘‘देखा नहीं, कैसे छोटेछोटे कपड़े पहन कर निकलती है. न शर्म न लिहाज. एक दिन मैं ने पूछा भी लड़की से, ‘क्यों बिटिया, दिनभर तो बाहर रहती हो, घर के कामकाज सीख लो. शादी के बाद तो यही सब करना है.’ तो पता है क्या जवाब दिया?’’
‘‘क्या?’’ सितारा ने उत्सुकता से पूछा.
‘‘कहने लगी, ‘अरे दादी, मुझे रसोइया थोड़े बनना है. मैं तो आईएएस की तैयारी कर रही हूं. एक बार अफसर बन गई तो खाना नौकर बना कर देंगे.’ फिर मैं ने पूछा कि लड़की जात हो. कल को शादी होगी तो घर में कामकाज तो करने ही पड़ेंगे. वह हंस पड़ी जोर से. कहने लगी, ‘दादी, आप लोगों को तो शादी की ही पड़ी रहती है. कैरियर भी कोई चीज है.’ शादी की बात करते हुए न लजाई, न शरमाई. बेशर्मी से कह कर अपने स्कूटर पर फुर्र से निकल गई.’’
सितारा ने कहा, ‘‘वर्माजी पछताएंगे. लड़कियों को इतनी छूट देनी ठीक नहीं. जब देखो मोबाइल से चिपकी रहती है बेशर्म कहीं की.’’
‘‘अरे, मैं ने तो यह भी सुना है कि लड़का कोई गैरजात का है. लड़की कायस्थ और लड़का छोटी जात का.’’
‘‘हमें क्या बहना, जो जैसा करेगा वह वैसा भरेगा.’’
‘‘प्यार की उम्र है. प्यार भी कोई चीज है.’’
‘‘यह प्यारमोहब्बत तो जमानों से है. तुम ने भी तो…’’
सितारा ने कहा, ‘‘तुम भी गड़े मुर्दे उखाड़ने लगीं. अरे, हमारा प्यार सच्चा प्यार था. सच्चे प्यार कभी परवान नहीं चढ़ते. सो, जिस से प्यार किया, शादी न हो सकी. यही सच्चे प्यार की निशानी है.’’
‘‘वैसे कुछ भी कहो सितारा बहन, न हो सके जीजाजी थे स्मार्ट, खूबसूरत.’’
अफसोस करते हुए सितारा ने कहा, ‘‘जान छिड़कता था मुझ पर. धर्म आड़े न आया होता तो… फिर हम में इतनी हिम्मत भी कहां थी. संस्कार, परिवार भी कोई चीज होती है. अब्बू ने डांट लगाई और प्यार का भूत उतर गया. काश, उस से शादी हो जाती तो आज जीवन में कुछ और रंग होते. मनचाहा जीवनसाथी. लेकिन घर की इज्जत की बात आई तो हम ने कुर्बानी दे दी प्यार की.’’
‘‘वैसे कहां तक पहुंचा था तुम्हारा प्यार?’’
‘‘बस, हाथ पकड़ने से ले कर चूमने तक.’’
सितारा ने फिर वर्मा की लड़की का जिक्र छोड़ कर अपनी करतूत पर परदा डालते हुए कहा, ‘‘वर्मा की लड़की के तो मजे हैं. देखना भागेगी एक न एक दिन.’’
‘‘हां, लेकिन हमें क्या लेनादेना. भाड़ में जाए. एक बात जरूर है, है बहुत सुंदर. जब लड़की इतनी सुंदर है तो कोई न कोई तो पीछे पड़ेगा ही. अब बाकी दारोमदार लड़की के ऊपर है.’’
‘‘क्या खाक लड़की के ऊपर है. देखा नहीं, उस का शरीर कैसा भर गया है. ये परिवर्तन तो शादी के बाद ही आते हैं.’’
‘‘हां, लगता तो है कि प्यार की बरसात हो चुकी है. एक हम हैं कि तरसते रहे जीवनभर लेकिन जिस पर दिल आया था वह न मिला. कमीने के कारण पूरे गांव में बदनाम हो गई और शादी की बात आई तो मांबाप का आज्ञाकारी बन गया. श्रवण कुमार की औलाद कहीं का.’’
‘‘वह जमाना और था. आज जमाना और है. आज तो लड़केलड़की कोर्ट जा कर शादी कर लेते हैं. कानून भी मदद करता है. हमारे जमाने में ये सब कहां था?’’
‘‘होगा भी तो हमें क्या पता? हम ठहरे गांव के गंवार. आजकल के लड़केलड़कियां कानून की जानकारी रखते हैं और समाज को ठेंगा दिखाते हैं. काश, हम ने हिम्मत की होती, हमें ये सब पता होता तो आज तेरा जीजा कोई और होता.’’
‘‘मैं तो मांबाप के सामने स्वीकार भी न कर सकी. उस के बाद भी भाइयों को पता नहीं क्या हुआ कि बेचारे के साथ खूब मारपीट की. अस्पताल में रहा महीनों. इस बीच मेरी शादी कर दी. मैं क्या विरोध करती, औरत जात हो कर.’’
‘‘सच कहती हो. जिस खूंटे से मांबाप ने बांध दिया, बंध गए. आजकल की लड़कियों को देख लो.’’
‘‘अरी बहन, लड़कियां क्या, शादीशुदा औरतों को ही देख लो. एकसाथ दोदो. घर में पति, बाहर प्रेमी. इधर, पति घर से निकला नहीं कि प्रेमी घर के अंदर. क्या जमाना आ गया है.’’ बातचीत हो ही रही थी कि तभी बाहर से आवाज आई, ‘‘दादी ओ दादी.’’
‘‘लो, आ गया बुलावा. अब जाना ही पड़ेगा.’’
‘‘तुम क्या कह रही थीं?’’
‘‘अब, कल बताऊंगी. अभी चलती हूं.’’
अगले दिन वे फिर मिलीं.