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आज्ञा का तुरंत पालन हुआ. बंद खिड़कियों वाली अंधेरी पालकी में पड़ा हुआ कपिल अपनी भयंकर भूल पर पश्चात्ताप करने लगा. सारे संसार को कूटनीति का पाठ पढ़ाने वाला स्वयं अपनी मूर्खता को कोसने लगा. उसे शासन की ओर से किसी ऐसे कदम की आशा प्रारंभ में तो थी, पर जनआक्रोश की तीव्र लहर के कारण उस ने अपनेआप को अपराजेय मान लिया था.

केवल नारी होने के कारण उसे यशोवती की ओर से असावधान नहीं होना चाहिए था. जब उस के मित्रों ने ही उस का साथ छोड़ दिया तो जनता तो निश्चित रूप से मैदान छोड़ भागेगी.

अपने अनुयायियों पर उसे भयंकर क्षोभ उत्पन्न हुआ. वे लोग वास्तव में यशोवती के विरोधी न थे, प्रत्युत अंधानु- भक्ति के कारण वे कपिल का साथ दे रहे थे. सचमुच उस ने यशोवती का विरोध कर मृत्यु को आमंत्रित कर लिया था.

अब उसे अपने प्राणों के बचने की कोई आशा नहीं रही थी. अब उसे स्पष्ट हो गया था कि साधारण हाड़मांस की पुतली, भोली और कमजोर प्रतीत होने वाली नारी भी आवश्यकता पड़ने पर साक्षात काल बन सकती है. स्पष्टतया बाजी उस के हाथों से निकल कर यशोवती के हाथों में पहुंच चुकी थी.

सहसा अपने विश्वस्त साथी द्वारा यशोवती के संबंध में एकत्र की गई सूचना उस के मस्तिष्क में कौंध उठी. उस दिन का वार्त्तालाप उस की स्मृति में ताजा हो उठा.

‘यह समस्या अचानक कश्यपपुर में क्योंकर उत्पन्न हो गई. यशोवती के पति सम्राट दामोदर ने बैठेबिठाए मथुरा के यादवों से वैर क्यों मोल ले लिया?’ उस के इस प्रश्न पर उस के साथी ने एक लंबी सांस ले कर प्रत्युत्तर दिया था.

‘पुरोहितजी, मेरी सूचनाओं के अनुसार हमारे कश्यपपुर के सम्राट गोनंद प्रथम के काल में ही इस समस्या के कंटीले बीज इस धरती में डाल दिए गए थे. राजगृह के राजा जरासंध की सहायता के लिए गोनंद प्रथम कश्मीर से बड़ी सेना सहित बिहार में जा पहुंचे थे. जैसी आशा थी, मथुरा के यादवों ने जरासंध पर आक्रमण कर दिया. यादव बलराम के हाथों गोनंद प्रथम का प्राणांत हुआ.

‘समस्या यहीं नहीं समाप्त हो सकती थी,’ उस  ने बात आगे चलाई, ‘हारनाजीतना तो युद्ध में होता ही रहता है. गौरवपूर्ण बात यह थी कि कश्यपपुर का राजा भारत के एक संकटग्रस्त शासक की सहायता करते हुए शहीद हो गया. कटोचवंशीय गोनंद प्रथम का यह अमर बलिदान हमें हमेशा प्रेरणा प्रदान करता रहेगा. यह गौरवगाथा भारत से हमारे घनिष्ठ व अटूट संबंधों की भी साक्षी है.’

‘रानी यशोवती फिर कश्यपपुर की शासिका बनने कैसे आ पहुंची?’ कपिल ने प्रश्न किया.

‘श्रीमन, गोनंद प्रथम का पुत्र राजा दामोदर जिस पल से कश्यपपुर के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ, अपने पिता की असमय मृत्यु उस के हृदय को दग्ध करती रही. उन के प्राणहंता से प्रतिशोध लेना उस के जीवन का मूलमंत्र बन गया. आठों पहर उस के मनोमस्तिष्क पर केवल एक नाम ‘बलराम’ अंकित रहने लगा. प्रतिशोध लिए बिना उसे अपने पिता की पीड़ायुक्त अंतिम आकृति कल्पना में और भी अधिक करुणाजनक प्रतीत होती थी. वह स्पप्न में भी अपने पितृहंता का मुख देखतेदेखते असंतुलित हो उठता.

‘सहसा राजा दामोदर की मनोवांछित इच्छा लगभग पूर्ण हुई. गांधार शासक की पुत्री का स्वयंवर उन्हीं दिनों आयोजित हुआ और देशविदेश के राजाओं सहित मथुरा के बलराम यादव को भी आमंत्रित किया गया. कश्यपपुर के राजा दामोदर ने स्वयंवर के बहाने अपने शत्रु बलराम पर तुरंत चढ़ाई कर दी. उस का यह कार्य कूटनीति के साथसाथ शालीनता के भी विरुद्ध था.

‘पर दामोदर का मस्तिष्क इस समय  पूर्णतया असंतुलित था. बलराम ने दामोदर को परास्त ही नहीं किया, अपितु उस के प्राण भी ले लिए. अब सुना है कि दामोदर के पुत्र गोनंद द्वितीय के वयस्क होने तक उस की मां यशोवती को कश्यपपुर की शासिका घोषित किया गया है.’

‘ओह, तो यों कहो कि यह सब स्थिति बलराम यादव के कारण पैदा हुई है,’ कपिल बोला.

‘और क्या, बलराम यादव ने दामोदर के प्राण ले कर कश्यपपुर के माथे पर यशोवती रूपी घिनौना, काला तिलक अंकित कर दिया है.’

‘तुम चिंता मत करो,’ उस ने कहा था, ‘मैं अपने प्राण रहते तक विधवा यशोवती को कश्यपपुर की गद्दी पर नहीं बैठने दूंगा. किसी विधवा स्त्री को गद्दी पर बैठाने की अपेक्षा कश्यपपुर की गद्दी का खाली रहना ही उचित है.’

वह इन्हीं विचारों में लीन था कि अचानक पालकी रुक गई और 2 व्यक्तियों ने उसे पालकी से बाहर निकलने का आदेश दिया. उस ने आंखें टिमटिमा कर देखा, बाहर भयावह अंधेरा था. हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. यशोवती को ढेर सारी गालियां देते हुए वह कल्पना के सहारे राजधानी पुरानाधिष्ठान के राजमहल के सम्मुख पालकी से उतर कर आगे बढ़ा.

मुख्यद्वार व कई सीढि़यों को पार करने के पश्चात सहसा ही उसे एक रत्नमंडित दीवारों व स्तंभों वाले कक्ष में तीव्र चौंधियाते प्रकाश में खड़ा कर दिया गया. तीव्र प्रकाश के कारण स्तंभों व दीवारों के रत्नों से इंद्रधनुषी आभा फूट रही थी. उसे लगा जैसे वह कई इंद्रधनुषों के बीच खड़ा हो.

‘‘पुरोहित कपिल का विधवा यशोवती के कक्ष में स्वागत है.’’

कपिल कुछ पल स्तब्ध खड़ा रह गया. उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. प्रकाश की सहस्रों किरणों के बीच जो युवती उस के सम्मुख बैठी हुई थी, वह उसे परिचिता प्रतीत हो रही थी. अपने मस्तिष्क पर जोर डालने पर भी वह युवती का परिचय ज्ञात नहीं कर सका.

उस के चेहरे पर बड़ेबड़े 2 नेत्र सागर के समान गहरे और सम्मोहनयुक्त लगे. इन नयनों की गंभीरता उस के हृदय में सीधी पैठ रही थी. विधवा यशोवती इतनी आकर्षक, सुकुमार और कोमलांगी होगी इस की तो उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. धीरेधीरे उस के प्रति उस का सारा रोष, आक्रोश और विरोध न जाने क्यों हवा होता प्रतीत हुआ.

‘‘आइए,  पुरोहितजी, इस आसन पर विराजिए.’’

‘‘नहीं…नहीं, महिषी, मैं आप के समकक्ष कैसे बैठ सकता हूं.’’

स्वयं कपिल को अपने शब्दों पर आश्चर्य हो रहा था कि वह क्या बोल रहा है. सचमुच यशोवती ने उसे सम्मोहित कर लिया था. कुतर्क, हठधर्मिता व धार्मिक श्रेष्ठता का गर्व धीरेधीरे उस का साथ छोड़ते प्रतीत हो रहे थे.

‘‘देखिए पुरोहितजी, प्रकृति ने हमें रूप, समृद्धि व सम्मान सभी कुछ प्रदान किया, पर आप के ढोंगी समाज ने, जानते हैं, मुझे क्या भेंट दी? यह देखिए…’’ उस ने अपनी सूनी कलाइयां तथा पैर की नंगी उंगलियां प्रदर्शित कर दीं, ‘‘और देखिए…’’ उस ने अपने सूने ललाट व लंबे, धरती को छूते बालों को हटा कर, सीधीसपाट सूनीसूनी मांग की ओर इंगित किया.

‘‘यह इस बात का दंड है कि मैं अपने पति को जीवित नहीं रख सकी. दूसरे शब्दों में, मैं अपने पति को खा गई. सर्वविदित है कि गांधार में उन का प्राणांत हुआ. मैं आप से पूछना चाहती हूं कि क्या यह मेरी इच्छा थी कि मैं विधवा हो जाऊं? पुरुष अपनी पत्नी के देहांत के पश्चात कुछ भी नहीं खोता, तो फिर नारी ही विधवा बनने के लिए बाध्य क्यों है?’’ यशोवती की मुखमुद्रा क्रोध व आक्रोश से भरी हुई थी.

कपिल क्या प्रत्युत्तर देता? आज तक कुतर्कों से वह अपने विरोधियों को जीतता रहा था, पर यशोवती को कुतर्कों से बहलाना सरल नहीं था. अपने सामाजिक नियमों का खोखलापन उसे स्पष्ट महसूस हुआ.

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