औफिस में आते ही मैं ने रोज की तरह अपना लैपटौप औन किया और एमएस वर्ड में जा कर एक बढि़या सब ब्लौग लिखा, जिसे मैं रास्तेभर सोचता आ रहा था. जल्द ही उसे कौपी कर के अपने ब्लौग ‘अनजाने खत’ में पेस्ट कर के उसे पोस्ट कर दिया. अपने ब्लौग से लिंकअप करते हुए मैं ने उस का भी ब्लौग देखा ‘खुशियों भरी जिंदगी.’ मगर आज भी उस ने कुछ नहीं लिखा था.

3 दिन हो गए थे, उस ने कुछ भी नहीं लिखा, जबकि वह तो रोज लिखने वालों में से है. कभीकभी तो एक दिन में 2-3 कविताएं भी लिख डालती थी. कहीं उस की तबीयत तो नहीं खराब हो गई? मैं फेसबुक पर गया. वहां भी उस की ऐक्टिविटी 3 दिन पहले की दिख रही थी. व्हाट्सऐप पर भी लास्ट सीन देखा तो वही हाल था. आखिर वह पिछले 3 दिनों से है कहां? कहीं बीमार तो नहीं? नहींनहीं वह बीमार भी होती तब भी कुछ न कुछ जरूर लिखती थी. ज्यादा बड़ा नहीं तो 2-3 पंक्तियों की कोई क्षणिका या हाईकू… कहीं उस का लैपटौप व मोबाइल तो नहीं खराब हो गया? अरे नहीं, दोनों एकसाथ कैसे खराब हो सकते हैं? चलो फोन कर के ही देखता हूं. लेकिन उस ने मु झे मैसेज या फोन करने के लिए मना कर रखा है. हमेशा वही फोन करती है. मैं खुद से ही सवालजवाब करने में उल झा था.

मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी कि मैं उसे फोन करूं. कहीं उस के पति ने देख लिया तो बेचारी मुसीबत में पड़ जाएगी. यही सोच कर मैं ने उसे कौल या मैसेज नहीं किया.

‘1-2 दिन और इंतजार कर लेता हूं, उस के बाद कुछ सोचूंगा,’ मैं ने अपने दिल को सम झाया और फिर अपने काम में लग गया.

मगर आज मेरा मन औफिस के कामों में बिलकुल नहीं लग रहा था. बारबार मेरा ध्यान मोबाइल पर ही जा रहा था. शायद उस की कोई कौल या मैसेज आ गया हो. लंच टाइम हो गया, फिर भी कोई मैसेज नहीं आया. उसे मेरे लंच टाइम का पता था. वह अकसर मु झे इस वक्त फोन करती थी.

मैं कभीकभी उस पर  झल्लाया भी करता था, ‘‘प्लीज लंच टाइम में फोन मत किया करो. मु झे खाते हुए बोलना पसंद नहीं.’’

‘‘तुम से बोलने को किस ने कहा. बस सुनते रहो न मैं जो कह रही हूं. तुम्हारे लंच टाइम के समय मैं भी खाना खाती हूं और तुम से बात किए बिना मु झे खाने में कोई स्वाद नहीं लगता,’’ और इस के साथ ही जोरदार हंसी.

अचानक मु झे भी हंसी आ गई. अचकचा कर मैं ने अपनी अगलबगल देखा, कहीं कोई मु झे अकेले यों हंसते हुए तो नहीं देख रहा. फिर मैं ने जल्दी से अपना लंच खत्म किया और कैंटीन की बालकनी में आ गया. कैंटीन के पीछे वाली बालकनी से एक पार्क दिखाई देता था.

जाड़े का मौसम था. बच्चे धूप में खेल रहे थे. उन की आवाजें तो नहीं सुनाई दे रही थीं, मगर चेहरे देख कर खिलखिलाहट का अंदाजा लगाया जा सकता था. वह भी तो ऐसे ही खिलखिलाती रहती थी. फोन पर या मिलने पर या फिर मैसेज में भी वह बिना स्माइली के बात नहीं करती थी. बेहद जिंदादिल थी वह.

एक कवि सम्मेलन के दौरान हम दोनों मिले थे. हम दोनों ही लेखक थे. कविता एवं ब्लौग लिखना हम दोनों का शौक था.

पहली बार जब उस ने मेरी कविता सुनी थी तो प्रोग्राम के दौरान ही बिंदास हो कर कहा था, ‘‘आप इतनी रोमांटिक कविताएं कैसे लिख लेते हो? मु झे तो आप के शब्दों से प्यार हो गया है.’’

मैं कुछ कहता उस से पहले ही उस ने अपना मोबाइल निकाल कर कहा, ‘‘मु झे अपना मोबाइल नंबर दीजिए.’’

फिर जैसे ही मैं ने अपना मोबाइल नंबर बताया उस ने मु झे कौल कर दिया, ‘‘यह मेरा मोबाइल नंबर है, सेव कर लीजिएगा. जब भी आप की कविता सुनने का दिल किया करेगा मैं आप को परेशान कर दिया करूंगी,’’ कह वह निकल गई.

‘‘पगली कहीं की,’’ अनायास ही मेरे मुंह से अभी निकल गया.

उस दिन भी तो उस के जाने के बाद यही शब्द कहे थे मैं ने. उस के नाम से ज्यादा मैं ने उसे पगली कह कर ही बुलाया है. 1 हफ्ते के अंदर ही हम दोनों व्हाट्सऐप, फेसबुक, इंस्टाग्राम सब जगह एकदूसरे को लाइक, कमैंट और शेयर करने लगे थे और साथ ही लंबीलंबी चैटिंग भी. वह अकसर कहा करती कि मैं तुम्हारे शब्दों में जीती हूं. तुम्हारे ब्लौग ‘अनजाने खत’ सीधे मेरे दिल तक पहुंचते हैं.

एक दिन मैं ने उसे मैसेज किया, ‘‘सोच रहा हूं मैं ब्लौग्स लिखना छोड़ दूं.’’

‘‘फिर तो मैं भी तुम्हें छोड़ दूंगी,’’ तुरंत उस का मैसेज आया.

‘‘कोई बात नहीं, छोड़ देना. तुम्हारा भी समय बचेगा और मेरा भी. वैसे भी मेरी पत्नी को बिलकुल पसंद नहीं है मेरा कविता या ब्लौग लिखना और तुम्हारे पति को भी तो नहीं पसंद है.’’

‘‘तुम्हारी पत्नी का तो पता नहीं, मगर मेरे पति को तो मैं भी पसंद नहीं… तो क्या मैं जीना छोड़ दूं? अब मैं तुम्हारी कविताओं के साथसाथ तुम से भी प्यार करने लगी हूं.’’

साथ ही एक चुंबन वाली इमोजी के साथ आया उस का यह मैसेज पढ़ कर मेरे मुंह से फिर निकला, ‘‘पगली कहीं की,’’ और न जाने कैसे रिप्लाई भी हो गया था.

‘‘तो इस पगली से मिलने पागलखाने आ जाओ न.’’

‘‘पागलखाने?’’

‘‘हां, इस रविवार को एक कवि सम्मेलन का न्योता मिला है मु झे. तुम भी आ जाओ. फिर दोनों मिल कर पागलपंती करते हैं.’’

‘‘मैं नहीं आने वाला.’’

मेरे इनकार करने के बावजूद उस ने मु झे उस कवि सम्मेलन का पता भेज दिया.

रविवार का दिन था. मैं भी उस से मिलने का लोभ संवरण न कर पाया और उस के बताए पते पर पहुंच ही गया.

‘‘क्यों छली जाती हो तुम,

कभी सीता बन कर राम से,

तो कभी राधा बन कर श्याम से?’’

जब उस ने स्त्रियों के लिए और ओज, उत्साह एवं उम्मीद से भरी हुई अपनी इस नवरचित कविता का पाठ किया तो सारा हौल तालियों से गुंजायमान हो गया. प्रोग्राम के बाद हम दोनों ही कौफी शौप में जा बैठे.

‘‘तुम्हें डर नहीं लगता इस तरह मेरे साथ खुलेआम मिलने में जबकि तुम्हारे पति बेहद सख्त किस्म के इंसान हैं?’’ मैं ने उस से संजीदा होते हुए पूछा.

‘‘डर तो बहुत लगता है, मगर क्या करूं? तुम से प्यार जो करती हूं, तुम से मिले बिना रहा नहीं जाता,’’ उस ने हमेशा की तरह खिलखिलाते हुए कहा.

‘‘फिर वही पागलों वाली बातें… मैं शादीशुदा हूं, तुम्हें पता है न और मैं अपनी पत्नी से बेहद प्यार करता हूं,’’ मैं ने पहले से भी ज्यादा गंभीरतापूर्वक कहा.

‘‘मुझे पता है सबकुछ… मैं भी शादीशुदा हूं और मु झे तुम से कोई शादीवादी नहीं करनी है… और मैं ने तुम्हें कब मना किया कि तुम अपनी पत्नी से प्यार मत करो? मैं तो बस अपने दिल की बात कर रही हूं. मैं तुम से प्यार करती हूं, तो करती हूं बस… और मेरी ऐसी कोई शर्त नहीं कि बदले में तुम भी मु झे प्यार करो,’’ कहने के साथ ही वह फिर हंसी.

मगर इस बार उस की हंसी मु झे खोखली लगी. जब मैं ने उस की आंखों में  झांका तो उस ने गरम कौफी का मग मेरे हाथ से छुआ दिया और फिर खिलखिला उठी.

‘‘तुम सचमुच पागल हो… तुम्हारा कुछ नहीं हो सकता. किसी दिन तुम्हारे पति या तुम्हारे घर वालों को पता चल गया ये सब तो तुम्हें तो घर से निकालेंगे ही मु झे भी कहीं का नहीं छोड़ेंगे.’’

‘‘अरे वाह, कितना मजा आएगा… मेरे पति मु झे निकाल देंगे और तुम्हारी पत्नी तुम्हें भगा देगी घर से, फिर… हम दोनों प्रेम की गली में एक छोटा सा घर बसाएंगे, कलियां न सही कांटों से ही सजाएंगे…’’ उस ने ये बातें इस अंदाज में कहीं कि मैं जोर से हंस पड़ा.

‘‘चल हट पगली,’’ मेरे मुंह से निकल गया.

‘‘अब जल्दी चलो वरना तुम्हारे साथ रहा तो यही होने वाला है,’’ मैं ने जल्दी से कौफी का बिल चुकाया और उसे 2 मिनट बाद निकलने को बोल कर मैं बाहर निकल गया.

रास्तेभर उस की बातें मेरे मन को गुदगुदा रही थीं. मु झे बेहद आश्चर्य होता था कि वह 40 की उम्र में भी इतनी बिंदास हो सकती है जबकि मैं 35 की उम्र में भी 55 की उम्र वालों की तरह संजीदा रहने लगा हूं.

‘वह करोड़पति की पत्नी है और मैं मामूली सा बिजनैसमैन. मु झे रोज अपनी रोजीरोटी की चिंता रहती है और वह दुनियादारी से बिलकुल बेफिक्र,’ मैं ने मन ही मन सोचा.

तभी एक ठंडी हवा का  झोंका गुजरा और मु झे एहसास हुआ कि मैं यहां बहुत देर से खड़ा हूं. मैं ने उस की यादों को  झटका और औफिस के कामों में व्यस्त हो गया.

इसी तरह 1 हफ्ता बीत गया, मगर उस का कहीं कोई अतापता नहीं था.

‘काश, मु झे उस के घर का पता मालूम होता तो वहां जा कर उस का हालचाल जान लेता… कहीं ऐसा तो नहीं कि उस के पति को मेरे बारे में पता चल गया हो?’ मैं मन ही मन बुदबुदाया.

आज मु झे इस आभासी दुनिया के रिश्ते पर कोफ्त हो रही थी. उस के सोशल मीडिया का पता तो मालूम था, मगर मैं ने कभी उस के घर का पता पूछने की जहमत नहीं उठाई.

तभी मु झे याद आया कि मेरी फेसबुक फ्रैंड लिस्ट में उस की छोटी बहन सेजल भी है. वह अकसर कहा करती थी कि सेजल मेरी सहेली जैसी है.

‘क्यों न मैं सेजल से पूछ लूं’ सोच मैं ने तुरंत सेजल का प्रोफाइल खोला और मैसेंजर पर एक औपचारिक मैसेज डाल दिया.

मेरी आशा के विपरीत उस ने 2 मिनट के बाद ही मु झे मैसेंजर कौल किया. मेरे कुछ पूछने से पहले ही उस ने कहा, ‘‘मु झे आप से दीदी के बारे में कुछ बातें करनी हैं. क्या हम कहीं शांत जगह मिल सकते हैं?’’

मैं ने उसे अपने औफिस के बाहर एक छोटे से रैस्टोरैंट में बुला लिया. 1 घंटे के बाद ही मैं ने अपनी सैक्रेटरी को काम सम झाया और बाहर निकल गया.

मेरे रैस्टोरैंट में पहुंचने के 5 मिनट बाद ही सेजल आ गई. वह अपनी दीदी के बिलकुल विपरीत प्रवृत्ति की लग रही थी. आंखों पर मोटा चश्मा और चेहरे पर गहरी उदासी…

‘‘सब से पहले तो मैं आप को धन्यवाद देना चाहूंगी. आप पहले पुरुष हो जिस ने मेरी दीदी की जिंदगी में ढेर सारा प्यार और खुशियां बिखेरीं,’’ सेजल ने साधारण शब्दों में ही कहा था, मगर मु झे न जाने क्यों एक व्यंग्य सा महसूस हुआ.

खुशियां तो उस ने मेरी जिंदगी में बिखेर रखी थीं. उस का चेहरा देखते ही मैं अपनी सारी परेशानियां भूल जाता था. उत्साह से लबरेज उस की बातें और ब्लौग्स पढ़ कर मैं ने जिंदगी को सकारात्मक नजरिए से देखना शुरू किया था. मगर मैं ने उस से कभी नहीं कहा और अफसोस कि आज भी सेजल के सामने सोच जरूर रहा था, मगर बोल नहीं सका.

‘‘तुम्हारी दीदी खुद भी बहुत अच्छी हैं,’’ मैं ने मुसकराते हुए बस इतना ही कहा.

‘‘और क्या जानते हैं आप मेरी दीदी के बारे में?’’ सेजल ने मेरे चेहरे को एकटक देखते हुए पूछा, तो मैं सकपका गया.

‘‘ज… ज… ज्यादा कुछ नहीं, उस ने ही बताया था कि वह एक बहुत बड़े बिजनैसमैन की पत्नी है और खाली समय में कविताएं लिखती हैं, बस,’’ मैं ने हकलाते हुए कहा.

‘‘ऊं… ह… खाली समय… समय ही कहां था दीदी के पास.’’

‘‘क्या मतलब?’’ मैं सेजल की बातों का मतलब नहीं सम झ पाया.

‘‘अच्छा, ये सब छोड़ो. सब से पहले तुम मु झे यह बताओ कि तुम्हारी दीदी आजकल है कहां? हफ्ता बीत गया उस ने मु झ से कोई संपर्क नहीं किया… भूल गई क्या मु झे?’’ अचानक मु झे याद आया कि मैं ने जल्दी पूछ लिया.

‘‘आप को पता है, मेरी दीदी की शादी को 10 साल हो गए थे,’’ सेजल ने मेरे सवाल को नजरअंदाज करते हुए कहा.

‘‘हां, उस ने मु झे बताया तो था.’’

‘‘मगर 1 साल पहले ही दीदी ने अपने पति से तलाक ले लिया था.’’

‘‘क्या? यह तो उस ने मु झे कभी नहीं बताया,’’ मैं चौंक उठा.

‘‘कैसे बताती… पिछले 8 महीनों से आप उसे खूबसूरत जिंदगी दे रहे थे. ऐसे में वह अपनी तकलीफें बता कर आप की हमदर्दी नहीं बटोरना चाहती थी.

‘‘शादी के कई वर्षों बाद भी जब दीदी मां नहीं बन पा रही थी, तब जीजाजी ने उस का कई जगह इलाज करवाया तो पता चला कि कुछ शारीरिक कमियों के कारण दीदी कभी मां नहीं बन सकती. फिर तो जीजाजी और उन के घर वालों ने दीदी को बां झ कहकह कर ताने देना आरंभ कर दिया. उन लोगों की दिलचस्पी अब केवल दीदी की सैलरी में रहने लगी थी. मेरे जीजाजी एक मामूली से शिक्षक थे, जबकि दीदी कालेज की प्रवक्ता. दीदी के पैसों से ही सारी गृहस्थी चलती थी. फिर भी उन लोगों ने कभी मेरी दीदी का सम्मान नहीं किया,’’ सेजल की आंखों में आंसू आ गए थे.

मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो कर सिर्फ उस की बातें सुन रहा था. मु झे सम झ नहीं आ रहा था कि मैं उस से क्या कहूं. उस ने मु झ से ये सब क्यों छिपाया?

‘‘दीदी की ससुराल वाले जीजाजी की शादी मु झ से करवाने के लिए दीदी पर दबाव डालने लगे ताकि दीदी का पैसा भी उन्हें मिलता रहे और उन की वंशबेल भी आगे बढ़े. जब दीदी ने इस का विरोध किया तो उन लोगों ने प्रताड़ना की सीमा पार करनी शुरू कर दी. इस के बाद दीदी ने जीजाजी तथा उन के परिवार वालों पर घरेलू हिंसा का केस दायर कर दिया और तलाक के लिए अपील की.

‘‘जीजाजी ने बहुत कोशिश की दीदी के साथ सम झौता करने की. धमकी देने के साथसाथ मेरी दीदी के चरित्र पर भी उंगलियां उठाईं उन्होंने, मगर मेरी दीदी विचलित नहीं हुई. वह तलाक ले कर ही मानी. तलाक के बाद दीदी अभी संभली भी नहीं थी कि उसे पता चला कि वह सर्वाइकल कैंसर की लास्ट स्टेज में पहुंच चुकी है. डाक्टर ने सिर्फ

8-10 महीने की जिंदगी बताई,’’ सेजल आगे न बोल सकी और फफकफफक कर रोने लगी.

‘‘उफ, उसे कैंसर है? उस ने मु झे बताया भी नहीं… उसे देखने से भी मु झे कभी महसूस नहीं हुआ कि वह…’’ मेरी आवाज भर्रा गई.

‘‘दीदी को कभी किसी की हमदर्दी अच्छी नहीं लगती थी. तभी तो वह कीमोथेरैपी के दुष्प्रभाव से नष्ट हुई अपनी खूबसूरती को भी विग तथा मेकअप से छिपा कर रखती थी और अपने दर्द को हंसी के मुखोटे में दबा लेती थी. अपनी ‘खुशियों भरी जिंदगी’ के माध्यम से लोगों को खुशियां बांटा करती थी और अपनी कविताओं में सभी औरतों की हौसलाअफजाई करती थी. दीदी ने कभी किसी से कुछ लिया नहीं… उस ने हमेशा देना ही जाना था,’’ सेजल ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा.

‘‘जानती थी का क्या मतलब? वह अभी कहां है? मु झे मिलना है उस से,’’ मैं ने बच्चों की तरह मचलते हुए कहा.

‘‘अब वह इस दुनिया में नहीं रही,’’ सेजल ने सपाट शब्दों में कहा.

‘‘क्या? तुम यह क्या कह रही हो सेजल? मु झे सम झ नहीं आ रहा कि मैं क्या कहूं.’’

‘‘यह लिफाफा और लैपटौप उस ने मु झे आप को देने को कहा था,’’ कह सेजल ने एक लैपटौप बैग और एक लिफाफा मु झे पकड़ा दिया.

‘‘दीदी ने मु झ से कहा था कि वह तुम से जरूर संपर्क करेगा और जब तक वह तुम से संपर्क न करे तुम उसे मेरे बारे में मत बताना,’’ सेजल के कुछ और बोलने से पहले मैं लिफाफा खोल चुका था.

लिफाफे में उस का मोबाइल था और साथ में एक पत्र, जिसे उस ने

लाल स्याही से लिखा था.

‘सौरी डियर,

‘अब तक तो तुम्हें मेरी जिंदगी और मौत से जुड़ी सारी बातें पता चल ही चुकी होंगी. तुम से छिपाया इस के लिए माफ कर देना. मैं तो तुम्हारा सच्चा प्यार चाहती थी, तुम्हारी हमदर्दी नहीं. मु झे अच्छी तरह पता था कि तुम मु झ से प्यार नहीं करते थे, मगर मैं तो तुम्हारे हर ‘अनजाने खत’ पर स्वयं ही अपना नाम लिख लिया करती थी. तुम्हारे शब्दों में खुद को महसूस किया करती थी. तुम्हारे साथ बिताए 8 महीने मेरी जिंदगी का सब से खूबसूरत समय है. तुम्हारे ब्लौग्स में तुम्हारी सारी प्यारभरी बातों को मैं तुम्हारे प्यार की बारिश सम झ कर सराबोर हो जाती थी. अब तुम रोना मत, क्योंकि मैं हंसते हुए यह पत्र लिख रही हूं.

‘वैसे अच्छा ही हुआ जो तुम ने मु झ से प्यार नहीं किया वरना मु झे जिंदगी से प्यार हो जाता और मैं इतनी जल्दी आसानी से मर नहीं पाती. एक बात पूछूं…

‘जिंदगी दर्द की इतनी घनी छांव क्यों है

अपनों के इस शहर में परायों से इतना लगाव क्यों है?’

‘हो सके तो मेरी एक आखिरी इच्छा पूरी कर देना. जब भी कभी अपनी कविताओं की पुस्तक छपवाना तो उस के साथ मेरी भी कविताएं छपवा देना. मु झे लगेगा कि मैं मर के भी तुम्हारे साथ हूं.

‘अपना लैपटौप और मोबाइल तुम्हें दे रही हूं. मेरी सारी रचनाएं इसी में हैं. पासवर्ड में अपना और मेरा नाम एकसाथ लिख देना.

‘मरने से पहले तुम से नहीं मिल सकी और इतना सारा  झूठ बोलने के लिए मु झे माफ कर देना.

‘तुम्हारी पगली…’

और इस के साथ ही उस ने एक बड़ी सी स्माइली बना दी थी.

मैं ने जब नजरें उठाईं तो सेजल जा चुकी थी. दिल ने चाहा कि मैं जोर से दहाड़ें मार कर रोऊं और यहां मौजूद सारी चीजों को पटक कर तोड़ दूं. मगर मैं कुछ भी नहीं कर पाया, क्योंकि मैं उस से प्यार जो नहीं करता था. वह मेरी प्रेमिका नहीं थी, लेकिन मेरे अंदर कुछ दरक रहा था बिना आवाज.

मैं ने उस की लिखावट और उस के पत्र को होंठों से लगा लिया. ऐसा लगा जैसे वह फिर से खिलखिला उठी हो. मगर मैं ने  झल्लाते हुए कहा, ‘‘तुम बिलकुल पागल हो और आज मु झे तुम्हारी इस पागलपंती पर बहुत गुस्सा आ रहा है,’’ और मैं जोरजोर से रोने लगा बिना यह देखे कि आसपास के लोग मु झे देख रहे हैं.

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