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लेखक-अमृत कश्यप

साल में 2 बार नवरात्रे आते हैं. उन दिनों में अनिल की शामत आ जाती. घर में खेती कर दी जाती और सब्जीतरकारी में प्याज का इस्तेमाल बंद हो जाता. वहीं, जरा सी ही कोई प्यार की बात की तो उसे माता रानी के कोप से डराया जाता. अनिल के दिल में यह अरमान ही रहा कि कभी उस की पत्नी उसे प्यार करने के लिए उत्साहित करे. उस ने हमेशा अनिल का तिरस्कार ही किया. अनिल कपड़े पहन कर दफ्तर जाने के लिए तैयार हो चुका था. दूसरे कमरे में उस की पत्नी वर्षा गीता का पाठ करने में मग्न थी. वह दिल ही दिल में खीझ रहा था कि उसे दफ्तर को देर हो रही है और वर्षा पाठ करने में लगी हुई है. सत्ता में नरेंद्र मोदी का फरमान लागू है, समय पर दफ्तर पहुंचने के कड़े आदेश हैं, किंतु वर्षा है कि उसे कुछ परवा ही नहीं. खाना बनने की प्रतीक्षा करूं तो देर हो जाएगी और अधिकारियों की झाड़ सुननी पड़ेगी, भूखा ही जाना होगा आज भी. उस ने एक्टिवा पर कपड़ा मारा और बाहर निकाल कर खड़ी कर दी.

वापस कमरे में आ कर बोला, ‘‘मैं आज भी भूखा ही दफ्तर चला जाऊं या कुछ खाने को मिलेगा?’’

वर्षा ने कोई उत्तर न दिया और पाठ करती रही. अनिल ने थोड़ी देर और प्रतीक्षा की, फिर बड़बड़ाता हुआ एक्टिवा उठा कर भूखा ही दफ्तर चला गया. अनिल के लिए यह नई बात नहीं थी. उस की पत्नी रोज ही सुबह नहाधो कर पूजा करने बैठ जाती और वह नाश्ते के लिए चिल्लाता रहता, किंतु उस पर कोई असर न होता. उस की शादी को 8 साल हो चुके थे, किंतु अभी तक उन के यहां कोई संतान नहीं हुई थी.

पहले वह अपने मातापिता के साथ रहता था. वर्षा सुबह उठ कर पूजापाठ में लग जाती और उस की मां उसे खाना बना कर दे दिया करती थी. कुछ समय बाद उसे सरकारी फ्लैट मिल गया और वह अपनी पत्नी को ले कर फ्लैट में चला आया था. यहां आ कर उसे नई समस्या का सामना करना पड़ रहा था. अनिल को अकसर रोज भूखे ही दफ्तर जाना पड़ता था क्योंकि वर्षा पूजापाठ में लगी रहती थी, खाना कौन बनाता? उस ने कई बार उस से कहा भी था, किंतु वह कब मानने वाली थी. वह तो अपना धर्मकर्म छोड़ने को बिलकुल तैयार न थी. अनिल का विचार था कि इंसान को भगवान की आराधना नहीं, अपनी रोजीरोटी की चिंता करनी चाहिए.

वह वर्षा के रोजरोज के व्रत से भी बहुत परेशान था. आज क्या है? आज पूर्णमासी का व्रत है. आज सोमवती अमावस्या का व्रत है. आज मंगल का व्रत है. यह कहना शायद गलत न होगा कि रोज ही कोई न कोई व्रत होता था और वर्षा उसे अवश्य रखा करती थी. अनिल की उम्र 22 साल की थी और वर्षा की 20 साल. जवानी की उम्र थी, अनिल के दिल में अरमान थे, कुछ उमंगें थीं. वह अपनी पत्नी से प्यार करना चाहता था, किंतु जब भी वह उस से प्यार जताता या उसे छू भर देता तो वर्षा कहती, ‘मुझे हाथ मत लगाओ, जी, मैं आज अमुक व्रत में हूं. मुझे तो पाप लगेगा ही, तुम को भी पाप का भागीदार बनना पड़ेगा,’ बेचारा अनिल दिल मसोस कर रह जाता.

कभी अनिल जोरजबरदस्ती पर उतर आता तो वह अपना पल्ला छुड़ा कर दूसरे कमरे में चली जाती और रामायण या गीता ऊंचीऊंची आवाज में पढ़ने लग जाती. वह उस समय उसे क्या कहता. इन रोजरोज के व्रतों से वह खिन्न रहने लगा था. एक दिन अनिल ने निर्णयात्मक लहजे में कहा, ‘‘वर्षा, यह रोजरोज के व्रत रखने से भला तुम्हें क्या लाभ होता है? क्यों भूखी रहरह कर तुम अपने शरीर को दुर्बल बनाती जा रही हो? कभी अपनी शक्ल भी देखी है आईने में? आंखों के नीचे गड्ढे पड़ गए हैं, रंग पीला पड़ता जा रहा है.’’

इस पर वर्षा बोली, ‘‘व्रत रखने से बड़ा पुण्य मिलता है.’’

‘‘क्या पुण्य मिलता है? तुम वर्षों से नित्य ही कोई न कोई व्रत रखती आ रही हो. कोई परिवर्तन हुआ है घर में? वही दो वक्त की रोटी नसीब होती है, वही नपीतुली तनख्वाह है. तुम्हारे भोलेनाथ ने हमें क्या दिया? महालक्ष्मी ने धन की कौन सी वर्षा कर दी? तुम लौटरी के इतने टिकट लेती हो, कभी तुम्हारी महालक्ष्मी से यह तक तो हुआ नहीं कि एक पैसे का भी इनाम निकलवाया हो.’’

‘‘लौटरीवौटरी तो दूसरी बातें हैं.’’

‘‘फिर यह कथाकीर्तन और व्रत रख कर भूखे मरने से क्या लाभ? भगवान और देवताओं की चापलूसी, खुशामद का क्या फायदा?’’

‘‘इंसान को कर्म तो करना ही चाहिए.’’

‘‘अवश्य करना चाहिए.’’

लेकिन फिर भगवान, देवीदेवता बीच में कहां से कूद पड़े? जैसा कर्म करें वैसा ही उस का नतीजा होगा. मेहनत करेंगे तो पैसा आएगा ही और फिर इस का यह मतलब नहीं कि पति भूखा ही दफ्तर चला जाए और तुम पूजापाठ करती रहो. मुझे एक बूंद देसी घी नसीब नहीं होता और तुम हो कि पूरा एक किलो देसी घी का डब्बा जोत जलाजला कर ही बरबाद कर देती हो?’’

‘‘क्यों नास्तिकों जैसी बातें करते हो?’’

‘‘हां, मैं नास्तिक हूं, वर्षा, यह कहां का न्याय है कि पति असंतुष्ट रहे, अप्रसन्न रहे, पत्नी देवीदेवताओं को प्रसन्न करने के चक्कर में लगी रहे. सुबह उठ कर खाना बना दिया करो, जिस से मैं खाना खा कर दफ्तर जा सकूं. शायद तुम्हें पता नहीं है कि तुम्हारे

खाना न बनाने की वजह से मुझे रोज ही 100-200 रुपए की चपत लग जाती है. भूखे पेट तो मैं रह नहीं सकता. पूजापाठ करना हो तो दिन में किसी समय कर लिया करो,’’ अनिल ने गुस्से में कहा.

‘‘पूजापाठ तो सुबह ही किया जाता है, उसे कैसे छोड़ दूं?’’

‘‘मुझे चाहे भूखा रहना पड़े? देर से जाने पर मुझे भले ही नौकरी से निकाल दिया जाए?’’

‘‘तुम्हारी नौकरी कहीं नहीं जाती जी, बाबा बालकनाथ सब पर कृपा रखते हैं.’’

‘‘हां, अगर नौकरी से जवाब मिल गया तो तुम्हारे बाबा बालकनाथ की तरह मैं भी झोलीचिमटा ले कर हरिभजन कर लिया करूंगा. मांगने से दो रोटियां मिल ही जाया करेंगी.’’

‘‘तुम बाबा बालकनाथजी का निरादर कर रहे हो?’’ वर्षा ने चिढ़ कर कहा.

‘‘निरादर नहीं कर रहा हूं, मैं तो तुम्हें समझाने की चेष्टा कर रहा हूं. हैरानी है कि तुम्हारे समझ में कुछ नहीं आता.’’

और सचमुच अनिल के लाख समझाने पर भी वर्षा पर कोई असर नहीं हुआ. वह उसी प्रकार व्रत रखती रही, पूजा करती रही और नित्य ही अनिल भूखा दफ्तर जाता रहा. वर्षा का परिवार बेहद अंधविश्वासी था. मातापिता दोनों कईकई आश्रमों में जाते थे. वर्षा सुंदर थी, स्मार्ट थी पर पढ़ाई में साधारण थी और मातापिता व बाबाओं की बात आंख मूंद कर मान लेती थी. उस की शादी अनिल के साथ उस के मामा ने बड़ी भागदौड़ के बाद कराई थी क्योंकि मातापिता तो कहते थे कि बाबा अपनेआप करा देंगे. शादी के बाद अनिल को पता चला कि वर्षा कैसी अंधविश्वासी थी पर उस के अलावा वह हर तरह से ठीकठाक थी. हां, बच्चा न होने पर वह और भावुक हो गई. लेकिन डाक्टरों के पास जाने को वह तैयार नहीं हुई थी.

एक दिन रात के 11 बजे होंगे, अनिल के मन में तरंग उठी. वह उठ कर वर्षा के पलंग के पास जा कर बैठ गया. उस का बैठना था कि वर्षा की आंख खुल गई और वह झट से उठ कर बैठ गई. अनिल ने उसे मनाने की बहुत कोशिश की, किंतु उस ने उसे हाथ तक न लगाने दिया. कहने लगी, ‘‘देखो जी, मैं ने सवा महीने के लिए आप से अलग रहने का व्रत लिया है, अभी 10 दिन बाकी हैं.’’ और फिर उस ने अनिल से अपने कमरे में जा कर सो जाने को कहा. उस के दिल को बहुत गहरी चोट लगी और वह चुपचाप अपने कमरे में आ गया. उसे वर्षा पर बहुत गुस्सा आ रहा था. वह अपनी भूल पर पश्चात्ताप कर रहा था कि मैं ने वर्षा जैसी धर्मांध से क्यों शादी की? मेरा प्यार करने को दिल चाहता है तो मैं कहांजाऊं? उस के दिल में तो यह अरमान ही रहा कि कभी उस की पत्नी उसे प्यार करने के लिए उत्साहित करे, कभी मुसकरा कर उस का स्वागत करे. वर्षा ने हमेशा ही उस का तिरस्कार किया है. उस ने कई तरीकों से उसे समझाने की चेष्टा की, किंतु वर्षा ने अपना नियम न छोड़ा.

आगे पढ़ें- वर्षा को शौचालय जाना था. जाते समय उसे…

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