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लेखक-अमृत कश्यप

एक दिन वर्षा ने साईं बाबा का व्रत रखा हुआ था. उस दिन अनिल की छुट्टी थी और वह घर पर ही था. उस दिन वर्षा न अन्न ग्रहण करती थी और न किसी खट्टी चीज को हाथ ही लगाती थी. कोई 3 बजे के करीब वर्षा का सिर चकराने लगा और दिल घबराने लगा. अनिल ने उसे फल लेने को कहा, किंतु उस का व्रत तो व्रत ही होता था. व्रत वाले दिन वह कोई भी चीज ग्रहण नहीं करती थी और उस के कथनानुसार, वह पक्का व्रत रखती थी.

वर्षा को शौचालय जाना था. जाते समय उसे जोर से चक्कर आया और वहीं गिर गई. अनिल ने किसी चीज के गिरने की आवाज सुनी तो दौड़ा. उस ने देखा कि वर्षा जमीन पर गिरी पड़ी है. उस के सिर पर चोट लग गई थी और सिर से खून बह रहा था. उस ने उसे अपनी बांहों में उठाया और पलंग पर लिटा दिया. उसे हिलायाडुलाया, किंतु उसे जरा भी होश न था. उस ने शीघ्रता से थोड़े से पानी में ग्लूकोस घोल कर चम्मच से उस के मुंह में डाला. 4-5 चम्मच ग्लूकोस उस के गले से नीचे उतरा तो वर्षा ने आंखें खोल दीं. जैसे ही उसे यह ज्ञात हुआ कि उस के मुंह में ग्लूकोस डाला गया है, वह रोने लगी और अनिल को कोसने लगी कि उस ने उस का व्रत खंडित कर दिया है और उसे पाप लगेगा.

‘‘पाप लगता है तो लगे, मैं तुम्हें भूखी नहीं मरने दूंगा,’’ अनिल ने कहा.

‘‘व्रत रख कर भूखी मर जाऊंगी तो मोक्ष प्राप्त होगा. जन्ममरण के बंधन से मुक्त हो जाऊंगी,’’ वर्षा ने श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा.

‘‘तुम्हें चक्कर क्यों आया, यह भी जानती हो? तुम्हारे पेट में कुछ नहीं था, इसीलिए चक्कर आया था.’’

‘‘मुझे ग्लूकोस पिला कर तुम ने मेरा व्रत तोड़ दिया है, अब संतोषी मां के 10 व्रत और रखने पड़ेंगे.’’

‘‘मैं पूछता हूं कि ये साईं बाबा पहले कहां थे? पहले तो हम ने इस देवता का कभी नाम भी नहीं सुना था. ये अचानक कहां से आ गए? और फिर इन के भक्तों का भी पता नहीं चलता. आंखें मूंद कर भेड़चाल चलने लग जाते हैं अंधविश्वासी कहीं के,’’ अनिल ने तर्क दे कर कहा. उसे यह समझ में नहीं आ रहा था कि वर्षा कैसे भूखी रह लेती है. हफ्ते में 7 दिन होते हैं और इतने ही वह व्रत रख लेती है. मंगल को व्रत, शुक्रवार को व्रत. इस बीच सोमवती अमावस्या, पूर्णमासी, एकादशी, द्वादशी, करवाचौथ, महालक्ष्मी…सभी तो व्रत रख लेती है वह. व्रत…व्रत…व्रत…हर रोज व्रत. वह बहुत दुखी हो चुका था वर्षा के व्रतों से.

साल में 2 बार नवरात्रे आते. उन दिनों में अनिल की शामत आ जाती. घर में खेती कर दी जाती और सब्जीतरकारी में प्याज का इस्तेमाल बंद हो जाता, जिस से अनिल को तरकारी में जरा भी स्वाद नहीं आता था. वहीं, जरा सी ही कोई प्यार की बात की तो उसे कोप से डराया जाता. उसे खेती से दूरदूर रहने का आदेश दिया जाता. चाहे कितनी भी सर्दी हो, उन दिनों वर्षा अवश्य ही तड़के सुबह स्नान करती और अनिल को भी नहाने के लिए मजबूर कर देती. एक तो वर्षा का शरीर पहले ही कमजोर था, उस पर ठंडे पानी से स्नान. कई बार उसे जुकाम हुआ, सर्दी लग कर बुखार भी हुआ, किंतु उस ने नहाना न छोड़ा.

कई बार अनिल ने वर्षा से गंभीर हो कर व्रत रखने के लाभ पूछे. वह यही जवाब देती, ‘इस से पुण्य होता है, देवीदेवता खुश होते हैं.’ क्या पुण्य होता है, यह वह कभी न बता पाती. हां, लक्ष्मी के व्रत रखने से धन की प्राप्ति होती है, यह अवश्य बता दिया करती थी. किंतु दफ्तर के मासिक वेतन के अतिरिक्त अनिल को कभी और कहीं से धन की प्राप्ति नहीं हुई थी.

एक बार उस ने वर्षा से पूछा, ‘‘तुम पूर्णमासी का जो व्रत रखती हो और सत्यनारायण की कथा सुनती हो, इस में है क्या? इस में सत्यनारायण की कथा नाम की तो कोई चीज ही नहीं है. सिवा इस के कि अमुक ने सत्यनारायण का प्रसाद नहीं लिया तो उसे अमुक कष्ट हुआ. इस के अतिरिक्त इस कथा में कुछ भी नहीं लिखा है?’’

‘‘यही तो कथा है. अगर तुम भी पूर्णमासी का व्रत रख कर सत्यनारायण की कथा सुनो तो तुम्हारी तरक्की हो सकती है, धनदौलत में वृद्धि हो सकती है,’’ वर्षा ने समझाते हुए कहा.

‘‘मुझे इस की जरूरत नहीं है. तरक्की बारी आने पर ही होती है. जब बारी आएगी तो हो जाएगी. इस से पहले कभी नहीं हो सकती चाहे तुम कितने ही व्रत रखो. और तुम देवीदेवताओं के जो व्रत रखती आ रही हो, उन का चमत्कार मैं ने तो आज तक नहीं देखा,’’ अनिल ने टिप्पणी की.

‘‘कैसा चमत्कार देखना चाहते हो?’’

‘‘ऐसा चमत्कार कि असंभव संभव हो जाए, जैसे कि तुम्हारी लौटरी निकल आए, मुझे कहीं से बनाबनाया मकान मिल जाए, मेरी अचानक तरक्की हो जाए.’’?

‘‘ऐसे चमत्कार नहीं होते.’’

‘‘तो फिर व्रत रखरख कर अपने शरीर को कष्ट देने से क्या लाभ? जो मिलना होगा, वह अवश्य मिलेगा. जो नहीं मिलना, वह नहीं मिलेगा.’’

‘‘तुम फिर नास्तिकों वाली बातें करने लगे?’’

‘‘मेरा तो यही कहना है कि व्रतों में कुछ नहीं रखा है, श्राद्धों में कुछ नहीं धरा है. इंसान को अच्छे काम करने चाहिए, उन का फल हमेशा अच्छा होता है.’’

‘‘मैं भी इस से सहमत हूं.’’

‘‘तो फिर व्रत…’’ अभी अनिल की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि वर्षा बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘अच्छा, अब तुम मुझे व्रत रखने के लिए रोक मत देना. मेरी हर देवीदेवता में श्रद्धा है और उन पर पूरी आस्था है. मेरी आस्था तुड़वाने की कोशिश मत करना.’’ इतना कह कर वह गुस्से में उठ कर चली गई.

उस दिन करवाचौथ का व्रत था. हर ब्याहता स्त्री पति की लंबी उम्र के लिए यह व्रत रखती है. इस व्रत में तड़के 4 बजे खाना खाया जाता है. सारा दिन पानी तक ग्रहण करने की मनाही होती है. यह व्रत कड़ा व्रत माना जाता है. रात को जब चांद निकलता है, तब औरतें चांद को देख कर अर्ध्य देती हैं और फिर अन्नजल ग्रहण करती हैं. वर्षा ने सुबह उठ कर स्नान किया, फिर सरगी खाई. अनिल को भी उठाया. उस ने भी थोड़ाबहुत खाया और फिर दोनों सो गए. सुबह व्रत आरंभ हो चुका था. चूंकि अनिल ने सुबह कुछ खा लिया था, इसलिए खाने की इच्छा नहीं थी. वर्षा तो पूजा करने बैठ गई, अनिल ने स्वयं ही एक कप चाय बनाई और पी कर दफ्तर चला गया.

शाम को दफ्तर से छुट्टी कर के वह एक्टिवा पर आ रहा था कि पीछे से एक ट्रक वाले ने उसे टक्कर मारी. उस की एक्टिवा ट्रक के भारी पहियों के नीचे आ कर चकनाचूर हो गई और वह उछल कर पटरी पर जा गिरा. पत्थर से सिर टकराया और खून के फौआरे छूट पड़े. वह गिरते ही बेहोश हो गया. लोगों की भीड़ लग गई. ट्रकचालक को पकड़ लिया गया. पुलिस आई और चालक को पकड़ कर थाने ले गई. अनिल को तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया. किसी ने उस की जेब में से मोबाइल ढूंढ़ निकाला और पत्नी को फोन कर दिया. वर्षा ने अपने पति की लंबी उम्र के लिए करवाचौथ का व्रत रखा था. उस से यह दुखद समाचार सहन न हो सका. एक तो वह दिनभर की भूखीप्यासी थी, ऊपर से यह वज्रपात. दुर्घटना का समाचार सुनते ही वह बेहोश हो कर गिर पड़ी. उस की पड़ोसिनों को जब पता चला तो सभी दौड़ी आईं. बड़ी मुश्किल से उसे होश में लाया गया. जब उस की हालत कुछ सुधरी तो एक पड़ोसिन के साथ वह अस्पताल पहुंची. अनिल की हालत नाजुक थी. वह अभी तक अचेत पड़ा था. वर्षा दहाड़े मारमार कर रोने लगी. डाक्टरों ने अनिल को होश में लाने की कोशिश की. 3 घंटे बाद उस ने आंखें खोलीं. दर्द के मारे वह चिल्लाने लगा. पीठ और टांगों पर प्लास्टर बांध दिया गया और सिर में 3 टांके लगे.

वर्षा को जब यह पता चला कि अब उस का पति खतरे से बाहर है तो उस ने अनदेखी शक्ति का इस बात के लिए धन्यवाद किया कि उस ने उस के पति की जान बख्श दी. फिर करवाचौथ के व्रत की महानता का गुणगान करने लगी जिस के कारण उस के पति की आयु सचमुच लंबी हो गई थी. यह भगवान कैसा है जो पहले उस के पति को ट्रक से टक्कर लगवा कर अस्पताल भिजवाता है और अब धन्यवाद का पात्र बनता है. धन्यवाद तो डाक्टर व अस्पताल को देना चाहिए जिन्होंने उस के पति की जान बचा ली. वह घर पहुंची. चांद कभी का निकल चुका था. उस ने चांद को अर्ध्य दिया और मुंह में केवल सेब का एक टुकड़ा ही डाला और व्रत खोल लिया. रातभर उसे किसी करवट चैन न मिला. वह रातभर रोती रही और अपने पति की सेहत के लिए चिंतित रही. वह रात उस की सब से दुखद रात थी.

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